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सीरिया पर अमरीकी दादागिरी

मुद्दा

 

सीरिया पर अमरीकी दादागिरी

संदीप पांडेय

बराक ओबामा


रूस के हस्तक्षेप से फिलहाल सीरिया पर हमला तो टल गया है. अमरीका ने रूस की मदद से सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पारित कराकर सीरिया के रासानिक हथियारों के जखीरे को समाप्त करना सुनिश्चित करा लिया है, किंतु सवाल यह है कि क्या वाकई में अमरीका का उद्देश्य इतना ही था कि सीरिया का रासायनिक निशस्त्रीकरण हो?

सीरिया में एक अनुमान के मुताबिक एक लाख के ऊपर लोग वर्तमान में चल रहे गृह युद्ध में मारे जा चुके हैं और इससे दस गुना ज्यादा लोग देश छोड़कर पड़ोसी देशों में शरणार्थी बनकर शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं. अन्याय और अत्याचार तो दुनिया में और जगह भी हो रहे हैं. क्या अमरीका इतना न्यायप्रिय देश है कि 21 अगस्त, 2013 को यह खबर लगते ही कि सीरिया में रासायनिक हथियार का इस्तेमाल हुआ उसने तुरंत कार्रवाई का मन बना लिया?

असल में यह सबको स्पष्ट था कि अमरीका का मुख्य उद्देश्य सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद को सत्ताच्युत करना था. अमरीका जो ठान लेता है उसे पूरा किए बिना मानता नहीं. फिर क्या वजह है कि अमरीका रूसी प्रस्ताव को मान गया?

हुआ यह कि सवाल यह खड़ा होने लगा था कि असद के विरोध में अमरीका किसका समर्थन कर रहा है? असद का विरोध करने वाले संगठित नहीं थे. उनमें कई विचारधाराओं के लोग व संगठन थे जिनमें कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों के अलावा अराजकतादी से लेकर आतंकवादी संगठन तक शामिल थे. अमरीका की दिक्कत इसलिए बढ़ गई थी, क्योंकि विरोधियों में अल-कायदा भी था, जिसको अमरीका अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है. अत: फिलहाल उसने पीछे हटना ही उचित समझा है और रूसी प्रस्ताव मान कर संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से कार्रवाई के लिए तैयार हुआ है.

वैसे अमरीका संयुक्त राष्ट्र को कितना मानता है, यह सबने अफगानिस्तान और इराक पर हमलों के दौरान देखा है. इसलिए हम पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो सकते कि सीरिया पर खतरा टल ही गया है.

सीरिया के अंदर फिलहाल संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ पहुंच गए हैं जो उसके 1000 टन रासायनिक हथियारों व इन हथियारों के निर्माण तंत्र को समाप्त कर रहे हैं. अमरीका इस बात से खुश होगा ही कि बिना युद्ध के वह जो चाहता था हो रहा है, किंतु सवाल यहां यह खड़ा होता है कि अमरीका को यह अधिकार किसने दिया कि वह किसी भी देश के अंदर घुसकर उसके खतरनाक हथियारों को समाप्त करवाए? इसका यह मतलब कतई नहीं कि सीरिया के हथियार खत्म नहीं होने चाहिए थे. जिस तरह से संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव के बाद यह वैध कार्रवाई हो रही है वह स्वागत योग्य है. कम से कम अमरीका के होने जा रहे अवैध हमले से तो यह बेहतर ही है.

सबको मालूम है कि आज की तारीख में सबसे खतरनाक हथियार अमरीका के पास हैं. अमरीका का रक्षा बजट उसके बाद रक्षा पर सबसे अधिक खर्च करने वाले 12 देशों के कुल बजट से ज्यादा है, जिसमें चीन, रूस, फ्रांस, इंग्लैंड, भारत आदि शामिल हैं, जबकि अमरीका को अपनी रक्षा के लिए इतना खर्च करना जरूरी नहीं. अमरीका को लगता है कि विश्व का दादा बने रहने के लिए यह जरूरी है. यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अमरीका का सबसे बड़ा उद्योग हथियार उद्योग है.

उसके बजट का एक बड़ा हिस्सा शोध पर खर्च होता है. अमरीका के सभी बड़े विश्वविद्यालयों के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभागों में काम करने वाले ज्यादातर वैज्ञानिक व अभियंता हथियार निर्माण से जुड़े किसी प्रकल्प पर शोध कर रहे होते हैं. कल्पना करें यदि अमरीका शांति के रास्ते पर चल पड़ा तो वहां कितने लोग बेरोजगार हो जाएंगे? यह विडंबना है अमरीका की.

अब यदि कोई देश संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव लाता है कि अमरीका विश्व की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है और उसके हथियार उसी तरह से समाप्त किए जाने चाहिए जैसे सीरिया के किए जा रहे हैं तो उसका क्या हश्र होगा? इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती कि अमरीका की शक्ति को कोई चुनौती देगा. दक्षिण अमरीका के कुछ एक देशों और ईरान को छोड़ कर दुनिया के ज्यादातर देश अमरीका पर कोई सवाल खड़ा करने की हैसियत नहीं रखते. भारत तो खैर इस समय अमरीका से साझेदारी के लिए उतावला हो रहा है.

विकसित दुनिया में अब हथियारों और युद्ध का बड़े पैमाने पर जनता विरोध करने लगी है. इनकी निरर्थकता उन लोगों को सबसे ज्यादा समझ में आती है जो युद्ध में भाग लेकर लौटते हैं. ऐसे ही एक व्यक्ति हैं जॉन केरी. अमरीका के वर्तमान विदेश मंत्री जो सीरिया मामले में अग्रणी भूमिका में हैं, वियतनाम से लौटने के बाद युद्ध का विरोध कर चुके हैं और आज भी अमरीका के अंदर परमाणु निशस्त्रीकरण की वकालत करने वाले बड़े नेताओं में गिनी-चुनी संख्या में जो लोग हैं उनमें शामिल हैं.

बराक ओबामा भी परमाणु निशस्त्रीकरण के समर्थक हैं. अमरीका में लाखों लोग युद्ध विरोधी प्रदर्शनों में सड़कों पर निकल कर आते हैं. यही हाल यूरोप व ऑस्ट्रेलिया का है. वियतनाम में युद्ध के खिलाफ पहले विश्वविद्यालय परिसरों में और फिर बाहर भी जो प्रदर्शन हुए उनमें सबसे बड़े प्रदर्शन में 1971 में वाशिंगटन डीसी में कोई पांच लाख लोग शामिल हुए. शायद अमरीका और विश्व की जनता ही अमरीका की सैन्य शक्ति को चुनौती दे सकती है. जिस तरह से युद्ध के खिलाफ और लोकतंत्र के समर्थन में भारी संख्या में लोग सड़कों पर निकलने लगे हैं उससे एक उम्मीद बंधती है कि तानाशाही शक्ति का मुकाबला किया जा सकता है.
13.10.2013, 18.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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