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लोकतंत्र की चुनौतियां

मुद्दा

 

लोकतंत्र की चुनौतियां

ईश्वर दोस्त


भारत के लोकतंत्र ने जैसे-जैसे पत्थरों को अपने सीने पर सहा है, उतने में तो कम-से-कम किसी भी विकासशील देश का लोकतंत्र कब का टें बोल जाता. वैसे तो किसी भी लोकतंत्र में इतनी जीवन-शक्ति होनी चाहिए कि वह विरोधों का सामंजस्य करता रहे और संकटों को जज्ब करता जाए.

लोकतंत्र

भारत में लोकतंत्र को कमजोर करने वाली ताकतों और प्रक्रियाओं की सूची बनाएँ तो वह निश्चित ही उसे मजबूत करने वाली सूची से काफी लम्बी बनेगी. सामन्तवाद और पूँजीवादी या समाजवादी तानाशाही के बरक्स लोकतंत्र की एक खासियत यह होती है कि वह अपनी आलोचना की इजाजत देता है. कई बार जब लोग लोकतंत्र को आड़े हाथों ले रहे होते हैं, भूल जाते हैं कि वे ऐसा करते हुए लोकतंत्र प्रदत्त अधिकार का प्रयोग ही कर रहे हैं.

कई बार लोकतंत्र की आलोचना लोकतंत्र को और बेहतर बनाने के लिए नहीं बल्कि उसके खिलाफ की जाती है. एक अच्छे लोकतंत्र में इसकी भी जगह होनी चाहिए. ऐसे ज्यादातर खतरों का मुकाबला करने के लिए लोकतंत्र उन पर पाबन्दी नहीं लगाता बल्कि उनकी शक्ति खर्च हो जाने या व्यापक प्रक्रिया में जज्ब हो जाने का इन्तजार करता है. मगर लोकतंत्र का संकट बढ़ाने में ऐसी ताकतों का योगदान रहता है.

पश्चिम में जहाँ आधुनिक लोकतंत्र पैदा हुआ, वहाँ आज मोटे तौर पर इसकी प्रतिस्पर्धा में कोई दूसरी व्यवस्था नहीं है. रूढ़िवाद के गैर-लोकतांत्रिक रूप से बेहद कमजोर हो गये हैं, और लोकतांत्रिक रूढ़िवाद ही वहाँ बचा है. सामाजिक जनवाद तो लोकतंत्र से सहमत है ही, अधिकांश यूरोपीय कम्युनिस्ट भी लोकतंत्र से संगति बिठाते हैं और लोकतांत्रिक समाजवाद की सम्भावनाएँ तलाश रहे हैं.

भारत में लोकतंत्र को बकवास या रोड़ा मानने वाली कई विचार-नीतियों का वर्चस्व बना हुआ है. उनकी मजबूरी यह है कि राजनीतिक धरातल पर उन्हें लोकतंत्र प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए ही अपना काम करना पड़ता है या प्रकटतः लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई देनी पड़ती है. और यहीं उन विचार-नीतियों का तर्क कमजोर हो जाता है. उनमें विरोधाभास पैदा हो जाते हैं.

भारत के लोकतंत्र की एक खासियत यह दिखाई देती है कि जब से इसका जन्म हुआ है, संकट किसी-न-किसी रूप में लगा ही हुआ है. संकटों ने इसे हिलाया है, वहीं शायद इसकी प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ा भी दिया है. आपातकाल, रथयात्रा जैसे संकटों से यह निकल गया. यह लोकतंत्र गुजरात जैसे संकटों के साथ कायम है.

भ्रष्टाचार और घोटालों को अगर संकट माना जाए तो नन्दीनुमा बुद्धिजीवी कह उठेंगे कि भ्रष्टाचार का भी तो लोकतांत्रिकरण हो गया है. यानी यह एक अजीबोगरीब लोकतंत्र है. यह इतना अजीबोगरीब लोकतंत्र है कि कई बार स्वयं लोकतांत्रिक संस्थाएँ जैसे राजनीतिक दल, संसद, विधानसभाएँ इसकी जड़ में मट्ठा डालती रहती हैं.

