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डांस बार का सच

मुद्दा

 

डांस बार का सच

प्रीतीश नंदी


आखिरकार आठ साल चली लंबी लड़ाई के बाद महाराष्ट्र में डांस बार पर पाबंदी खत्म हो गई है. सुप्रीम कोर्ट ने डांस बार पर प्रतिबंध खत्म करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को कायम रख सही फैसला दिया है. इसके पहले भी राज्यपाल ने प्रतिबंध संबंधी आदेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था. लेकिन राज्य सरकार पाबंदी लागू करने पर अड़ी रही और मध्यवर्ग की 75 हजार से ज्यादा युवतियां बेरोजगार हो गईं.

बार गर्ल

 
इससे खराब बात तो यह हुई कि सरकार ने कोर्ट और मीडिया में उन पर जो अश्लील आरोप लगाए, उनकी वजह से वे कोई दूसरा काम करने लायक नहीं रहीं. सरकार ने डांस बार को ऐसी जगह बताया, जहां लोग लड़कियों से मिलने आते हैं. इस आरोप से यह मतलब निकाला गया कि ये युवतियां सेक्स वर्कर थीं.

किसी अदालत में सरकार का यह दावा सिद्ध नहीं हो पाया और न ही इस दावे के समर्थन में कोई सबूत पेश किया गया. पर सरकार को वह हासिल हो गया, जो वह चाहती थी. इन बेचारी लड़कियों का जीवन और प्रतिष्ठा एक झटके में खत्म हो गया. वे अपराधियों और असामाजिक तत्वों का आसान निशाना बन गईं.

उनमें से कई लड़कियों का तो सामाजिक बहिष्कार हो गया. कई रहवासी इलाकों में तो स्थानीय राजनीतिक गुटों ने इन्हें और इनके परिवारों को आतंकित कर उन्हें वहां से भागने पर मजबूर कर दिया. नतीजा यह हुआ कि इनमें से कई लड़कियां सड़कों पर आ गईं और वही करने लगीं जो करने का उन पर आरोप लगाया गया था, क्योंकि अब उनके सामने कोई विकल्प ही नहीं बचा था.

उन्हें कोई काम देने को तैयार नहीं था. कुछ लड़कियां भागकर खाड़ी के देशों में चली गईं और भयानक आपबीती लेकर लौटीं. कई लड़कियों ने खुदकुशी कर ली. दिखावा करने वाली, गंवार और नैतिकतावादी सरकार ने एक झटके में न सिर्फ हजारों की जिंदगियां और प्रतिष्ठा खत्म कर दीं बल्कि नारी को घृणा की दृष्टि से देखने के उत्साह में उसने ऐसे जताया जैसे वह समाज की गंदगी साफ कर रही हो.

वास्तव में उन्होंने डांस बार को धकेलकर चोरी-छिपे की जाने वाली गतिविधि बना दी. डांस पार्टियां सार्वजनिक जगहों से निकलकर प्राइवेट जगहों पर पहुंच गईं, जहां डांस बार में नाचने वाली लड़कियों की जगह दूसरी लड़कियों ने ले ली जो सिर्फ डांस तक ही सीमित नहीं थीं.

मुझे पहली बार डांस बार में अपनी एक अमरीकन महिला मित्र ले गई थी, जो भारतीय फिल्मों पर पीएचडी करने आई थी. वह अपना काम स्थानीय प्रोडक्शन हाउस में करती और अपनी शामें डांस बार में बिताती, क्योंकि उसे हिंदी फिल्मों के संगीत पर डांस करना अच्छा लगता था.

पुरानी फैशन के ये बार उसे आकर्षित करते. उसे ये अनोखे लगते और हां, वह वहां खुद को महफूज पाती थी. जो बाउंसर वहां मंडराते रहते थे वे यह सुनिश्चित करते थे कि कोई उन लड़कियों को छू भी न सके. सिर्फ उन पर हिंदी फिल्मों की स्टाइल में नोट उड़ाए जा सकते थे.

