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ये है मुंबई मेरी जान

विचार

 

ये है मुंबई मेरी जान

प्रीतीश नंदी


मुंबई की पहचान इसकी जिंदादिली और आजाद ख्याल जीवनशैली है. कभी नाइट लाइफ इसकी पहचान हुआ करती थी. पर यह नैतिक पहरेदारों के आने के पहले की बात है. अब आदित्य की पहल से यह आस बंधी है कि वह मुंबई फिर लौट आएगी.

मुंबई


यह एक ऐसा विचार है जो एक अरसे से इंतजार कर रहा था कि कोई तो उस पर बोले. यह विचार है मुंबई की नाइट लाइफ को जिंदगी देने का. अब शिवसेना की युवा इकाई युवा सेना के नेता आदित्य ठाकरे ने इसका समर्थन किया है. वे मानते हैं कि मुंबई जैसे महानगर में कुछ नाइट लाइफ तो जरूरी है.

उन्होंने बृहन मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में प्रस्ताव रखने को कहा है कि मुंबई में कम से कम रेस्त्रां, जैसी खाने-पीने की जगहों और दूध व दवाई की दुकानों को 24 घंटे खुले रहने की इजाजत होनी चाहिए..

आदित्य की इस पहल से मुझे दो कारणों से खुशी हुई है. एक तो यह है कि शिवसेना के प्रभुत्व वाली महानगरपालिका में इस प्रस्ताव के पारित होने की गुंजाइश ज्यादा है क्योंकि यह आदित्य ठाकरे की ओर से आया है. दूसरा यह कि यह विचार इस दृष्टिकोण को खारिज करता है कि नाइट लाइफ एक गंभीर सुरक्षा खतरा है. सच तो यह है कि इस महानगर में क्रूरतम अपराध और आतंक की सबसे कायराना वारदातें दिनदहाड़े ही हुई हैं. यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो आप आकड़ो से इसकी पुष्टि कर सकते हैं.

इसके बावजूद हम इस मूर्खतापूर्ण दृष्टिकोण से चिपके हुए हैं. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हम इस मूर्खतापूर्ण दृष्टिकोण पर जोर देते हैं कि यदि महिलाएं जीन्स पहनना बंद कर दें, धूम्रपान व मदिरापान छोड़ दें अथवा फिल्मों में आइटम सांग बंद कर दें तो दुष्कर्म की घटनाएं चमत्कारिक रूप से बंद हो जाएंगी. हम यह भी सोचते हैं कि यदि सारे डांस बार बंद होने पर मजबूर कर दिए जाएं तो सूर्यास्त के बाद सारे पुरुष चुपचाप अपने घर चले जाएंगे.

शुक्र है कि जिंदगी इस तरह नहीं चलती और लोगों को हमेशा ही ऐसे बकवास विचार पसंद नहीं आते. महामूर्ख माने जाने वाले लोग भी इस तरह की बातों पर हमेशा भरोसा नहीं करते. इसलिए जहां खाप पंचायतें और श्रीराम सेनाएं ऐसे मामले उठाकर हमारी जिंदगी मुश्किल बनाने के लिए मुल्लाओं से होड़ कर रही हैं, वहीं इन विवादों में उनकी जीत के वाकये कम हैं, बहुत कम.

यह विचार ही मुझे बहुत रोमांचित कर देता है कि मुंबई कभी न सोने वाले महानगर के रूप में अपनी पहचान को फिर कायम कर सकती है. नहीं, मुझे नींद नहीं आने की बीमारी नहीं है. पर आदित्य की तरह मेरा भी हमेशा से यह मानना है कि मुंबई और न्यूयॉर्क का मस्तीभरा मिजाज एक जैसा है, जिसे कोई बात दबा नहीं सकती, उसकी यह भावना कुचल नहीं सकती.

न्यूयॉर्क के लोगों ने भी ट्विन टॉवर पर आतंकवादी हमले के बाद आतंक को अपने आप पर हावी नहीं होने दिया. वे बहुत जल्दी इस हादसे से उबर तो गए ही, उन्होंने पूरी हिम्मत के साथ यह दिखा भी दिया कि मुठ्ठीभर आतंकवादी यह तय नहीं कर सकते कि उन्हें अपनी जिंदगी कैसे जीनी है. न्यूयॉर्क ने ठीक उलटा रास्ता अपनाया. आज यह इतना रोमांचक, इतना खुला और आजाद महानगर है, जितना यह कभी नहीं था. इसी विशेषता के कारण यह शहर इतना खास है. और न्यूयॉर्क की तरह की जिंदादिली, भारत के किसी और शहर से कही ज्यादा, मुंबई की हवाओं में घुली हुई है. फिर क्यों नहीं हम इसे चौबीसों घंटे चहल-पहल से गुलजार रख सकते?

