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शिक्षा, शिक्षक और अधिकार

बहस

 

शिक्षा, शिक्षक और अधिकार

संदीप पांडेय

शिक्षा का अधिकार


मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार लागू हुए तीन साल बीत गए हैं, किंतु अभी तक शिक्षा न तो मुफ्त हो पाई है और न ही अनिवार्य. हम कितने ही बच्चों को देख सकते हैं जो दुकानों पर काम करते हैं, रेलवे के डिब्बों में झाड़ू लगाने अथवा करतब दिखाने आते हैं, घरों में काम करते हैं या फिर उन कारखानों में काम करते हैं जहां काफी खतरा है. कानूनन बाल श्रम प्रतिबंधित है, पर इन दोनों कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. कारण साफ है कि इससे शासक वर्ग सीधे प्रभावित नहीं होता.

भारत ने सभी जी-8 देशों की तरह समान शिक्षा प्रणाली नहीं अपनाई है, जिसकी वजह से हमारे यहां दो किस्म की शिक्षा व्यवस्थाएं हैं-एक पैसे वालों के बच्चों के लिए निजी विद्यालयों की तथा दूसरी गरीब लोगों के लिए सरकारी विद्यालयों की. भारत में कक्षा आठ तक पहुंचते-पहुंचते आधे बच्चे विद्यालय से बाहर हो जाते हैं. सिर्फ 10 प्रतिशत बच्चे ही विद्यालय की दहलीज पार कर महाविद्यालय में प्रवेश पाते हैं. अभी तक हम सभी बच्चों के लिए एक अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध नहीं करा पाए हैं.

साक्षरता दर बढ़ाने के लिए सरकार ने विद्यालय स्तर पर बच्चों को अनुत्ताीर्ण न करने की नीति अपनाई हुई है. उत्तर प्रदेश में बोर्ड परीक्षा में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि प्रश्नों के उत्तर सार्वजनिक रूप से बोल-बोल कर लिखाए जा रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले हमारे ज्यादातर बच्चे काबिल ही नहीं होंगे.

यह बहुत शर्म की बात है कि हाई स्कूल या इंटरमीडिएट किए हुए बच्चे हिंदी का एक वाक्य भी ठीक से नहीं लिख सकते. इन्हें कोई नौकरी पर रखना ही नहीं चाहता. अत: बेरोजगारों, जिनके लिए अखिलेश यादव की सरकार प्रति माह एक हजार रुपये बेरोजगारी भत्ता देने की योजना चला रही है, को नौकरी न मिल पाने के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि वे किसी लायक ही नहीं.

यहां ध्यान देने योग्य बात है कि उत्तर प्रदेश सरकार की बेरोजगारी भत्तो की योजना सिर्फ पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए ही है. अनपढ़ के लिए तो महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना है. इस योजना में भी बेरोजगारी भत्तो का प्रावधान है, किंतु अनुभव से पता चलता है कि यह बेरोजगारी भत्ता प्राप्त करना बड़ा मुश्किल है. नकल करने-कराने वालों का बड़ा दबदबा है. कोई इनका विरोध नहीं कर सकता.

जब एक छात्र आदित्य अस्थाना ने हरदोई जिले के विकास खंड कछौना में स्थित एमएएन इंटर कॉलेज के प्रबंधक को छह हजार रुपये देने से मना कर दिया तो उसकी पिटाई हो गई. जिला विद्यालय निरीक्षक, जिलाधिकारी, सचिव, बेसिक शिक्षा से शिकायत का अभी तक कोई परिणाम नहीं निकला है.

जब कछौना के ही पत्रकार ने अपने मोबाइल से हरदोई में जिला विद्यालय निरीक्षक के नियंत्रण कक्ष को नकल के विषय में शिकायत की तो कुछ देर में उनके मोबाइल पर निजी कॉलेजों के प्रबंधकों के फोन आने लगे, जिससे यह स्पष्ट है कि नकल कराने में निजी विद्यालयों के प्रबंधकों तथा शिक्षा विभाग के कर्मचारियों की साठगांठ रहती है. इसी तरह जब एक उड़नदस्ते ने फैजाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध एक कॉलेज में नकल पर रोक लगाई तो प्रबंधकों ने उच्च अधिकारियों से शिकायत की और नकल करने-कराने वालों के बजाए उड़नदस्ते के खिलाफ ही कार्रवाई हो गई.

नियम तो यह है कि जिस विषय की परीक्षा हो रही है, उस विषय का अध्यापक परीक्षा सदन में नहीं रहना चहिए, लेकिन शिक्षक अपनी ड्यूटी लगवा लेते हैं. इसके अलावा यदि कोई छात्र पढ़ाई में अच्छा है तो यह उसके लिए अभिशाप बन सकता है. हो सकता है कि उसी से जबरदस्ती नकल कराने को कहा जाए. नकल की सामग्री बड़ी सफाई से विद्यालय परिसर के अंदर निर्माण सामग्री जैसे बालू के ढेर में छुपा कर रखी जाती है. निजी कोचिंग चलाने वाले कॉलेजों में दाखिला दिलवाने से लेकर परीक्षा पास करवा अंक पत्र दिलवाने तक का ठेका लेते हैं. हरेक चीज की एक कीमत होती है.

