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मोदी का सच

मुद्दा

 

मोदी का सच

प्रीतीश नंदी

नरेंद्र मोदी


सब जानते हैं कि मैं यूपीए का कोई बड़ा प्रशंसक नहीं हूं. कांग्रेस के नेतृत्व वाले इस गठबंधन को मेरे और आप जैसे आम लोगों ने वोट देकर सत्ता में बिठाया था. एक बार नहीं दो बार इस पर भरोसा दिखाया, लेकिन अब अपने इस निर्णय पर पछतावा हो रहा है. इसके कार्यकाल में भ्रष्टाचार पहले की तुलना में चार गुना बढ़ गया है. यह गठबंधन चुनाव के पहले दिया अपना कोई वादा पूरा नहीं कर पाया है.

लेकिन यूपीए की विफलता की जिम्मेदारी लेने से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिस तरह से पल्ला झाड़ा, उससे सबसे ज्यादा निराशा हुई. यह सही है कि सारी गलत चीजों के लिए मनमोहन सिंह को दोष नहीं दिया जा सकता. लेकिन कोई भी राष्ट्र अपने लीडर की ओर ही देखता है कि वह सत्ता में रहते हुए असंभव-सी लगने वाली चीजें भी करके दिखाएगा. पर यह कहना ही पड़ेगा कि मनमोहन सिंह तो आसान नजर आने वाली चीजें भी कर दिखाने में नाकाम रहे.

पर यदि मनममोहन सिंह से हम इतने हताश हैं तो राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुले रूप से जब अध्यादेश को बकवास बताते हुए फाड़कर फेंकने लायक बताया तो हमें इतना गुस्सा क्यों आया. मुझे तो लगता है कि यूपीए जो गलती करने जा रहा था उसकी गंभीरता को देखते हुए राहुल की आलोचना कोई बहुत कठोर नहीं कही जा सकती. भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी भी कोई मनमोहन सिंह के प्रशंसक नहीं हैं. वे तो मुझसे कहीं ज्यादा सिंह के तीखे आलोचक हैं इसलिए तुरंत ही सार्वजनिक बहस के अखाड़े में कूद पड़े और पूरी बहस को एक अलग ही दिशा दे दी. उन्होंने पूछा, कांग्रेस के उपाध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री को खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपमानित करके बच कैसे सकते हैं. क्या सिर्फ इसलिए कि वे एक गांधी हैं?

मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल द्वारा की गई अध्यादेश की आलोचना को इस चतुराई से पेश किया मानो कांग्रेस के इस युवा नेता से कोई बहुत बड़ी गुस्ताखी हो गई हो. देश ने राहुल की इस अलोचना में निहित इशारे को समझा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कथित अपमान पर घडिय़ाली आंसू बहाए जाने लगे. अच्छी बात यह रही कि मनमोहन, मोदी के जाल में नहीं फंसे और अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया. आम चुनाव अभी काफी दूर हैं और चाहे सिंह बहुत महान लीडर न भी हों पर बेशक वे बुद्धिमान तो हैं. एक राजनेता के रूप में वे अच्छी तरह जानते हैं कि किसी बात से असहमति दिखाने का भी एक समय और स्थान होता है. निश्चित रूप से ऐसा करने का यह वक्त नहीं था.

वास्तविकता तो यह है कि सिंह ने बिल्कुल उलटा ही किया. उन्होंने मौके का फायदा उठाकर दागी विधायकों-सांसदों को बचाने वाला अध्यादेश वापस ले लिया. यह सही फैसला था. दोषी सिद्ध अपराधियों को विधानसभा या संसद में बने रहने देना और मंत्री पद पर आसीन रहने देना तो देश के लिए बहुत शर्मनाक बात है. मुझे तो समझ में ही नहीं आता कि जब केंद्रीय मंत्रिमंडल अध्यादेश को मंजूरी दे रहा था तो इसके सदस्यों के दिमाग में असल में क्या था.

इस बात में कोई दो मत नहीं हो सकता कि राजनीति में गठबंधन की अपनी मजबूरियां होती हैं, लेकिन यूपीए के दूसरे कार्यकाल के अंतिम दौर में कांग्रेस को राजनीतिक ब्लैकमेल का इस तरह शिकार होने की कोई जरूरत नहीं थी. मनमोहन सिंह को सिर ऊंचा रखकर और सीना तानकर चुनाव के मैदान में जाने का फैसला करना था. सत्ता में एक और कार्यकाल के लिए मजबूती से अपना पक्ष रखना था या कड़े मुकाबले के बाद हारने पर बाहर हो जाना था. पर राजनीतिक जोड़-तोड़ के लिए इस तरह का अध्यादेश लाना तो विशुद्ध रूप से राजनीतिक आत्महत्या ही कही जाएगी.

मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि राहुल ने इसके पहले क्यों कुछ नहीं कहा या किया. इस बारे में एक ही दलील दी जा सकती है कि इसके पहले उन्हें नहीं लगा था कि अध्यादेश के खिलाफ आम लोगों की प्रतिक्रिया इतनी कड़ी होगी.

पर मैं तो यही कहूंगा कि कभी न सीखने की बजाय देर से सीखना कहीं ज्यादा बेहतर है. भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी का दावा है कि अध्यादेश राहुल के विरोध की वजह से नहीं राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पहल के कारण रुका. उन्होंने अध्यादेश को अपने पास रोक लिया था. कुछ लोगों ने राहुल को अनाड़ी, अशिष्ट और राजनीतिक शिष्टाचार से रहित युवा नेता बताया. हालांकि अब हर कोई खुश है कि दागी अध्यादेश वापस हो गया है, जो उन्हीं के बयान के बाद हुआ है.

पर कोई भी राहुल गांधी को दागी अध्यादेश रुकवाने का श्रेय देना नहीं चाहता. मुझे तो यही जानने की सबसे ज्यादा उत्सुकता है कि हमारी राजनीति में शिष्टाचार का महत्व इतना कब से बढ़ गया कि हम ऐसे किसी व्यक्ति पर टूट पड़े हैं जिसने एक बुरे अध्यादेश को लागू होने से रोक दिया. क्या यह कोई गुस्ताखी है. जबकि वास्तविकता यह है कि हम सब यह अध्यादेश रोकना चाहते थे. हम राहुल को युवा, अपरिपक्व व पद के अयोग्य मानते हैं. मानते हैं कि पार्टी में उनकी इतनी हैसीयत इसलिए है क्योंकि वे एक गांधी हैं. हमारी खीज यह है कि उन्हीं राहुल ने दागियों को बचाने वाले अध्यादेश के बहाने देश को यह दिखा दिया कि उनमें सही बात के लिए खड़े होने की काबिलियत है फिर हो सकता है कि उनकी पार्टी कांग्रेस और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में यह काबिलियत न हो.

इससे यह भी पता चलता है कि भाजपा और कांग्रेस की लड़ाई हिंदू राष्ट्रवाद (खुद के बारे में मोदी के वर्णन के मुताबिक) और उस पार्टी के बीच नहीं है जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यकों यानी मुस्लिम का तुष्टीकरण करती है. धर्मनिरपेक्षता तो आज की राजनीति में सबसे अलोकप्रिय शब्द हो गया है.

वास्तव में यह लड़ाई उनके बीच है जो लोकतंत्र की भाषा बोलते हैं और जो नहीं बोलते. एक पार्टी है जिसमें पार्टी अनुशासन के नाम पर सबसे बुजुर्ग और सम्मानीय नेता को चुप कर दिया गया है. यह नेता आज रूठा हुआ है. उसे प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी का स्वागत करने के लिए मजबूर किया जाता है. दूसरी पार्टी में एक युवा पदाधिकारी एक खराब अध्यादेश के खिलाफ मजबूती से खड़ा होता है और उसे वापस लेने पर मजबूर करता है. आप किस पार्टी को प्राथमिकता देंगे?

मैं तो एक पत्रकार हूं. मैं किसी का पक्ष नहीं लेता. मेरे लिए तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे ज्यादा महत्व है. विनम्रता थोड़ा इंतजार कर सकती है. और हां, मुझे खुशी है कि वह मूर्खतापूर्ण अध्यादेश वापस ले लिया गया है.
11.09.2013, 09.51 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

dr.kamlesh mathur [mathur.kamlesh24@gmail.com] jodhpur - 2013-11-25 17:26:24

 
  लेख सटीक है. राहुल को केवल गांधी होने के कारण नकारना उचित नहीं है. पप्पू कह कर उसकी हंसी उड़ाने वाले ने अपने सबसे वरिष्ठ नेता के साथ भी हंसी का व्यवहार किया है. राहुल ने बिल रुकवाकर गंभीर सोच का परिचय दिया और मनमोहन ने परिवार के वरिष्ठ सदस्य के समान व्यवहार किया है. मनमोहन सिंह जी कम बोलने वाले लेकिन चिंतनशील व्यक्ति हैं. प्रीतीश नंदी जी ने अच्छा लेख लिखा है. 
   
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