व्यापक अर्थों में पुलिस भी लोकतांत्रिक संस्था है, क्योंकि वह संसद व विधानसभा के अधीन है. मगर पुलिस व प्रशासन जैसी अनेक औपनिवेशिक संस्थाओं का लोकतांत्रिकरण नहीं हो पाया. या कहें होने नहीं दिया गया. औपनिवेशिक संस्थाओं को जातिवाद ने काफी खाद-पानी पहुँचाया और इस तरह एक असंवेदनशील नौकरशाही को जन्म दिया.

लोकतंत्र को बचाने के लिए इन संस्थाओं के भीतर भी लड़ाइयाँ चलती हैं. बहुमतवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच कई बार टकराव खड़ा हो जाता है. ऐसे मौकों पर चुने हुए प्रतिनिधियों से ज्यादा अहम न्यायालय, सी.ए.जी. जैसी संस्थाएँ और कई बार छोटे-मोटे आन्दोलन और मुट्ठी-भर लोगों से बने नागरिक समूह हो जाते हैं, जो संकट के समय संवैधानिक मूल्यों को बचाने का काम कर सकते हैं.

भारत में लोकतंत्र का विचार यूरोप से जरूर आया, मगर उसमें काफी रद्दोबदल भी हुई. यह लोकतंत्र एक तरह से अँग्रेजी राज और उससे लड़ते स्वतंत्रता आन्दोलन की टक्कर से पैदा हुआ. भारत में यूरोप की तरह विकसित पूँजीवाद, औद्योगिक समाज, मजबूत धर्मनिरपेक्षता, साक्षरता और अखबारों की व्यापक पैठ, उदारवादी राजनीतिक विचारों का बोलबाला आदि कारक नहीं थे, जिन्होंने आधुनिक लोकतंत्र को सम्भव किया और मजबूत बनाया. पश्चिमी आधुनिक लोकतंत्र की एक खासियत समाज में व्यक्ति को केन्द्रीय जगह मिलनी थी. व्यक्ति समुदायों के नियंत्रण और निगरानी से मुक्त होकर अधिकारों के मामले में खुदमुख्तार हो चुका था. मगर भारत में अब तक समुदाय और परिवार प्रभावी हैं.

ऐसी हालत में भी भारत में लोकतंत्र आया और अब तक बना हुआ है. यह दुनिया के स्तर पर एक नया प्रयोग था. निश्चित रूप से इसकी अपनी विशिष्ट कमजोरियाँ और मजबूतियाँ हैं. आजादी की लड़ाई का नेतृत्व भारत के मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के हाथों में ही था. साक्षरता व शिक्षा की कमी के चलते समाज का एक बड़ा हिस्सा संविधान और कानूनी पेंचीदगियों से वाकिफ नहीं था.

इसलिए ऊँची जाति के मध्य व उच्चवर्गीय हिस्से ने लोकतंत्र को जनता की तरफ से चलाने का काम अपने हाथ में ले लिया. इसीलिए नेताओं, नौकरशाहों और पैसेवालों का एक सहज गठजोड़ शुरू से कायम हो गया. औद्योगिक पूँजीवाद कमजोर भले था, मगर बाकी दावेदारों की तुलना में राजनीतिक जोड़-तोड़ और नीति-निर्माण को प्रभावित करने की ताकत उसकी ज्यादा थी.

यूरोप में पूँजीवाद ने लोकतांत्रिक मूल्यों की हिफाजत में शुरू में खासी दिलचस्पी दिखायी. मगर भारत में पूँजीवाद की रुचि रूढ़िवाद से लड़ने में नहीं, बल्कि उसका अपने पक्ष में इस्तेमाल करने में थी. अभिजात्य लोकतंत्र की भाषा बोल रहा था, मगर संसाधनों और सम्मान के बँटवारे में दूसरों का हित हड़पने में भी आगे था. वहीं जिन तबकों में गरीबी, अशिक्षा के चलते संविधान के प्रावधानों और कानूनों की चर्चा सबसे कम थी, वे अपनी वंचना के चलते जरूरत पड़ने पर लोकतंत्र के पहरेदार साबित हुए.