हालांकि यह बेहतरीन शुरुआत होगी, लेकिन सिर्फ रेस्त्रां और खाने-पीने की दुकानें ही रात में खुली रखना काफी नहीं है. देर रात शूटिंग खत्म होने या किसी दफ्तर का काम खत्म होने के बाद पांच सितारा होटल को छोड़कर कहीं और का स्वाद लेना बहुत ही मजेदार होगा. दुकानें, केमिस्ट शॉप, जिम, स्पॉ, बुकस्टोर, सिनेमाघर, म्यूजिक कंसर्ट मतलब एक गुलजार नाइटलाइफ के लिए जो भी जरूरी है उस सबको इजाजत मिलनी चाहिए, ताकि हम सबकी उस शहर में वापसी हो सके जो यह था यानी वास्तव में एक वल्र्ड क्लास सिटी. पर वह बात उन नैतिक पहरेदारों के आने के पहले की है, जिन्होंने इस शहर की उस जीवंतता को कुचल डाला.

आदित्य के पास एक और आइडिया है. वे चाहते हैं कि पूरे महानगर को वाई-फाई कर दिया जाए. ठीक सिंगापुर की तरह. फिर कहना होगा कि यह भी सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं है. आप इस डर से टेक्नोलॉजी को आने से नहीं रोक सकते कि कुछ लोग उसका दुरुपयोग कर सकते हैं. ऐसा करने से शहर में हर व्यक्ति हर समय एक-दूसरे जुड़ा होगा. यह जुड़ा हुआ शहर होगा. सुरक्षित शहर होगा. वर्तमान की तुलना में बहुत ज्यादा कार्यक्षम और हरा-भरा शहर होगा. इससे मुंबई के आधारभूत ढांचे पर पड़ रहा बोझ कुछ कम होगा, जो अत्यधिक दबाव में है.

मैं यह भी चाहूंगा कि राजनीति की नई भाषा पुराने घिसे-पिटे जुमलों और बेबुनियाद खौफ व कयामत आने की बातों से आजाद हो जाए. यह सब लंबे समय से हमारे राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं. अब यह समझने का वक्त आ गया है कि आजादी में भी मर्यादा तय करने और संतुलन बनाने के तरीके निहित हैं. महत्व इस बात का है कि हम उदारवादी मूल्यों की ओर लौटें. फिर एक फौलादी इच्छा शक्ति रखने वाला निर्भीक शहर बनकर दिखाएं. मैं उस मुंबई को जानता हूं, क्योंकि मैं यहां तीस साल पहले आया था और फिर लौटकर नहीं गया. मुंबई या तब के बॉम्बे ने मेरी जिंदगी ही नहीं बदली, मुझे भी बदल दिया.

इसके अक्खड़पन, बेरुखी, डींगे हांकने की आदत, लालच, अहंकार से मुझे नफरत थी पर बाद में मैंने पाया कि अरे, इस सबके कारण तो इसमें वह कशिश पैदा होती है जिसके लिए यह शहर जाना जाता है. इसने मुझे सिखाया कि दूसरों का मूल्यांकन मत करो, उनकी आजादी का उतना ही सम्मान करो, जितना मैं अपनी स्वतंत्रता की पूरी ताकत से रक्षा करता हूं. मैं तो बस, मुंबई के आकर्षण में बंध गया. और किसी बात की परवाह ही नहीं की. चरमराता आधारभूत ढांचा. खराब सड़कें. खचाखच भरी ट्रेनें. महंगी जीवनशैली जो हर किसी को और कड़ी मेहनत करने पर मजबूर करती है तथा शर्मनाक दिखावा. इन सबका मेरे लिए कोई अर्थ नहीं था.

हर किसी को यहां काम करने में मजा आता है, उसे दुनिया को यह दिखाना होता है कि वह जो भी करता है, उसमें सर्वश्रेष्ठ है. हर किसी को शेखी बघारने, बड़ी-बड़ी बातें करने, दिखावा करने का बहुत शौक है. और अब यदि आदित्य का प्रस्ताव रंग लाता है, मुझे उम्मीद है कि ऐसा होगा, तो हमें हमारा पुराना शहर मिल जाएगा और हम दुनिया को दिखा सकेंगे कि हम बेखौफ हैं. हम आजादी का लुत्फ उठा सकते हैं और आतंकवाद से भी निपट सकते हैं. हम रात में भी उसी तरह व्यवहार कर सकते हैं जैसे हम दिन की घटनाओं से निपट लेते हैं. इससे देश की व्यावसायिक राजधानी और पैसा कमाएगी, अपने लोगों को और नौकरियां देगी और मंदी के खिलाफ संघर्ष में सहायक सिद्ध होगी.

26.09.2013, 8.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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