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जिंदगी उलझी सुलझी

बहस

 

जिंदगी उलझी सुलझी

प्रीतीश नंदी

जीवन की उलझनें


मैं अपने जीवन से कई बार खुद ही आश्चर्यचकित हो जाता हूं. इसकी शुरुआत शायद मेरे बचपन में ही हो गई थी. मैं एक अच्छे स्कूल में पढ़ता था. हम इसका खर्च उठा सकते थे, क्योंकि मेरी मां वहां टीचर थी. लेकिन दो सफेद कमीज, जिनके कॉलर घिस जाने पर मां ने उसे पलट दिया था; दो सफेद पैंट , पहले हाफ और बाद में फुल, ठंड के महीने में ग्रे कलर की; स्कूल की एक टाई और खास मौकों पर पहनने के लिए एक जैकेट के अलावा शायद ही ऐसी कोई चीज थी, जिसे मैं अपना कह सकता था.

किताबें सेकंड हैंड होती थीं और अगली क्लास में जाने पर हम उन्हें लौटा देते थे. हम स्कूल की लाइब्रेरी में किताबें पढ़ते और मैग्जीन पढ़ने के लिए वाईएमसीए की स्थानीय लाइब्रेरी में जाते. खाना खाने कभी बाहर नहीं जाते, लेकिन जमकर तैराकी और बॉक्सिंग करते और स्कूल में दोस्तों के साथ खूब खेलते हार-जीत की चिंता किए बगैर. घर में मेरा कोई अलग कमरा नहीं था, न ही स्टडी टेबल थी. मेरे बड़े भाइयों को ये सुविधाएं मिली थीं. साल में एक बार मैं यात्रा करता, धीमी चलने वाली ट्रेन से मध्यप्रदेश के सिवनी जाता, जहां मेरी मौसियां सरकारी स्कूल मं पढ़ाती थीं.

क्या मुझे कभी लगा कि मेरे पास वे चीजें नहीं थीं, जो होनी चाहिए थीं? मुझे ऐसा याद तो नहीं आता. सच तो यह है कि मैं खूब मस्त रहता और यह सोचता कि जिंदगी इससे खूबसूरत नहीं हो सकती. मेरे सारे अच्छे दोस्त भी उसी दौरान बने. मुझे अक्सर प्यार हो जाता और कभी दिमाग यह नहीं सोच पाता था कि मेरी किशोरावस्था में इतनी सारी खुशियां लाने वाली उन खूबसूरत लड़कियों को गिफ्ट देने के लिए भी मेरे पास पैसे नहीं होते थे. हाथ से लिखी एक चिट्ठी या कविता या फिर चोरी-छुपे सिगरेट के एकाध कश ही खुश करने के लिए पर्याप्त होते.

फिर मैं कॉलेज में पहुंचा और जिंदगी जैसे थोड़ी ठहर-सी गई. इसके बाद मैंने कुछ छोटे-मोटे काम किए, 19 साल की उम्र में शादी हो गई और 250 स्क्वायर फीट के खूबसूरत किराये के अपार्टमेंट में रहा, जो इतना छोटा था कि ढंग से पैर फैलाना भी मुश्किल था. मेरी कविताओं की पहली किताब प्रकाशित हुई. नामी-गिरामी दोस्त बधाई देने घर आए. हम सब एक साथ उसी एक कमरे में बिस्तर पर बैठकर गप्पें हांकते, एक साथ खाते-पीते.

मेरे पास कोई किताब नहीं थी, क्योंकि उसे रखने के लिए मेरे पास जगह नहीं थी. संपत्ति के नाम पर एक छोटा-सा टाइपराइटर था, जो अक्सर खराब हो जाता था. धीरे-धीरे जिंदगी बदलती चली गई और इसके साथ कई चीजें बदल गईं, मेरी पहचान तक. मेरे पास एक याशिका 635 कैमरा आ गया. साथ में एक बड़ा और कुरूप दिखने वाला ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविजन भी आया. एडवांस में पैसे देने के बाद मुझे इसके लिए पांच महीने प्रतीक्षा करनी पड़ी थी, तब टीवी खुद सरकार बनाती थी . खराब होने पर इसकी मरम्मत में छह सप्ताह लगते थे और इसे टैक्सी में शोरूम ले जाना पड़ता था. मुझे भी कई बार ऐसा करना पड़ा, जबकि उस समय मैं अधिकतर बस और ट्राम में ही सफर करता था.