जौनपुर जिले में यदि कोई किसी निजी विद्यालय में बिना कक्षा में उपस्थित हुए हाईस्कूल या इंटर की परीक्षा पास करना चाहता है तो उसे पांच हजार रुपये देने होंगे. यदि कोई बिना परीक्षा दिए प्रथम श्रेणी से पास होना चाहता है तो उसे 25 हजार रुपये देने होंगे. इतने रुपयों में परीक्षार्थी की जगह किसी अन्य व्यक्ति को बिठा कर परीक्षा दिलवाने की व्यवस्था की जाती है.

सरकार द्वारा संचालित विद्यालयों तथा वित्तपोषित निजी विद्यालयों की स्थिति वित्तविहीन निजी विद्यालयों से थोड़ी बेहतर होती है. परीक्षा के लिए ऐसे केंद्रों पर परीक्षार्थियों की संख्या कम होती है जहां नकल की गुंजाइश कम रहती है. जो केंद्र नकल के लिए बदनाम हैं वहां पर अन्य जिलों और यहां तक कि नेपाल से लोग आकर परीक्षा देते हैं. अब तो कई निजी विद्यालय खोले ही इसलिए जा रहे हैं, क्योंकि परीक्षा के दौरान मोटी कमाई हो जाती है. चूंकि सरकारी विद्यालय या वित्तपोषित निजी विद्यालय भी पीछे नहीं रहना चाहते अत: वे भी अपने यहां छात्रों को आकर्षित करने के लिए नकल कराने का वायदा करते हैं और उसके बदले में कुछ सुविधा शुल्क भी लेते हैं. अन्यथा उनके यहां कोई पढ़ने ही नहीं आएगा.

बलिया के एक शिक्षक ने चुभने वाली बात कही कि अभी शिक्षक इतने तो काबिल हैं कि नकल कराने के लिए किस प्रश्न का उत्तर पुस्तक में कहां मिलेगा, खोज कर निकाल सकते हैं, किंतु शिक्षकों की जो अगली पीढ़ी आएगी वह नकल कराने के काबिल भी नहीं होगी, क्योंकि उसने तो कभी पुस्तक पढ़ी ही नहीं होगी.

11.04.2013, 10.33 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

dr. ritu tyagi [ritu.tyagi108@gmail.com] meerut - 2013-06-05 13:20:20

 
  आज के दौर में अध्यापक का दायित्व बढ गया है । किंतु देखने में आता है कि अध्यापक मात्र पाठयक्रम पूराकर अपने दायित्व बोधकी इतिश्री समझ लेता है । जब तक अध्यापक के भीतर छात्र को अपना समझने की भावना नहीं जागेगी तब तक कोई सुधार संभव नहीं । 
   
 

savita prathmesh [savitaprathmesh@yahoo.in] bilaspur chhattisgarh - 2013-05-27 05:39:24

 
  निश्चित रूप से आज की तारीख में भारत में शिक्षा की दशा और दिशा दोनों ही शोचनीय है. कारन तलाशे तो ढेरों मिल जायेंगे .. प्रशासन की तरफ से अनेक अनियमितता,शालाओ की दयनीय दशा,पढाई के उचित माहौल का अभाव,शिक्षको से गैर शिक्षकीय कार्य लेना ... न जाने कितने ही कारण है .. मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए की शिक्षा के दो महत्वपूर्ण स्तम्भ है शिक्षक और शिक्षार्थी . दोनों ही जीवित हाड -मांस के पुतले .. ज़ाहिर है ऐसी अवस्था में ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है क्योंकि यहाँ पर भावनाओं का भी सवाल होता है. तात्पर्य यह की शिक्षा प्रदान करना जिसके लिए शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है बिलकुल ही अलग किस्म का व्यवसाय है , जहा शिक्षक का रोज़ ही अलग-अलग तरह की मानवीय भावनाओ से साबका पड़ता है .इस लिहाज़ से देखा जाये तो शिक्षक की अति महत्वपूर्ण भूमिका होती है .और आज अगर हम शिक्षा की दशा और दिशा पर आंसू बहाते है तो कंही न कही इसकी ज़िम्मेदारी शिक्षको को लेनी ही होगी .उन्हें आत्म मंथन करना होगा की अपने कर्तव्यों का वे कितनी ईमानदारी से निर्वहन कर रहे है.? सरकारी शालाओ में ठीक है की सभी विद्यार्थियों को उत्तीर्ण करने की बात है , लेकिन यह तभी होगा जब बच्चा एम.एल.एल. यानि मिनिमम लर्निंग लेवल तक पहुँच जाये . इसके लिए सतत मूल्यांकन की वयवस्था है . जिसमे शिक्षको का दायित्व है की वह विद्यार्थी को सिखाने के उचित स्तर तक लाये .प्रश्न है की कितने प्रतिशत शिक्षक छात्रों के साथ मेहनत करते है? 
   
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