पहला पन्ना >देविंदर शर्मा Print | Share This  

किसानों का लोन किसके पास

बहस

 

किसानों का लोन किसके पास

देविंदर शर्मा

किसान


भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने यह राज खोला है कि किसानों की कर्ज माफी योजना में बड़े पैमाने पर गड़बडियां हुई हैं. यह योजना वर्ष 2009 के आम बजट में आम चुनावों से पहले लागू की गई थी. 74,000 करोड़ रूपए के कर्ज माफ किए जाने थे. कर्ज माफी योजना को लेकर काफी उत्सुकता थी. पर योजना के आंतरिक प्रावधानों से प्रभावशाली लोगों को ही फायदा मिला.

मोटे तौर पर योजना से आठ-दस प्रतिशत किसान ही लाभान्वित हुए. इसका सीधा अर्थ यही निकला कि 35.5 लाख किसानों को कर्ज माफी योजना का कोई लाभ नहीं मिला. इसके अलावा ऐसे अयोग्य किसानों की बड़ी संख्या थी, जिन्हें अदायगी से छूट मिल गई और उन्होंने ऋण का भुगतान नहीं किया.

यह रहस्योद्घाटन ऐसे समय में हुआ है, जब कृषि ऋणों में लाभार्थियों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि लाभ किसे मिला? हर साल के बजट में कृषि ऋण आवंटन की राशि बढ़ाई जाती रही है. 2012-13 के बजट में 5,75,000 करोड़ रूपए का कृषि ऋण देने का बजटीय प्रावधान किया गया था. एक साल पहले 2011-12 के बजट में 4,75,000 करोड़ रूपए निर्घारित किए गए थे.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार, वर्ष 2000 और 2010 के बीच कृषि ऋण 755 प्रतिशत तक बढ़ा है. इस साल अपेक्षित है कि वित्त मंत्री पी. चिदंबरम नए बजट में कृषि ऋणों के लिए आवंटन और बढ़ाएंगे, इसे 7,00,000 करोड़ रूपए तक कर देंगे. इससे ऐसा लगता है कि यदि छोटे सीमांत किसानों को कृषि ऋणों के जरिए इतनी बड़ी राशि दी जा रही है, तो कृषि मोर्चे पर सब कुछ ठीक-ठाक होगा. लेकिन ऋण वितरण की हकीकत वास्तविकता से परे है. खेती के मोर्चे पर कृषि संकट का गहराना जारी है. कृषि ऋणों के लिए जो आवंटन बढ़ाया जाता है, उसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता.

पिछले पंद्रह वर्षो में 2.90 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं और अन्य लगभग 42 प्रतिशत किसान, यदि उन्हें आय का और कोई जरिया मिल जाए, तो वे खेती-किसानी छोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं.

बढ़ता कृषि संकट ऋण के विशाल आवंटन से मेल नहीं खाता है. हमने बार-बार सुना है, कृषि ऋण उत्पादन बढ़ाने और किसानों की तकलीफ दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. योजना आयोग के 12वीं पंचवर्षीय योजना यानी 2012-2017 के दस्तावेज में भी कृषि विकास के लिए कृषि ऋण बढ़ाने की बात कही गई है.

यह बात तब कही गई है, जब एसोचैम की "फार्म क्रेडिट" रिपोर्ट मे पिछले दशक में बांटे गए कृषि ऋणों के दुरूपयोग का विश्लेषण किया गया है. देखने में आया है कि बड़े खेतों के मालिक अनुपात में तो कम ब्याज पर ज्यादा कृषि ऋण ले लेते हैं, और फिर वह पैसा अन्य आकर्षक योजनाओं, क्षेत्रों में लगा देते हैं, जिससे उन्हें अधिक फायदा होता है. जो छोटे-गरीब किसान हैं, वे इस योजना का फायदा नहीं उठा पाते.

