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योग्यता बनाम आरक्षण

बात निकलेगी तो

 

योग्यता बनाम आरक्षण

संदीप पांडे


आरक्षण को लेकर एक बार फिर देश में हंगामा शुरू हो गया है. अब सवाल पदोन्नति में आरक्षण का है. आम तौर पर जैसा होता आया है इस मुद्दे पर तार्किक सोच कम और भावनाओं का इस्तेमाल ज्यादा होता है. सवर्ण मानसिकता वाले लोग पदोन्नति में आरक्षण के विरोध के बहाने फिर काबिलियत का सवाल उठाने लगे हैं, जबकि ज्यादातर लोगों ने अपनी काबिलियत का इस्तेमाल इस देश में वैध-अवैध तरीकों से स्वयं की स्वार्थ पूर्ति के लिए ही किया है न कि समाज हित में..

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आरक्षण लागू करने के पीछे क्या कारण थे? हमारे देश में बहुत से वर्ग ऐसे थे जिनका उच्च शिक्षा के संस्थानों, नौकरियों अथवा नीति निर्धारण करने वाले निकायों में उचित प्रतिनिधित्व नहीं था. इस वजह से तीनों क्षेत्रों- उच्च शिक्षण संस्थानों, सरकारी नौकरियों और जनता द्वारा चुने जाने वाले निकायों में संवैधानिक संरक्षण में आरक्षण की व्यवस्था की गई. संसद, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में तो आरक्षण का लाभ वंचित तबकों को मिला क्योंकि जो जगह उनके लिए आरक्षित थी वहां से उस आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार खड़ा होता है, लेकिन उच्च शिक्षा के संस्थानों व सभी नौकरियों में आरक्षित स्थानों को भर पाना मुश्किल होता है.

उदाहरण के लिए भारत सरकार के सबसे ऊंचे प्रशासनिक पद सचिव पर वर्तमान में एक भी अनुसूचित जाति का अधिकारी नहीं है, जबकि अनुसूचित जनजाति के दो अधिकारी हैं. अपर सचिव पद पर अनुसूचित जाति के पांच और जनजाति का एक अधिकारी है तथा संयुक्त सचिव पद पर 25 अनुसूचित जाति के अधिकारी हैं और 15 अनुसूचित जनजाति के. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एक भी अनुसूचित जाति का प्रोफेसर नहीं है, जबकि उनके लिए 51 रिक्त पद हैं. 31 केंद्रीय विश्चविद्यालयों में 1421 नियुक्त प्रोफेसरों में से 26 अनुसूचित जाति के यानी 2 प्रतिशत से कम और 9 अनुसूचित जनजाति के यानी एक प्रतिशत से भी कम हैं. अन्य पिछड़े वर्ग के भी मात्र 19 प्रोफेसर ही हैं. केंद्र सरकार की समूह ए की सेवाओं में मात्र 11.1 प्रतिशत अनुसूचित जाति व 4.6 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार ही लाभ उठा पाए हैं, इसके बावजूद कि उनके लिए 15 व 7.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रहा है. उत्तर प्रदेश में दोनों श्रेणियों को मिलाकर भी यह आंकड़ा 4.5 प्रतिशत से कम है. कोई भी विभागाध्यक्ष वर्तमान में अनुसूचित जाति से नहीं है यानी ऊंचे पदों पर आरक्षण की व्यवस्था के मुताबिक वंचित तबकों के जितने लोगों को पहुंचना चाहिए था वे आजादी के 65 वर्ष बाद भी नहीं पहुंच पा रहे हैं.

जब तक वंचित समुदायों के लोग आबादी में अपने प्रतिशत के अनुपात में उच्च शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में नहीं पहुंचते तब तक हम कैसे कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय का उद्देश्य पूरा हो गया? बल्कि पुलिस, सेना, न्यायपालिका, पत्रकारिता आदि अन्य जगहों पर भी वंचित तबकों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में होना चाहिए. अभी एक प्रकाशन संस्थान ने, जहां से कई पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है, ने एक अनुसूचित जाति या जनजाति पृष्ठभूमि के पत्रकार पद के लिए विज्ञापन जारी किया है. यह सराहना योग्य बात है. उसके लिए ऐसा करना बाध्यता नहीं थी. जैसा उसका विज्ञापन कहता है भारतीय मीडिया में दलित पृष्ठभूमि के पत्रकारों की अनुपस्थिति से जाति, सांप्रदायिकता व भेदभाव जैसे मुद्दों पर संवेदनशीलता में गिरावट आई है.