जो लड़कियां कस्टमर से दोस्ती करना चाहती थीं उन्हें ड्यूटी खत्म होने के बाद बार के बाहर ऐसा करने की इजाजत थी. मुझे भरोसा है कि उनमें से कुछ लड़कियों की अपने कस्टमर से दोस्ती भी होती होगी पर ऐसा तो काम करने की किसी भी जगह पर होता ही है. मित्रता हो ही जाती है. इसलिए यह मानना कि कस्टमर से दोस्ती करने वाली लड़कियां उन्हें कुछ और रियायतें भी देती होंगी, मूर्खतापूर्ण और महिलाओं को नफरत से देखने की मानसिकता बताता है.

अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार के पास डांस बार को फिर खुलने देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. पर फैसले पर जैसी प्रतिक्रिया आई है उससे लगता है कि डांस बार की अनुमति लेना आसान नहीं होगा. हफ्ता चार गुना हो जाएगा और अलग-अलग कारणों से परेशान करना जारी रहेगा. मैं यह जानने के लिए उत्सुक हूं कि कितने ऐसे बार संचालक हैं जो अपना व्यवसाय फिर चलाने का जोखिम लेने की मूर्खता करेंगे.

जहां तक लड़कियों का सवाल है, जिनकी जिंदगी सरकार के नैतिकतावादी रुख से बर्बाद हो गई है उनकी जगह नई लड़कियां ले लेंगीं. मुझे चिंता इस बात की है कि अब भी हमारे बीच ऐसे लोग हैं जो इस प्रकार के भेदभावजनक प्रतिबंधों का समर्थन करते हैं और उस बर्बर व्यवस्था को प्रोत्साहित करते हैं, जो ऐसे फैसलों को लागू करती है. एक ऐसी व्यवस्था जो अपने नागरिकों को रोजगार न दे सके उसे कम से कम उनसे रोजगार छीनना तो नहीं चाहिए.

अजीब बात तो यह है कि इन आठ वर्षों में चार और पांच सितारा होटलें अपने डिस्कोथेक और नाइट क्लब खुलेआम चलाते रहे. वहां डांस करने वाली लड़कियों के बारे में कोई नैतिक मुद्दा नहीं बना. पुरुषों के साथ खुलेआम डांस करने के बावजूद सरकार ने यह आरोप नहीं लगाया कि ये चरित्रहीन लड़कियां हैं. उन्हें सम्माननीय माना गया. उनके चरित्र पर कोई सवाल नहीं उठा. किसी ने उनका बहिष्कार नहीं किया. उनके घर के आगे वह भीड़ जमा नहीं हुई, जो उन्हें वहां से खदेडऩे पर उतारू हों.

दरअसल, सरकार ने एक नई जाति व्यवस्था बना दी है, जिसमें बार में डांस करने वाली मध्यम वर्ग की लड़कियों को निशाना बनाया जाता है. हालांकि वे वहां अकेले या अन्य लड़कियों के साथ समूह में डांस करती हैं.

सरकार उसे टैक्स में मिली हमारी गाढ़ी कमाई को मूर्खतापूर्ण लंबी कानूनी लड़ाई पर खर्च करती रही और वह भी इन लड़कियों को बर्बाद करने के लिए. प्रदेश के राज्यपाल के आदेश पर हस्ताक्षर करने से इनकार करने और हाईकोर्ट की ओर से पाबंदी को खारिज करने के बावजूद सरकार ने कानूनी लड़ाई जारी रखी. वह ऐसा केस लडऩे देश की सबसे ऊंची अदालत गई जो साफतौर पर इन 75 हजार लड़कियों के आजीविका के अधिकार का उल्लंघन करता है.

यह बीमार मानसिकता का नैतिकतावादी शोरगुल क्यों? सुप्रीम कोर्ट की ओर से डांस बार पर प्रतिबंध को खारिज कर दिए जाने के बाद भी सरकार प्रतिबंध लगाने पर जोर क्यों दे रही है? इसके शिकार हुए लोगों को मुआवजा कौन देगा? अपना सामान्य जीवन फिर से हासिल करने में उनकी मदद कौन करेगा?

18.07.2013, 16.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित