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राजनारायण जी को याद करते हुए

स्मरण

 

राजनारायण जी को याद करते हुए

दिवाकर मुक्तिबोध

राजनारायण मिश्र


उनकी मौत से चंद दिन पहले मैं उनसे मिलने उनके घर गया था. लंबे समय से बीमार राजनारायण जी से मिलने. करीब 60 बरस तक खबरों के पीछे दौड़ता-भागता शरीर, लाचार होकर बिस्तर पर पड़े-पड़े छटपटा रहा था. यह छटपटाहट तन से ज्यादा मन की प्रतीत हुई. टूटे -फूटे शब्दों में जब उन्होंने कहा कि अब मौत आ जाए तो बेहतर है, सुनकर स्तब्ध रह गया. मन भी भर आया. यह कैसी दुर्दशा! जो व्यक्ति ताउम्र जिंदगी को मस्ती के साथ जीता रहा हो, वह जिंदगी से इस कद बेजार हो गए कि मौत मांगने लगे? असंभव सी बात थी. पर इसके पीछे बड़ा सच यही था कि अपने शरीर की तकलीफ से ज्यादा तकलीफ उन्हें तीमारीदारी में लगे परिजनों को देखकर होती थी, जो उनकी जिंदगी के लिए दिन-रात एक कर रहे थे. वे स्वयं को परिवार पर बोझ मानने लगे थे, इसलिए जिंदगी से ताबड़तोड़ छुटकारा चाहते थे.

करीब आधे घंटे तक मैं और प्रदीप जैन उनका मन बहलाते रहे, उनका हौसला बढ़ाने की कोशिश करते रहे. लेकिन जब हम उनसे विदा ले रहे थे तब पीछा करती उनकी आंखों ने हमें अहसास करा दिया था कि क्या घटित होने वाला है. अंतत: जिंदगी का वह सच 23 अक्टूबर को सामने आ गया. राजनारायण मिश्र नहीं रहे. उनके निधन के साथ ही पत्रकारिता के उस युग का अवसान हुआ जो निर्भीक और मूल्यपरक था. निश्चय ही राजनारायण मिश्र मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ थे.

राजनारायण मिश्र पर लिखने के लिए इतना कुछ है कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक बड़ा ग्रंथ तैयार हो जाए. विशाल मित्र परिवार और करीब 56 बरस की उनकी पत्रकारिता. लिखने के लिए बहुत कुछ. खुद उनका व्यक्तित्व भी, जो विरोधाभासी था. खासकर महिला मित्रों को लेकर उनके बारे में चटखारे के साथ न जाने कैसे-कैसे किस्से बयां होते थे, लेकिन चरित्र पर लांछन की तमाम चर्चाओं पर उन्होंने कभी ध्यान नहीं दिया. कभी परवाह नहीं की. बल्कि खुले मन से उन्होंने अपने संबंधों को स्वीकार करते हुए अपनी आत्मकथा 'पत्रकारिता परिकथा’ में उनका उल्लेख भी किया.

व्यक्तित्व की ऐसी पारदर्शिता बहुत कम लोगों में देखने में मिलती है क्योंकि इसके लिए तगड़े आत्मबल की जरूरत होती है. इस मायने में राजनारायण जी को हम प्रख्यात पत्रकार एवं उपन्यासकार खुशवंत सिंह के समकक्ष रख सकते हैं. खुशवंत सिंह ने भी जैसे जीया वैसा बताया. उनकी आत्मकथा 'सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत’ इसकी गवाह है. राजनारायण मिश्र जी ने भी अपने भीतर का सब कुछ उघाड़ दिया ताकि हर कोई उसमें झांक सके तथा उजले मन की अतल गहराईयों को परख सके. जिन्होंने परखा, वे राजनारायण जी के मुरीद हुए. ऐसे मुरीदों की संख्या छत्तीसगढ़ ही नहीं मध्यप्रदेश में काफी बड़ी है, जो उन्हें न सिर्फ प्रखर पत्रकार मानती है, वरन सामाजिक सरोकारों का अटल प्रहरी भी.