यदि सभी सरकारी विभाग या गैर सरकारी संस्थाएं भी स्वयं की पहल पर यह ध्यान रखने लगें कि उनके यहां काम करने वालों की नियुक्ति में भारतीय समाज की विविधता का उचित प्रतिनिधित्व हो तो जाति के नाम पर आरक्षण की वजह से पैदा हुई कटुता दूर हो सकती है. हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा होते ही करीब आधे पदों पर तो महिलाओं को होना चाहिए क्योंकि वे आधी आबादी हैं. अल्पसंख्यकों व पिछड़े वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना चाहिए. हमारा ध्यान विकलांग, किन्नर आदि श्रेणियों की ओर भी जाना चाहिए जिनके साथ भी भेदभाव होता है.

वंचित तबकों के प्रतिनिधि ऊंचे पदों पर नहीं पहुंच पा रहे हैं अत: पदोन्नति में आरक्षण तो जरूरी है. कम से कम तब तक तो है ही जब तक अपने वर्ग के अनुपात में उनका प्रतिनिधित्व नहीं होने लगता है. यह एक ऐसा मुद्दा है जो समाज के बड़े एवं वंचित तबके को प्रभावित करता है इसलिए कोई भी राजनीतिक दल इसका विरोध नहीं कर सकता. बड़े दलों में सिर्फ समाजवादी पार्टी ऐसी है जिसने पदोन्नति में आरक्षण का विरोध किया है. मुलायम सिंह का भी विरोध तभी तक है तक जब तक अन्य पिछड़ा वर्ग इस लाभ से वंचित है. जैसे ही अन्य पिछड़ा वर्ग को भी इस श्रेणी में शामिल कर लिया जाएगा, मुलायम इसके समर्थक हो जाएंगे और आरक्षण विरोधी हाथ मलते रह जाएंगे.

सबसे आश्चर्यजनक भूमिका आम आदमी पार्टी की रही. उसने पदोन्नति में आरक्षण का विरोध किया है. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रति दलित शुरू से सशंकित थे. अब उनका संदेह सही साबित हो रहा है. इस आंदोलन में सर्वण आरक्षण विरोधी तबके के लोगों का ही वर्चस्व है. जिस दल का स्वरूप अभिजात्य हो वह भारत जैसे देश में जहां अनुसूचित जाति, अनूसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अपल्संख्यक, महिला यानी वंचित तबका आबादी का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा हो वह भारत में राजनीति कैसे करेगी? आम आदमी पार्टी ने इस एक कदम से अपने भविष्य के विस्तार के रास्ते बंद कर दिए हैं.

21.12.2012, 23.01 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rahul bhati [mahi.chitra2011@gmail.com] uttar pradesh - 2013-03-24 16:17:43

 
  क्या एससी या ओबीसी वाले ही गरीब हैं. क्या उच्च जातियों में गरीब नहीं होते. क्या ये सभी अमीर हैं. कब तक आरक्षण की आड़ में अयोग्य को नौकरी मिलती रहेगी. जब सभी समान है तो आरक्षण एक जाति विशेष को क्यों. क्यों ने economy basis पर सभी को बिना जाति के ये फायदा दिया जाना चाहिए तब लेकिन at last ये सभी वोट लेने का एक जरिया बन चुका है. 
   
