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मस्तराम कपूर का जाना

बहस

 

मस्तराम कपूर का जाना

रघु ठाकुर

मस्तराम कपूर


मस्तराम कपूर पिछले कुछ दिनों से बीमार थे. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था तथा 4-5 दिन पूर्व वे अस्पताल से वापिस घर आये थे. मैंने 31 मार्च की रात्रि जब उन्हें फोन किया तो वे दवा लेकर सो चुके थे. उनकी नातिन ने बताया कि उनके गले में तकलीफ थी. 1 अप्रैल को मैं रात्रि की रेल से लगभग साढ़े दस बजे दिल्ली से बाहर चला आया. 2 अप्रैल की रात्रि 8 बजे मुझे दिल्ली के मित्र, एडवोकेट एस. एस. नेहरा का फोन मिला कि मस्तराम कपूर साहब का दिन में निधन हो गया. यह समाचार मेरे लिये अत्यधिक पीड़ादायक था. मुझे उनके ऐसे आकस्मिक निधन की जरा भी आशा नहीं थी वरना मैं 2 अप्रैल व उसके आगे के कुछ दिन के दौरे स्थगित कर देता तथा उनकी अंतिम विदाई का हिस्सेदार बन पाता.

स्वर्गीय मस्तराम कपूर सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होकर दिल्ली में रहने के लिये आये थे. राजकुमार जैन (दिल्ली के समाजवादी साथी) से उनकी मुलाकात हुई तथा राजकुमार जैन ने ही संभवतः 1979-80 में उनकी मुलाकात स्वर्गीय मधु लिमये से कराई. यह रहस्योद्घाटन भी राजकुमार जैन ने ही 8 जनवरी 2013 को, स्व. मधु लिमये की स्मृति में आयोजित स्मृति सभा में किया था.

उसके बाद से डॉ. मस्तराम कपूर, स्व. मधु लिमये के नजदीकी सहयोगियों में से एक बन गये तथा स्व. मधु लिमये के जीवनकाल में लगभग प्रतिदिन उनके निवास पर जाने वाले उनके सहयोगी भी. स्व. मस्तराम जी, स्व. लाड़ली मोहन निगम के यहां वेस्टर्न कोर्ट में भी अमूमन आते थे.

मैं, स्व. लाड़ली जी के साथ, वेस्टर्न कोर्ट में रहता था तथा दिल्ली के लगभग हर प्रवास के अवसर पर, स्व. मधुजी के पहले 17 वेस्टर्न कोर्ट के कमरे पर व बाद में पंढ़ारा रोड के मकान पर नियमित जाता था. वहीं डॉ. मस्तराम कपूर जी से मेरी मुलाकात हुई तथा हम लोग एक दूसरे के नजदीक आये. स्व. मधु लिमये के निधन के पूर्व की कई रात्रि हम लोग (डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल में) साथ-साथ रहे थे.

1997-98 में जब मैं लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के निर्माण की तैयारी कर रहा था तब, पार्टी के संविधान - घोषणा पत्र व नीति वक्तव्य के निर्माण में, स्व. डॉ. मस्तराम कपूर ने काफी परिश्रम किया था. हम लोगों ने कई दिनों तक घंटों बैठकर इन दस्तावेजों को तैयार किया था. डॉ. साहब ने मेरे साथ ललितपुर, सागर, ग्वालियर, नैनीताल आदि जगहों की कई यात्रायें की तथा विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया. पार्टी के कई प्रशिक्षण शिविरों में भी हम और वे साथ-साथ रहे.

उन्होंने अनेकों पुस्तकों की रचना की तथा अपना एक प्रकाशन भी आरंभ किया. उन्होंने बाल साहित्य से लेकर उपन्यास तक लिखे. ’’ कौन जात हो ’’ उनका एक उपन्यास था. यद्यपि वे विभिन्न लेखकीय विधाओं के लेखन में लगे रहने के कारण किसी एक विधा के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित नहीं हो पाये.

पिछले कुछ वर्षों से उन्होंने लोहिया साहित्य का संकलन कर उसे पुनः प्रकाशित कराने का कार्य आरंभ किया था. स्व. लोहिया का साहित्य छोटी-बड़ी पुस्तकों के रूप में हैदराबाद से, स्व. बद्री विशाल पित्ती के सहयोग से छपता रहा था. स्व. लोहिया जी के जीवनकाल में उनके भाषणों को संग्रहित कर छपाना तथा बिक्री हेतु पार्टी की शाखाओं को उपलब्ध कराने में पित्ती जी का बड़ा योगदान था. लोहिया की मृत्यु के 3 दशकों के बाद तक भी हैदराबाद से समता न्यास के माध्यम से लोहिया साहित्य का निरंतर प्रकाशन व वितरण होता रहा. यद्यपि 1990-95 के बाद प्रकाशन तो बंद हो गया था परन्तु प्रकाशित पुस्तकों के भंडार को विक्रय हेतु वितरण का कार्य फिर भी जारी रहा. वर्ष 2002-03 के बाद उन्होंने लोहिया साहित्य के विक्रय का एक उपकेन्द्र दिल्ली में राजेन्द्र प्रसाद मार्ग पर स्व. जनेश्वर मिश्र के निवास पर स्थापित कराया था, जो कुछ दिनों चला भी.

स्वर्गीय मस्तराम कपूर ने, लोहिया के उस प्रकाशित साहित्य को एकत्रित कर ’’लोहिया समग्र’’ के रूप में 9 खण्डों में पुनः प्रकाशित कराया. ’’अनामिका’’ प्रकाशन ने इसे छापा तथा इस प्रकाशन से लोहिया साहित्य की उपलब्धता के अभाव की भी पूर्ति हुई तथा बड़ी-बड़ी पुस्तकों के आकार में वह क्रय - क्षमतावान व्यक्तियों व संस्थाओं तक पहुंच सकी. निस्संदेह यह एक श्रमसाध्य व लग्नशीलता का कार्य था, जिसे उन्होंने संपन्न किया. लोहिया शताब्दी वर्ष व उसके बाद में इस लोहिया रचनावली के प्रकाशन की पर्याप्त चर्चा देश में हुई.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Tularam Athya [athya@rediffmail.com] Brgumganj Raisen M.P. - 2013-04-10 07:31:05

 
  स्व. मस्तराम कपूर जी को हमारी ओर से भी विनम्र श्रद्वांजली 
   
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