भारत में लोकतंत्र आया और बना हुआ है, इसके पीछे निश्चित ही पूँजीवाद के एक आर्थिक व्यवस्था के रूप में ठीक से जम जाने का हाथ है. जिन देशों में सामन्ती या अन्य गैर-पूँजीवादी अर्थ संरचनाओं के आगे पूँजीवाद कमजोर हालत में है, वहाँ लोकतंत्र का स्थायित्व नहीं है. यह हाल कथित समाजवादी देशों का है. मगर पूँजीवाद और लोकतंत्र की प्रतिज्ञाएँ, लक्ष्य और मूल्य आपस में टकराते भी हैं.

पूँजीवाद लोकतंत्र को चुनावी राजनीति के औपचारिक दायरे से आगे बढ़ने नहीं देता. आर्थिक उत्पादन व वितरण के क्षेत्र में लोकतंत्र नहीं आ सकता. लोकतंत्र के अधूरेपन को समाजवाद ही दूर कर सकता है. मगर बीसवीं सदी के अधिनायकवादी समाजवाद का माडल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक रूप से पुनर्नवीकृत समाजवाद. अब पूँजीवादी लोकतंत्र उदारवादी दौर से भी आगे जाकर नवउदारवादी दौर में दाखिल हो गया है. उदारवाद ने लोकतंत्र को सैद्धांतिक तर्क दिया था. मगर आज के दौर के पूँजीवाद का तर्क नवउदारवाद है. नवउदारवाद ने आर्थिक नीतियों के मामले में लोकतंत्र को एक रस्म अदायगी में बदल दिया है.

सरकार कोई भी हो, आर्थिक नीतियाँ एक खास रास्ते पर बढ़ती जाती हैं. खतरा तब और बढ़ सकता है जब कोई फासीवादी लफ्फाज नवउदारवादी मसीहा बनकर उभर आए. भारत की विशिष्ट परिस्थितियों में राजनीतिक लोकतंत्र, आर्थिक पूँजीवाद और सामाजिक रूढ़िवाद आपस में गुँथे हुए हैं. इनमें आपेक्षिक स्वायत्तता भी है और एक-दूसरे के साथ मेलजोल भी. आर्थिक और सामाजिक दायरों में लोकतंत्र अब भी कमजोर है. यह राजनीतिक क्षेत्र के लोकतंत्र के लिए भी खतरा बन सकता है.

लोकतांत्रिक ताकतों के सामने दोहरी चुनौतियाँ हैं. एक तरफ तो नवउदारवादी, फासीवादी, और अन्य हिंसावादी हमलों से लोकतंत्र के उदारवादी वायदे व स्वरूप की हिफाजत करनी है, दूसरी तरफ लोकतंत्र के और लोकतंत्रीकरण का अभियान छेड़ना है. चुनाव सुधार, विकेन्द्रीकरण, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को बढ़ाना, नागरिक अधिकारों के कानून और अमल के लिए संघर्ष करना जैसे कई कार्यभार हैं. लोकतंत्र और समाजवाद की अवधारणाओं के रचनात्मक संवाद की जरूरत बनी हुई है.

13.06.2013, 11.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

komalgupta [komalgupta25397@gmail.com] delhi - 2016-11-03 16:12:50

 
  today, democracy has become a way of politics. which peoples takes benefit every time. but democracy are necessary for each country. as we can see today's. 
   
 

sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] Mandi ( H P) - 2013-06-28 09:24:00

 
  समाजवाद को एक ऐसी टोपी बताया जाता है जिसे हर कोई अपने सिर पर टांग सकता है यानी इसके कई रूप हैं. दोस्त एक नए समाजवाद का नाम ले रहे हैं जिसे वे लोकतांत्रिक तरीके से पुनर्नविकृत बताते हैं. इसकी व्याख्या होनी चाहिए कि ये नया समाजवाद शेष समाजवादों से अलग कैसे है. 
   
 

श्रीश राकेश जैन [] लहार (म.प्र.) - 2013-06-24 05:55:10

 
  निशित रूप से माननीय गंभीर विमर्श |साधुवाद  
   
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