 

Pritesh Gupta [pritgupta93@gmail.com] Mandsaur & Delhi - 2013-03-15 12:44:00

 
  पहली बात, यदि वर्तमान में आरक्षित पदों पर ही नियुक्ति नहीं हो पा रही है तो फिर और आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने से क्या फ़ायदा है. दूसरी बात, गौतम जी मैं आपकी इस बात से शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि जब सब बराबर हो जाएँगे तो देश तरक्की करने लगेगा लेकिन आप मुझे यह बताइए कि आरक्षण देकर क्या आप सभी को बराबर हक देने की ओर कदम उठा रहे हैं. इससे तो देश में और ज़्यादा असंतोष उत्पन्न हो रहा है. तीसरी बात आम आदमी पार्टी को लेकर है, अरविंद केजरीवाल कभी तो मुस्लिमों को 11% आरक्षण को समर्थन देते हैं और कभी पदोन्नति में आरक्षण का विरोध करते हैं.. वे अपने स्टॅंड पर ही क्लियर नहीं हैं> 
   
 

N.K.Tiwari. [] Ujjain. - 2013-03-04 01:26:04

 
  आरक्षण देश के हित में इसमें कोई संदेह नहीं लेकिन कब तक गरीब सवर्ण इसके कारण पिसते रहेंगे. इसकी भी कोई सीमा होनी चाहिए. दूसरी बात ये होना चाहिए कि जिस व्यक्ति ने एक बार आरक्षण का लाभ ले लिया उसे दोबारा लाभ न मिले. क्योंकि आरक्षण के कारण वह मुख्यधारा से जुड़ गया है. उसके बदले दूसरे भाईयों को लाभ मिलना चाहिए. क्योंकि आरक्षण के कारण प्रगति के टापू बन गए हैं. मुख्य शहर में रहने वाले ही इसका लाभ ले जाते हैं और पिछड़े इलाके के भाई इससे वंचित रह जाते है. आरक्षित वर्ग की योग्यता का प्रतिशत बढ़ाने के हर संभव उपाय होने चाहिए. पर जो परिवार सालाना 5 लाख से उपर कमा रहे हो उन्हें इस सुविधा से वंचित कर देना चाहिए क्योंकि वो अपने बच्चों को सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं.  
   
 

Amit Kumar [] Ghaziabad - 2013-02-12 17:59:40

 
  मतलब आरक्षण के नाम पर एक 40% वाला नौकरी पा जाए और 80% वाला लाइन में लगे रहे. नौकरी योग्यता के आधार पर मिलनी चाहिए न कि आरक्षण के आधार पर. अगर गरीबों दलितों को आगे बढ़ाना है उन्हें मुफ्त शिक्षा दें. सब सुविधाएं दें लेकिन योग्य हुए बिना किसी को सिर्फ जाति के आधार पर नौकरी देना गलत है. गरीब तो हर जाति में है, सिर्फ दलित जाति और पिछड़ों में ही नहीं. लेकिन राजनीति वाले लोग ये नहीं समझेंगे, तुम्हें न देश से मतलब है न देशभक्ति से. बस जाति का नाम लेकर वोट बैंक बनाने से मतलब है. Shame on you. 
   
 

sunil gauatm [s.kumar1140@yahoo.com] panipat - 2012-12-25 05:49:45

 
  पांडे जी ने बिल्कुल सही लिखा है. मैंने पहली बार किसी ब्राह्मण का लेख पढ़ा है जो दलितों के हित की बात लिखता हो. अगर इस समाज में सब की सोच आपकी जैसी हो जाए तो हिंदुस्तान को नंबर एक देश बनने से कोई नहीं रोक सकता क्योंकि जब सब बराबर हो जाएगा तो कोई भी जात-पात के चक्कर में नहीं पड़ेगा सभी देश की तरक्की के बारे में सोचेंगे. धन्यवाद पांडेजी कृपया इन सवर्णों को भी समझाएं कि दलित भी हमारे भाई हैं और जिस दिन सारे दलितों ने हिंदुत्व छोड़ दिटया तो हिंदुस्तान में हिंदु ही अल्पसंख्यक हो जाएंगे और ये हिंदुस्तान मुसलीस्तान बन जाएगा. हम सब का भला इसी में है कि हम सब मिल कर भाईचारे के साथ रहें, इसी में सब का और देश का भी भला है. जय भीम, जय भारत, जय हिंद. 
   
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