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जमीन अधिग्रहण खत्म हो

विचार

 

जमीन अधिग्रहण खत्म हो

मेधा पाटकर

जमीन अधिग्रहण


देश भर में चल रहे आंदोलनों में सबसे ज्यादा जनशक्ति अगर किसी मुद्दे पर उभरी है, तो वह हैं ‘प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार’ का मुद्दा. भले वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के जैसे रास्ते पर उतरी हुई, शहरों में न दिखाई देती हो, मीडिया में छाई हुई नहीं दिखती हो, लेकिन वर्षों और दशकों तक बनी रही है बल्कि बढ़ती गई है. प्राकृतिक संसाधनों में जमीन भी शामिल होते हुए, ग्रामीण भूमि, खेती संबंधित संघर्षों के अलावा, शहर की भूमि और आवास भूमि के लिए चल रही लड़ाई भी इसमें शरीक समझना चाहिए.

ये संसाधन, जमीन, जल, जंगल, भूतल के जल और खनिज या नदी और सागर की जल संपदा.. सब कुछ जीने और जीविका के आधार हैं. इसीलिए इन संघर्षों की बुनियाद में है- संवैधानिक अधिकार, जीने का अधिकार, शुद्ध पर्यावरण का अधिकार; साथ ही जीविका इन्हीं पर निर्भर होने से, तमाम बुनियादी जरूरतों की पूर्ति का अधिकार भी है.

देश के लाखों गांवों में आज हाहाकार है क्योंकि ये पीढ़ियों से वहीं रहे हैंऔर उपयोग में लाये गये संसाधन शासन कब जबरन छीनना चाहेगा, पता भी नहीं चलता है. ‘सार्वजनिक हित’ के नाम पर किसी भी प्रकार की योजना, राजधानी में बैठकर बनती है तो अपने सार्वभौम अधिकार के साथ, शासन-राज्य या केंद्र की-उन्हें निजी परिवार को कोई किसान, आदिवासी या दलित भी, शासन को दे दे, यह मानकर, 1894 का अंग्रेजों के जमाने का कानून चलाया गया है. भूअर्जन कानून की एक नोटिस, मानो उस जमीनधारी को ‘कैंसरग्रस्त’ बना देती है.

यह निश्चित है कि उस कानून में ब्रिटिशों ने भी शासन के निर्णय पर किसी को आपत्ति उठाने का, सुनवाई का मौका नहीं अधिकार, हर संपदा के मालिक को दिया और आपत्ति के कारणों में, वर्षों तक विविध न्यायालयों से उभरे मुद्दे रहे, ‘सार्वजनिक हित’ नहीं होना, गलत उद्देश्य से जरूरत से ज्यादा जमीन का अर्जन तथा सांस्कृतिक व सुंदर स्थलों का विनाश आदि. इनमें से किसी भी कारण के आधार पर, भूअर्जन पर ही आपत्ति उठाई जा सकती है किंतु अंग्रेजों के बाद, आजाद भारत में भी कोई निर्णायक सुनवाई न होने से, यह अधिकार नाम मात्र का या प्रतीकात्मक ही रह गया है.

नतीजा यही है कि नोटिस (पहली-धारा 4) के तहत आने से ही संसाधन हाथ से जाते महसूस कर इसका मालिक या तो हताश या उद्विग्न और संतप्त होकर, लड़ने के लिए मजबूर होता है. विरोध के स्वर इसलिए भी प्रखर होते गये हैं क्योंकि शासन न केवल शासकीय, बल्कि निजी हितों-निजी कंपनियों के लिए भी जबरिया भूअर्जन शुरू करती गई है. वैश्वीकरण-उदारीकरणवादी आर्थिक नीतियों के देश में लागू होने पर तो अब कंपनियों द्वारा जल, विद्युत, इन्फ्रास्ट्रक्चर (उच्च पथ) या उद्योगों-कारखानों की हजारों परियोजनाओं के लिए यह ‘जबरन अर्जन’ का तरीका, लाखों-करोड़ों की जायदाद पर ही नहीं लोगों की जीविका पर आघात कर रहा है.

ऐसे संसाधनों का मूल्य बाजार मूल्य की तुलना में सबसे कम आंका जाता है. फिर इससे विस्थापित होने वालों को वैकल्पिक आजीविका या पुनर्वास का प्रबंध नहीं किया जाता है. विभागवार कुछ आधे-अधूरे प्रावधान और कुछ राज्यों में (जैसे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक आदि) कानून होने के बावजूद जमीन देने वाली की आजीविका या पुनर्वास की व्यवस्था नहीं हो पाती है.

उम्र भर बेरोजगार, बेघर होकर करोड़ों विस्थापित भटक रहे हैं. अगर इनमें से कुछ लोग पुनर्वासित हो जाएं तो भी जमीन से उखड़ने की पीड़ा और जीवन स्तर में गिरावट, इस सबके प्रत्यक्ष असर और उदाहरण हैं. इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में बढ़ते विरोधों व गतिरोधों के चलते परियोजनाएं रोकी जाती रही हैं. किसान-मजदूर-मछुआरों ने पुनर्वास की भीख मांगना, आदिवासी अंचलों या शहर की गरीब बस्तियों में रहने वाले लोगों ने छोड़ दिया है.

शासन को कंपनियों की आपत्तियों के चलते भी, भूअर्जन के सिद्धांत एवं विस्थापितों की समस्या पर गंभीरता से सोचना पड़ा. 1998 से ही राष्ट्रीय पुनर्वास नीति की बात शुरू हुई. हम जैसे गिने-चुने सामाजिक कार्यकर्ताओं को निमंत्रित करके ग्रामीण विकास मंत्रालय में चर्चा हुई. ‘विकास’ और ‘सार्वजनिक हित’ की संकल्पना पर विचार के साथ-साथ, भूअर्जन की ‘सार्वभौम राज्य’ के आधार पर हो रही जबरदस्ती को लेकर प्रखर सवाल उठाए गए. अंत में सर्व सहमति से पारित इस राष्ट्रीय पुनर्वास नीति के मसौदे पर भी कोई अमल नहीं हुआ. फिर संघर्ष जारी ही नहीं, बढ़ते भी गए.

सशस्त्र संघर्षों की व्यापकता बढ़ी तो अहिंसक संघर्षों से भी यह बात पूर्ण रूप से उभर सामने आई कि विकास नियोजन में, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों का जबरिया अर्जन न तो किसानों और न ही मजदूरों; किसी को भी मंजूर नहीं है. यह बात पूर्ण रूप से उभर आई.
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