यदि आप ऐसोचैम की रिपोर्ट की आखिरी पंक्ति को देखें तो साफ पता चल जाएगा कि संस्थागत ऋण योजना अपनी पहुंच बनाने में कहां विफल हुई है. छोटे और सीमांत किसानों सहित खेती से जुड़ा लगभग अस्सी प्रतिशत कृषि कार्यबल ऐसा है, जिन तक सरकार अपनी पहुंच बनाने में सफल नहीं हो सकी है, उन्हें अपनी योजनाओं से लाभान्वित नहीं कर सकी है और जिन्हें वाकई में ज्यादा जरूरत है.

रिजर्व बैंक साफ दिखने वाली इस असमानता पर मूकदर्शक कैसे बना हुआ है? क्या इतने वर्षो में उसे सच्चाई नहीं दिखनी चाहिए थी? क्या यह सब जानबूझकर किया जा रहा है?

एक खबर के अनुसार, पिछले पांच वर्षो में कृषि ऋण की राशि ढाई गुना तक बढ़ाई गई, लेकिन पूरे संस्थागत ऋण में से 6 प्रतिशत से भी कम हिस्सा छोटे और सीमांत किसानों को उपलब्ध कराया जा सका. विडंबना है, सत्तारूढ़ दल में प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, कृषि मंत्री समेत अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों की एक पूरी फौज है, जो छोटे और सीमांत किसानों तक ऋण पहुंचने की बात कहते थकती नहीं है. लेकिन न पहुंच पाने को लेकर तनाव महसूस नहीं करती है.

वर्ष 2007 में बैंकों द्वारा 2,29,400 करोड़ रूपए के ऋण दिए गए थे. इसमें छोटे किसानों का हिस्सा मात्र 3.77 प्रतिशत ही था. दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो 96.23 प्रतिशत कृषि ऋण का वितरण बड़े किसानों या कृषि व्यापार में लगी कंपनियों को किया गया. वर्ष 2011-12 में कृषि ऋण बांटने का लक्ष्य 5,09,000 करोड़ रूपए तक बढ़ाया गया, पर केवल 5.71 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान लाभान्वित हो सके.

यह जानते हुए भी कि गड़बड़ी है, सरकार छोटे और सीमांत किसानों के नाम पर कृषि व्यापार से जुड़ी कंपनियों का समर्थन करती रही है. 1993 में कृषि ऋण की व्याख्या विशद की गई थी, इसमें कृषि व्यापार कंपनियों, कृषि उपकरण बनाने वाले निर्माताओं, वेयरहाउस को भी शामिल किया गया. ऐसे ही अन्य लोग हैं, जो 4 प्रतिशत ब्याज दर का लाभ उठा लेते हैं. यह झटके देने वाला रहस्योद्घाटन है कि 74,000 करोड़ रूपए का जो कृषि ऋण माफ किया गया था, उसका एक बड़ा हिस्सा लक्षित जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाया.

यह महत्वपूर्ण है, पी. चिदंबरम अपने बजट भाषण 2013 में यह स्पष्ट करेंगे कि वास्तव में कितना ऋण कृषि क्षेत्र के लिए है, छोटे और सीमांत किसानों के लिए है. किसानों के नाम पर व्यावसायिक उपक्रमों को 4 प्रतिशत की मामूली ब्याज दर पर ऋण देने में कोई आर्थिक बुद्धिमानी नहीं है. किसानों के नाम पर वितीय संसाधनों को कारपोरेट्स की ओर चतुराई पूर्वक खींचने का काम अवश्य बंद होना चाहिए.

यही वह प्राथमिक कारण है, जिसके चलते छोटे और सीमांत किसान अपने हाल पर छोड़ दिए गए हैं. उनके पास उन सूदखोर ऋणदाताओं पर निर्भर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, जो बेहिसाब सूद वसूलते हैं. कोई आश्चर्य नहीं, किसानों द्वारा आत्महत्या का सिलसिला खत्म नहीं हो रहा है. इसका संस्थागत ऋण के अभाव से बड़ा सरोकार है.

20.02.2013, 20.34 (GMT+05:30) पर प्रकाशित