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उठिए और आगे बढ़िए

विचार

 

उठिए और आगे बढ़िए

प्रीतीश नंदी

आजादी


मैं बुरी खबरें पढ़-सुनकर ऊब गया हूं. पिछले कुछ साल एक दु:स्वप्न की तरह रहे हैं. हर सुबह अखबार पढ़ते हुए मेरे मन में क्रोध, हताशा और भय जैसे भाव आने लगते हैं और आखिरकार मैं इसे पढ़ना बंद कर देता हूं.

आप ही बताएं, आखिर घोटाले, हत्या, डकैती, दंगे, महिलाओं पर तेजाब फेंकने, आतंकवादी हमले, बम धमाके, बलात्कार व लूट तथा ऑनर किलिंग जैसी घटनाओं के बारे में कितना पढ़ सकते हैं? इस वजह से मैंने तय किया कि यात्रा से जुड़े हर आमंत्रण को स्वीकार कर लूंगा, ताकि मुझे रोजमर्रा की खबरों के इस तयशुदा कार्यक्रम से अवकाश मिल सके.

मैंने टीवी पर खबरें देखना बंद कर दिया और उबाउ रियलिटी शोज देखने लगा. यहां तक कि मैंने गप्पबाजी से जुड़े और भुतहा कहानियों वाले बेतुके कार्यक्रमों से भी परहेज नहीं किया. गोया कि मैंने मन बहलाने का हर तरीका आजमाया, ताकि मुझे इस कड़वी हकीकत का सामना न करना पड़े कि मेरा देश आखिर कैसा होता जा रहा है. मैं मानता हूं कि कई बार मेरी सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान गूंजने पर भी खड़े होने की इच्छा नहीं हुई. यदि आपको अपने दिल में देश के लिए गौरव का अहसास नहीं है, तो आखिर इसका दिखावा करने की क्या जरूरत है?

आप लोगों पर देशभक्ति को लाद नहीं सकते. यह भावना तो हमारे भीतर से आती है. एक समय था, जब अपने तिरंगे को लहराते देखकर या अपने राष्ट्रगान की धुन सुनकर हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था. देश के प्रति वह गौरव की अनुभूति आज न जाने हमारे जीवन से कहां गायब हो गई. बस एक तरह का खालीपन और गुस्सा बाकी रह गया है. हम अपने आस-पास की हर चीज से खफा हैं. लेकिन इन सबसे ऊपर हम खुद से ही खफा हैं. आखिर हमने सड़ांध को इतनी गहराई तक कैसे जाने दिया? हम इतने लंबे समय तक अंधे कैसे बने रहे? आखिर हमने विरोध का औजार निस्तेज होने से पहले विरोध क्यों नहीं किया?

हां, यह सही है कि हमारे प्यारे भारत के साथ कुछ न कुछ गलत जरूर हुआ है और इस सड़ांध की शुरुआत हमारे व आपके साथ ही हुई. यदि हम इस सड़ांध से लड़ना चाहते हैं तो हममें से हरेक को उठ खड़े होते हुए अपने प्यारे भारत को फिर से पुराने रूप में लाने की कोशिश करनी होगी.

हमें अपने भारत को राजनेताओं से दोबारा हासिल करना होगा. हमें अपने भारत को उन कारोबारियों से पुन: हासिल करना होगा, जो इसके लिए शर्मिदगी और बदनामी लेकर आए. और हां, हमें अपने भारत को मीडिया से भी दोबारा हासिल करना होगा.

हमें इसे बर्बादी के दूतों से भी दोबारा हासिल करना होगा, जो लगातार यह कहते रहते हैं कि हमारे सपने मर चुके हैं. हमें अपनी उम्मीदों को फिर से पाना होगा. हमें अपने सपने पुन: खोजने होंगे. हमें हर उस जगह पर नजर दौड़ानी होगी, जहां सौंदर्य, प्रतिभा, विश्वास और उम्मीद निहित हो. हमें अपनी कल्पनाशीलता को फिर से पाना होगा. हमें अपने इर्द-गिर्द मौजूद अविश्वसनीयता से ऊपर उठने के लिए खुद को ललकारना होगा और अपने भीतर उस साहस को तलाशना होगा, जिसे हमने त्वरित सफलता पाने के लालच में नजरअंदाज कर दिया.

हमारी जिंदगी दो मिनट में पकने वाले मैगी नूडल्स की तरह नहीं है. हमारे आसपास पसरी समस्याओं के लिए कोई त्वरित समाधान नहीं हैं. मगर हां, इन समस्याओं से उबरने और इन्हें परास्त करने के तौर-तरीके जरूर हैं. ये तौर-तरीके अंधे आक्रोश में निहित नहीं हैं. ये अपनी निराशाओं, अपने गुस्से से उबरने और असल समाधान तलाशने की हमारी क्षमताओं में निहित हैं. सवाल यह है कि हम ऐसा कैसे कर सकते हैं?

ऐसा करना बहुत आसान है. इसका पहला चरण है- चुपचाप न बैठें. अन्याय को बर्दाश्त न करें. जब भी आप किसी को कुछ गलत करते हुए देखें तो उससे आंखें न फेर लें. अपने भीतर साहस जुटाएं और गलतियों के प्रतिकार के लिए उठ खड़े हों. यह एक भारतीय के तौर पर गौरव महसूस करने की दिशा में पहला कदम है. निडर बनें.

अगला महत्वपूर्ण चरण यहीं से शुरू होता है. अपनी स्वतंत्रताओं को दोबारा हासिल करें. हाल के वर्षो में हम लगातार इन्हें खोते गए. हम अपनी आजादियों को उस सरकार के हाथों खोते गए, जो हर घोटाले के बाद हताश ढंग से इसे ढांपने की कोशिश करती है. उन कट्टरपंथी समूहों के हाथों खोते गए, जो हमें आतंकित करते हैं. बेवकूफों और बर्बर लोगों के समक्ष खोते गए.

उन नैतिकता के स्वयंभू ठेकेदारों के समक्ष खोते गए, जो यह तय करना चाहते हैं कि हम क्या बोलें, क्या पढ़ें, क्या सुनें, क्या पहनें या क्या खाएं-पिएं. उस राजनीतिक विपक्ष के हाथों खोते गए, जिसने अपना नैतिक दिशासूचक यंत्र खो दिया है. उन दबाव समूहों के हाथों खोते गए, जो सीना ठोककर जातीय अपराधों व ऑनर किलिंग इत्यादि को जायज ठहराते हुए हमें 18वीं सदी में बनाए रखना चाहते हैं. उस मीडिया के हाथों खोते गए, जो अक्सर अपना साहस छोड़ खोह में दुबक जाता है. अब समय आ गया है कि हम उठ खड़े हों और अपनी स्वतंत्रताओं को दोबारा हासिल करें. एक स्वतंत्र राष्ट्र ही मजबूत राष्ट्र बन सकता है.

याद रखें, जब भी किसी शख्स को कोई कार्टून बनाने या किसी ट्वीट या फेसबुक पोस्ट के लिए या कोई किताब या गीत या फिर ब्लॉग अथवा किसी पेंटिंग के लिए हिरासत में लिया जाता है; जब भी लोगों की भावनाएं आहत होने के डर से किसी फिल्म से कोई दृश्य काट दिया जाता है, तब-तब हमारे भीतर का कोई हिस्सा मर जाता है. भारत के लिए उस सब चीजों का महत्व है, जिन पर हमें भरोसा है. भले ही हमारे विचार कितने ही अलग हों.

24.11.2012, 09.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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