तो, शुरू करता हूं ‘मै’ से. जब आप किसी व्यक्ति के जिंदगी के करीब होते हैं और बहुत सारा वक्त उसके साथ गुजारते हैं तब स्मृतियों में यह ‘मै’ सबसे पहले आ खड़ा होता है अत: इस ‘मैं’ को आत्मस्तुति न मानते हुए किसी मासूम जिंदगी में झांकने का एक माध्यम मानें.

सन् 1969 की बात है, जब मैंने ‘देशबन्धु’ (तत्कालीन ‘नई दुनिया’) में दाखिला लिया और राजनारायणजी के हवाले का दिया गया. राजनारायण जी प्रांतीय खबरें देखते थे, मैं बना उनका सहायक प्रूफरीडर. राजनारायणजी शायद इस बात से अभिभूत थे कि उनका सहयोगी प्रख्यात कवि स्व. गजानन माधव मुक्तिबोध का नौजवान बेटा है. इसलिए वे मेरे कामकाज पर बारीक निगाह रखते थे.
मैं यह मानता हूँ कि मुझे भाषा के जो संस्कार मिले, उसकी वजह राजनारायण जी की हेडमास्टरी थी. इसलिए वे मेरे पहले गुरू थे. हालांकि मेरी पत्रकारिता को संवारने में देशबन्धु के संचालक संपादक ललित सुरजन, रम्मू श्रीवास्तव एवं सत्येंद्र गुमास्ता का भी समान योगदान था. फिर भी राजनारायण जी की बात निराली थी. चूंकि वे सीधे संपर्क में थे, इसलिए उनसे ज्यादा सीखने को मिला.

उनमें अपार धैर्य था और वे हमारी तमाम गलतियों को नजरअंदाज करते हुए कहते थे कि प्रूफ रीडिंग ही समृद्ध भाषा की पहली सीढ़ी है, इसलिए यदि ध्यान पूर्वक प्रूफ पढ़ रहे हैं तो इसका अर्थ हैं आप भाषा के सौंदर्य को आत्मसात करने की कोशिश कर रहे हैं. मैंने उन्हें निराश नहीं किया. कॉलेज के दिनों में जो हिन्दी कभी मुझे बेहद कठिन मालूम पड़ती थी, वह मेरे लिए सरल होती चली गई और वक्त बीतने के साथ ही मेरे मन में यह विश्वास पैदा हो गया कि मैं अच्छी हिन्दी लिख सकता हूँ और हर तरह की रिपोर्टिंग कर सकता हूँ. यह निश्चित तौर पर राजनारायण जी की देन थी. लोग उन्हें ‘दा’ कहते थे किंतु, ‘दा’ की अपेक्षा भैय्या का संबोधन मुझे ज्यादा अच्छा लगता था. मैं प्राय: इसी संबोधन से उन्हें संबोधित करता था.

बरहाल देशबन्धु में मैंने उनके साथ टुकड़ों में काम किया. दरअसल अन्यान्य कारणों से मैं देशबन्धु से टूटता-जुड़ता रहा. वर्ष 1969, फिर 1973 एवं 1978 के बाद लगातार 1983 तक. इस दौरान प्रांतीय समाचार डेस्क के अलावा मैंने स्वयं सिटी रिपोर्टर के रूप में भी उनके साथ काम किया. अप्रतिम कलमकार के रूप में राजनारायण जी ने अपनी पहचान सिटी एवं रीजनल दोनों में अपनी रिपोर्टिंग के जरिए कायम की.

अमूमन रीजनल (उस समय की शब्दावली में प्रांतीय) डेस्क पर काम करने वालों को अपनी अलग पहचान बनाने का मौका कम ही मिलता है, यह स्थिति आज भी कायम है. लेकिन राजनारायण जी ने मूलत: इसी माध्यम के जरिए श्रेष्ठ रिपोर्टर के रूप में स्वयं को स्थापित किया. सन् 1979 में स्टेट्समैन ग्रामीण रिपोर्टिंग का अखिल भारतीय पुरस्कार जीतने वाले वे मध्यप्रदेश से पहले पत्रकार थे.
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