पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >समर Print | Share This  

ओबामा की जीत या

मुद्दा

 

ओबामा की जीत या

समर

बराक ओबामा


जिस मुल्क का सैन्य बजट बाकी की पूरी दुनिया के सैन्य बजट के लगभग आधे के बराबर हो, जिसकी सेना कम से कम 46 देशों में फैले 900 से ज्यादा सैन्य केन्द्रों में सक्रिय रूप से उपस्थित हो और जिसका घोषित लक्ष्य सारी दुनिया का ‘फुल स्पेक्ट्रम डोमिनेन्स’ हो, उसके राष्ट्रपति के चुनाव में बाकी सारी दुनिया की दिलचस्पी स्वाभाविक ही है. यह भी कि उसका एक बड़ा हिस्सा आक्रामक तेवर वाले रिपब्लिकन मिट रोमनी के ऊपर डेमोक्रेट बराक हुसैन ओबामा के दुबारा राष्ट्रपति चुने जाने पर राहत की सांस ले. पर फिर, सवाल यह है कि ओबामा की इस जीत के निहितार्थ क्या हैं?

यही वह सवाल है, जिसका जवाब वह परतें खोलता है जो अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव को अद्भुत अंतर्विरोधों का सामंजस्य बनाता है. पहला यह कि अमरीकी चुनाव अपने मूल चरित्र में एक नहीं, बल्कि दो बिलकुल अलग अलग चुनाव है और दो बिलकुल अलग जगहों पर लड़ा जाता है. इनमे से पहला मोर्चा है अमरीका की विदेश नीति और उस पर अमरीकी चुनावों का प्रभाव. इसका दूसरा मोर्चा उनकी अपनी सीमाओं के अन्दर खुलता है और चुनाव के बाद आने वाले नीतिगत परिवर्तनों का आम अमरीकी नागरिकों पर प्रभाव इस मोर्चे का सबसे जरूरी सवाल होता है. दूसरा अंतर्विरोध यह भी है कि इन दोनों मोर्चों की अंतर्सबंधीय परस्परता का एक बहुत छोटा सा हिस्सा छोड़ दें तो इनका आपस में कोई रिश्ता नहीं होता.

पहले मोर्चे को ध्यान से देखें तो अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में किसी भी पार्टी या व्यक्ति की जीत अमरीका की विदेश नीति और उससे गहरे रूप से जुडी सैन्य नीति पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं डालती. हकीकत यह है कि अमरीकी विदेश नीति और उससे जुड़ी घरेलू नीतियाँ दशकों पहले से वहाँ के राजनैतिक नेतृत्व के हाथ से निकल कर सैन्य-औद्योगिक संकुल (मिलिटरी इंडस्ट्रियल काम्प्लेक्स) के नाम से जाने जाने वाले उस हित समूह के पास चली गयी हैं, जिसके कुप्रभावों के बारे में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति ड्वाइट डी आइजनहावर ने 1961 में अपना पद छोड़ते हुए ही आगाह कर दिया था. आइजनहावर की चिंता और चेतावनी दोनों साफ़ थी कि अगर इसके प्रभाव को रोका या कम से कम संतुलित नही किया गया तो अमरीकी नीतियाँ सिर्फ और सिर्फ इसी संकुल के प्रभाव में बनेंगी और चलेंगी.

तब से अब तक के पांच दशकों में यह चेतावनी लगभग सभी अर्थों में इस हद तक सही साबित हुई है कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के बाद सेना को अमरीकी राजनीति का तीसरा खम्भा माना जाने लगा है. राजनीति में सेना की स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि परिवर्तन की, असैन्यीकरण न सही कम से कम अपने जवानों को घर वापस लाने की राजनीति करने वाले ओबामा को भी अमरीकी हितों की रक्षा के लिए ‘बहुत मजबूत’ सेना रखने की जरूरत पर बल देना पड़ता है.

मतलब साफ़ है कि निकट भविष्य में विदेशी जमीनों पर मौजूद अमरीकी सैनिकों के बैरकों में लौट जाने के ख्वाब देखने वाले वास्तविकता से उतनी ही दूर हैं, जितना अरब बसंत के बाद तमाम अरब देशों में लोकतंत्र आ जाने की ख्वाहिश वाले लोग थे. हाँ, ओबामा की जीत इस मायने में महत्वपूर्ण जरूर है कि अब ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों में संयुक्त राष्ट्र संघ को धता बताते हुए अमरीकी दखल का खतरा जरूर कम हो गया है और इस मामले में भी कि पाकिस्तान जैसे देशों में जहाँ अमरीका गैर-राज्य शत्रुओं से छाया युद्द में उलझा हुआ है, वहां स्थिति और गंभीर नहीं होगी. आखिरकार ड्रोन हमले लोकतंत्र के हित में हों या न हों, ओबामा के पूर्ववर्ती रिपब्लिकन राष्ट्रपति जार्ज बुश जूनियर की कॉरपेट बोम्बिंग से कम हिंसक तो हैं ही.

यह अमरीकी चुनाव का दूसरा, घरेलू मोर्चा है जिस पर एक तरफ लगातार गहराती आर्थिक मंदी के कुप्रभावों से जूझ रहे वंचित अमरीकियों और दूसरी तरफ अस्मितागत पहचानों जैसे अश्वेत, हिस्पैनिक, समलिंगी, अकेली या बिनब्याही माओं का तबका है जिसके लिए ओबामा की जीत बड़ी राहत बन कर आयी है.

इनमें से पहला तबका वह है, जिसके लिए रिपब्लिकन पार्टी और उसके लिबर्टेरीअन (इच्छास्वातंत्र्यवादी) खेमे का प्रतिनिधित्व करने वाले मिट रोमनी की जीत उनके ताबूतों में आखिरी कील साबित हो सकती थी. आर्थिक मंदी के फलस्वरूप बड़े स्तर पर अपने कर्जे के घर खो चुके इस तबके के लिए लगातार मंहगी और पहुंच के बाहर होती जा रही बुनियादी सेवाओं को बचाना सबसे बड़ी लड़ाई थी. और वे साफ़ देख पा रहे थे कि सभी, ख़ास तौर पर गरीब, अमरीकियों को सस्ती और सुनिश्चित स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य वाली ओबामा की महत्वाकांक्षी ‘रोगी सुरक्षा एवं वहनयोग्य देखभाल (पेशेंट प्रोटेक्शन एंड अफोर्डेबल केयर एक्ट) और चिकत्सकीय देखभाल एवं शिक्षा सामंजस्य एक्ट (हेल्थ केयर एंड एजुकेशन रिकोंसिलियेशन एक्ट) अमरीकियों की सामाजिक सुरक्षा के स्वास्थ्य पहलू को सुनिश्चित करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है.

आगे पढ़ें

Pages:

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in