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खाद्य सुरक्षा की हकीकत

मुद्दा

 

खाद्य सुरक्षा की हकीकत

देविंदर शर्मा

खाद्य सुरक्षा


पिछले सप्ताह ही सरकार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक लागू कर दिया है. सरकार इस विधेयक को 2014 के आम चुनाव से पहले लागू कराने के लिए आक्रामकतापूर्वक कोशिशें कर रही है. मुझे यहां अधिक चिंता इस बात की है कि सीधे नकद के जरिए कहीं भोजन का अधिकार न दे दिया जाए. इसके भारतीय कृषि के भविष्य और खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर निहितार्थ हैं. यह सच है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए जाने वाला 50 फीसद भोजन या तो बर्बाद हो जाता है या फिर बीच में ही बेईमानी से निकाल लिया जाता है और यह व्यवस्था बुरी तरह भ्रष्टाचार में फंसी है.

गरीब लोगों के पास जो अनाज पहुंचता है, वो कई बार तो उपभोग लायक भी नहीं रहता. इसका मतलब - समाधान यह नहीं है कि इस प्रणाली को ही खत्म कर दिया जाए, लेकिन विश्व की सबसे बड़ी वितरण प्रणाली में सुधार लाकर इसे भ्रष्टाचार मुक्त और ज्यादा कारगर बनाया जा सकता है. यह निश्चित तौर पर सम्भव है. कुछ राज्यों में राशन वितरण प्रणाली में पिछले कुछ सालों में काफी सुधार हुए हैं.

कई दशकों से भारत पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को खत्म करने को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बना हुआ है. पहला प्रयास विश्व व्यापार संगठन के शुरूआती दौर में ऑर्थर डंकल ड्राफ्ट के वक्त हुआ था. विश्व व्यापार संगठन ने पीडीएस को निशाना बनाया था और उसकी इच्छा थी कि भारत में खाद्य सुरक्षा को भी बाजार के भरोसे छोड़ दिया जाए.

भारत की ओर से कड़े विरोध के बाद विश्व व्यापार संगठन पर आखिरकार इस हठ या शर्त को वापस लेने का दबाव बना. बाद में, खाद्य संग्रहण और खरीद प्रणाली को विकेंद्रीकृत करने के नाम पर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में एक और कोशिश की गई, केंद्र को अनाज खरीद की भारी-भरकम जिम्मेदारी से मुक्त कर, अनाज खरीद प्रबंधन, संग्रहण और वितरण राज्यों पर ही छोड़ने की कोशिश हुई. कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने विकेंद्रीकरण करने की पहल का जमकर विरोध किया, जिससे सरकार को निर्णय वापस लेना पड़ा.

कई साल बाद अब एक बार फिर अपने देश में अनाज खरीद की जिम्मेदारी से छुटकारे पर भी जोर दिखाई दे रहा है. कैश ट्रांसफर को भी उसी नीति परिवर्तन के नजरिये से देखा जाए, जिसके प्रयास लगातार होते रहे हैं. मसलन, खाद्य मंत्रालय फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) से चाहता है कि वह संघीय भूमिका से ध्यान हटाकर एक व्यापारिक भूमिका में आए, जिससे वह अनाज निर्यात के अवसरों की दिशा में बढ़ सके और अनाज के वायदा कारोबार से जुड़े, अनाज भंडार के बढ़ते हुए आधिक्य (सरप्लस) की स्थिति में यह मुनाफा कमा सके. कोशिश यह भी है कि सुरक्षित भंडार की जरूरत को देखते हुए एक निश्चित सीमा तक ही अनाज की खरीद हो. अगर ऎसा हुआ, तो बड़ी संख्या में किसान गेहूं, चावल पर मिलने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ लेने से वंचित हो जाएंगे. मौजूदा वक्त में, एफसीआई मंडियों में आने वाले अतिरिक्त अनाज को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिए बाध्य है. एक बार अगर एफसीआई की यह भूमिका खत्म हो जाती है, तो किसान बाजार की कृपा पर ही निर्भर रहेंगे.

