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राम पुनियानी | मोदी के विकास का सच

विचार

 

मोदी के विकास का सच

 

राम पुनियानी

नैनो के गुजरात आने को नरेन्द्र मोदी की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. मीडिया के एक हिस्से द्वारा किए जा रहे मोदी के अनवरत स्तुति-गान और विकास की एक विशेष परिभाषा में विश्वास करने वाले तबके के अंधसमर्थन से मोदी की लोकप्रियता पहले ही आकाश चूम रही थी. अब तो मोदी के प्रशंसकों को मानो पंख लग गए हैं. उद्योग जगत की कुछ हस्तियों ने तो यह तक कह दिया है कि मोदी ही देश का भविष्य हैं और यदि देश में पांच मोदी हो जाएं तो देश समृध्दि के रास्ते पर जगुआर रेसिंग कार की गति से दौड़ने लगेगा.

यह भी कहा जा रहा है कि मोदी ने आतंकवाद से निबटने का रास्ता देश को दिखा दिया है और वो आतंकवाद की समस्या को सुलझाने में सक्षम हैं.

बिना इस बहस में पड़े कि ''विकास'' की सही परिभाषा क्या है और किस चीज को ''विकास'' माना जाना चाहिए, हम पहले मोदी की ''उपलब्धियों'' और गुजरात में उनके ''ट्रेक रिकार्ड'' पर नजर डाल लें. मोदी वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने गुजरात को प्रजातंत्र के रास्ते पर ले जाने की बजाए ''हिन्दू राष्ट्र'' बनाने की ओर ले जाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. गोधरा को मुसलमानों की ''सोची-समझी साजिश'' बताकर गुजरात में अल्पसंख्यकों का सामूहिक जनसंहार करवाना उनकी पहली बड़ी ''उपलब्धि'' है. अपने प्रदेश के मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना देना उनकी दूसरी महत्वपूर्ण ''उपलब्धि'' है.

गुजरात में ''एनीमिया'' की शिकार महिलाओं का प्रतिशत सन् 1999 में 46.3 से बढकर सन् 2004 में 55.5 हो गया. बच्चों की हालत तो और खराब है. इसी दौरान खून की कमी वाले बच्चों का प्रतिशत 74.5 से बढकर 80 हो गया.


शायद ही कोई मुख्यमंत्री वह कर पाये जो उन्होंने कर दिखाया है. पिटे हुए, आतंकित और आर्थिक रूप से बर्बाद हो चुके मुसलमानों को उन्होंने राहत शिविरों में भी नहीं रहने दिया. राहत शिविर बंद करवा दिए.

आज भी गुजरात में पांच लाख मुसलमान नारकीय परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर हैं. उनकी बस्तियों में राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाएं कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवा रही हैं. गुजरात के मध्यम वर्ग का एक हिस्सा समृध्द हुआ है परंतु उसकी कीमत गरीब तबके ने और गरीब होकर चुकाई है. लेकिन मोदी की ''उपलब्धियों'' की सूची यहीं खत्म नहीं होती.

गुजरात में गरीबी बढ रही है. रोजगार के अवसर कम हुए हैं और कृषि उत्पादन घट रहा है. सकल कृषि उत्पादन सन् 2003-04 में 65.71 लाख टन था जो 2004-05 में घटकर 51.53 लाख टन रह गया. ''नेशनल सेम्पल सर्वे'' द्वारा सन् 2005 में कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार गुजरात के 40 प्रतिशत किसानों का कहना है कि वे खेती छोड़ना चाहते हैं.

हाल में किए गए कुछ अध्ययन बताते हैं कि पिछले एक दशक में खेती और मजदूरी करने वाले वर्ग की स्थिति बद से बदतर हुई है. विधानसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए मोदी ने बताया कि सन् 2006 में प्रदेश में 148 किसानों ने आत्महत्या की. जहाँ एक ओर गुजरात बिजली का निर्यात कर रहा है, वहीं गुजरात के ही ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की भारी कमी है. ''इंडियन एक्सप्रेस'' (8 अप्रैल, 2007) के अनुसार गुजरात में बिजली की माँग और आपूर्ति के बीच 900 मेगावाट का अंतर है. इस कमी को गाँव वाले भुगत रहे हैं.

''एनीमिया'' (रक्त अल्पता) की व्यापकता किसी भी समाज में व्याप्त गरीबी का महत्वपूर्ण माप है. गुजरात में ''एनीमिया'' की शिकार महिलाओं का प्रतिशत सन् 1999 में 46.3 से बढकर सन् 2004 में 55.5 हो गया (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 2006- चौथा दौर) . बच्चों की हालत तो और खराब है. इसी दौरान खून की कमी वाले बच्चों का प्रतिशत 74.5 से बढकर 80 हो गया. दलितों और महिलाओं की स्थिति में भी गिरावट आ रही है और पिछले दशक में लिंगानुपात गिरा है. आदिवासियों की हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं है.

मोदी के शासनकाल में ईसाईयों के खिलाफ जमकर हिंसा हुई. आदिवासी क्षेत्रों में वनवासी कल्याण आश्रम के ''घर वापसी'' अभियान ने जमकर कहर ढाया. मोदी के गुजरात में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक वर्ग के बीच की खाई इतनी चौड़ी हो गई है कि उसे पाटना अब असंभव जान पड़ता है.