फिर मैंने एक सेकंड हैंड स्टैंडर्ड हेराल्ड कार खरीदी. इसके बाद मदर टेरेसा जैसी खूबसूरत एक बेटी हुई, एक बेटा भी जिसे मैं जान से भी ज्यादा प्यार करता था, बड़ा फ्लैट, फ्रिज, म्यूजिक प्लेयर, आगे चलकर मेरी पहचान बनने वाली जींस, खूब मशहूर हुई एक कविताओं की किताब और एक तलाक. यह सब कुछ काफी जल्दी-जल्दी हुआ. मेरी जिंदगी जो अब तक खाली पड़ी थी, अचानक ही व्यस्त हो गई. इतनी व्यस्त कि मेरे लिए ये सब कुछ एक साथ संभालना मुश्किल हो गया.

यह सब हुए एक अरसा गुजर गया. इसके बाद से कई और चीजें भी बदल चुकी हैं. जिंदगी ने मुझे अपनी उम्मीदों से भी ज्यादा दिया है, लेकिन इससे मेरी और ज्यादा पाने की इच्छा कम नहीं हुई है. मैं वे चीजें भी हासिल करना चाहता हूं, जो असंभव हैं. इनमें से कई चीजें मुझे मिल भी चुकी हैं, लेकिन बहुत सारी इच्छाएं अभी बाकी हैं. यह आश्चर्यजनक है कि प्यार और घृणा, खूबसूरती और विद्रूपता, शक्ति और बेबसी से भरी इस दुनिया में लोभ, विनम्र भाषा में इसे महत्वाकांक्षा कह सकते हैं; ही हमें आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करता है.

मेरी जिंदगी में अब कुछ भी बाकी नहीं रहा. मैं कई ऐसी चीजें हासिल कर चुका हूं, जिसके लिए दूसरे जान तक दे सकते हैं. लेकिन मेरे लिए वह किसी कचरे से ज्यादा नहीं है. फिर भी मैं काम के लिए निकलता हूं तो अब भी वही सफेद कमीज और जींस पहनता हूं. खास मौकों पर कोट पहन लेता हूं. टाई लगाए हुए मुझे काफी दिन बीत गए. पिछले साल जब हमने घर बदला तो मैंने अपनी लाइब्रेरी दे दी और मेरा वार्डरोब भी.

लावारिस जानवरों के लिए फंड जमा करने हेतु मैंने ये सारी चीजें दान कर दीं. मेरी पत्नी और बेटियां घर में चिड़ियों के साथ रहते हैं. मेरे खूबसूरत गार्डन में चिड़ियां, तितलियां और गिलहरियां मेरे मन को प्रफुल्लित कर देती हैं. जहां कई सारे पौधे और एक अकेला कमल सूरज की रोशनी में चमकता रहता है.

जिस शहर में मैं बड़ा हुआ, उसकी कमी तो खलती है, लेकिन आसपास मेरे कई दोस्त हैं- बेघर लोग, बच्चे, लावारिस कुत्ते और बिल्लियां आदि. मैं इन सब को नाम से जानता हूं. संपत्ति अभी भी मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती, लेकिन दूसरे लोगों की तरह मेरे पास भी अपनी जरूरतों से ज्यादा चीजें हैं. मैं कोशिश करता हूं. अभी भी प्रयास करता हूं कि अपनी बुराइयां कम कर सकूं. मैं अब भी यह जानने की कोशिश करता रहता हूं कि मैं कौन हूं, मैं क्या चाहता हूं और जिंदगी मुझे कहां लेकर जा सकती है.

हो सकता है एक दिन मुझे ये सब चीजें पता चल जाएं. लेकिन तब तक दूसरे लोगों की तरह मैं भी अपना रास्ता तलाश करने की कोशिश में जिंदगी की गलियों में गुम हो चुका रहूंगा. और हां, तब भी मैं जिंदगी की उलझनों को सुलझाने की कोशिश करता रहूंगा, जिससे इसका कुछ मतलब निकल सके.

12.04.2013, 08.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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