गरीब लाभान्वितों के हाथ में सीधे नकद देने का मतलब है पीडीएस राशन की दुकानों पर कम दबाव. इसके पीछे सोच है कि कूपन देकर या नकद के रूप में खाद्य अधिकार प्रदान कर यह लोगों पर छोड़ दें कि वे अपना हिस्सा बाजार से खरीद लें. अब जो राशि मुहैया कराई जाएगी, वह चाहे शराब, जंक फूड या दूसरी उपभोग की वस्तुएं खरीदने में चली जाए!

लेकिन सबसे ज्यादा अहम बात यह है कि यह किस प्रकार अनाज खरीद प्रणाली को खत्म करने की ओर लक्षित है. अगर मेरे पास कोई कूपन है, तो मैं निश्चित तौर पर बाजार में निजी दुकान पर अपना भोजन अधिकार खरीदने जाऊंगा, तो ऎसे में राशन की दुकानें तो बेकार हो जाएंगी, तो बड़ी चतुराई से यह रास्ता अपनाया गया है. एक बार जब सीधा नकद देना शुरू होगा, राशन की दुकानें धीरे-धीरे बंद हो जाएंगी और ऎसा होते ही अनाज खरीदने की निश्चित सीमा निर्धारित हो जाएगी, जो कि एफसीआई के लिए सुझाई गई है. गेहंू और चावल के किसान अब ज्यादा समय तक न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं पा सकेंगे. किसान व्यापार की अनिश्चितताओं के आसरे छोड़ दिए जाएंगे.

खाद्यान्न की सरकारी खरीद व्यवस्था को वापस लेने की नीति का असर खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा. इससे किसान खेती से दूर होते जाएंगे और शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन करने लगेंगे. यही वह यथार्थ है, जिसके लिए विश्व बैंक कई वर्षो से प्रयास कर रहा है. अब यह निश्चित-सा है कि विश्व बैंक/आईएमएफ के इशारे पर सरकार काफी लम्बे समय से खाद्यान्न की सरकारी खरीद और वितरण को वापस लेने का मानस बना रही थी.

कैश फॉर फूड व्यवस्था से ऎसा करने में आसानी रहेगी. खाद्यान्न की जरूरत आयात से पूरी होगी और सरकार के बीच पहले से ही यह प्रबल सोच रही है कि देश में खाद्यान्न उत्पादन पर ज्यादा धन खर्च करने की बजाए पश्चिमी देशों से अनुदानित खाद्यान्न का आयात कर लिया जाए. इसकी वह वकालत भी करती रही है. खुदरा में एफडीआई उस समय आई, जब अनुबंध खेती की बड़ी आवभगत की जा रही थी.

यह विचार किसानों की नकदी फसलों को सुपरमार्केट से जोड़ता है. इससे सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से बचने में मदद मिलेगी और धीरे-धीरे सब्सिडी भी कम होगी. विश्व व्यापार संगठन तो यही चाहता आया है. सरकारी खरीद को खत्म करने का मुद्दा भारत में संवेदनशील है. शुरूआत नब्बे के दशक में हो गई थी और अब तो इसे अंतिम रूप दिया जा रहा है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कई बार कह चुके हैं कि देश के पास उसकी जरूरत से 70 फीसदी खाद्यान्न ज्यादा है. कैश फॉर फूड योजना से वही हासिल होगा, जो डब्ल्यूटीओ/विश्व बैंक/ आईएमएफ वर्षो से कहते आ रहे हैं. यह वही समय है, जब खेती में लगी आबादी को गांवों से बाहर जाने को प्रेरित किया जा रहा है और कृषि व्यापार का नया ढांचा जगह बना रहा है.

19.09.2013, 22.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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