यह सही है कि राज्य में आर्थिक विकास के काम भी हुए हैं परंतु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि गुजरात हमेशा से देश के अपेक्षाकृत विकसित राज्यों में से एक रहा है.

जहाँ तक आतंकवाद का सवाल है, अक्षरधाम मंदिर पर आतंकी हमला मोदी के मुख्यमंत्री रहते ही हुआ था. यह अलग बात है कि इस हमले ने उन्हें अगला चुनाव जीतने में मदद की. कुछ समय बाद, अपना सीना फुलाकर मोदी ने यह कहना शुरू कर दिया कि आतंकवादी उनके राज्य में कदम भी नहीं रख सकते. उनके इस दावे का खोखलापन पिछले माह उजागर हुआ जब अहमदाबाद में बम विस्फोट हुए.

अब उन्होंने यह यह कहना शुरू कर दिया है कि वे आतंकवाद से इसलिए नहीं लड़ पा रहे हैं क्योंकि उनके पास प्रभावी कानून नहीं है. ये झूठ वे इसलिए कह रहे हैं ताकि उनके बड़बोडेपन की हवा न निकल जाए. मोदी हर मौके का इस्तेमाल अपना व्यक्तिगत प्रचार करने के लिए करते रहे हैं. इस काम में मीडिया का एक हिस्सा उनका भरपूर साथ देता है.

गुजरात में जो कुछ आज हो रहा है, वह सबके सामने है. गुजरात में अल्पसंख्यकों को आतंकित और अपमानित किया जाता है. गुजरात में ऐसी नीतियाँ अपनाई जाती हैं जो मध्यम और उच्च वर्ग की जेंबे और भरती हैं. जहाँ तक अल्पसंख्यकों और गरीबों का सवाल है, उन्हें घर के पिछवाड़े फेंक दिया गया है, जहाँ उन्हें कोई देख न सके.

कोई आश्चर्य नहीं की रतन टाटा और उनके जैसे अन्य लोग मोदी के प्रशंसक हैं. उनके लिए गुजरात के चेहरे पर लगी कालिख का कोई महत्व नहीं है. उन्हें इस बात से कोई वास्ता नहीं है कि गुजरात में प्रजातांत्रिक परंपराओं और मूल्यों का मखौल बनाया जा रहा है. उन्हें तो सिर्फ एक चीज से मतलब है- उनकी कंपनियों की बैलेन्स शीटों से.

विकास वो हो जिसमें सब आगे बढें, विकास वो हो जो समग्र हो, जिसमें बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, बेहतर सड़कें और बेहतर जीवन-स्तर तो शामिल हो ही, उसमें सभी को बराबरी का दर्जा और इज्जत से जीने का हक भी मिले. इन सब मुद्दों से टाटा और उनके क्लब के सदस्यों को कोई वास्ता नहीं है. उनका दृष्टिकोण वही है जो जर्मनी के उद्योगपतियों का हिटलर के प्रति था.

उद्योगपतियों ने हिटलर का जमकर साथ दिया था. हिटलर प्रजातंत्र का दुश्मन है, इससे उद्योगपतियों को कोई मतलब नहीं था. शायद यही कारण है कि आशीष नंदी सहित कई गंभीर चिंतकों ने मोदी को फासिस्ट नेता के सभी लक्षणों से युक्त व्यक्ति बताया है.


सन् 2002 के मुसलमानों के कत्लेआम और उसके बाद ईसाईयों पर सिलसिलेवार हमलों ने पहले ही गुजरात को धार्मिक तानाशाही के रास्ते पर धकेल दिया है. मोदी स्वयं को अत्यधिक कार्य-कुशल और अनुशासित व्यक्ति मानते हैं.


किसी भी व्यक्ति का आकलन उसकी नीतियों और उसके कार्यकलापों के एक छोटे से हिस्से के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए. क्या भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र में उच्च पद पर बैठे किसी भी व्यक्ति के समग्र आंकलन में प्रजातांत्रिक मूल्यों और संविधान के प्रति उसकी निष्ठा को महत्व नहीं दिया जाना चाहिए?


''मेनेजमेन्ट गुरूओं'' और धनकुबेरों को तो हिटलर के साथ बैठने में भी कोई गुरेज़ नहीं होगा. कष्ट तो वंचितों, कमजोरों और गरीबों को भोगने पड़ेंगे. ऐसे व्यक्ति के बारे में क्या कहा जाए जो समाज को ध्रुवीकृत कर सत्ता में आए और समाज के एक बड़े हिस्से को आतंकित और दु:खी रखकर, अच्छा शासक होने का दम भरे.

मोदी का महिमा-मंडन आने वाले बुरे दिनों का संकेत है. शायद वह काला दिन दूर नहीं जो हमारी बहुवादी संस्कृति और स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों को निगल जाएगा.

 

18.10.2008, 23.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Dr Mohan L K (mohan2577@gmail.com) Saharanpur

 
 Dear Ram Puniyani ji,
I totally agree with you and ur views about Modi and his government. In democracy, development means, when all benefits for AAM ADMI not for RATAN TATA aur any special community or group.
 
   
 

vipul () haryana

 
 आप ये बातें लिख सकते हैं क्योंकि जब गोधरा कांड हुआ था तो उस ट्रेन में आप या आपके परिवार का कोई सदस्य नहीं था. नरेंद्र मोदी के आने के बाद गुजरात में दंगे कम हुए हैं. और आप सिर्फ गुजरात का ही नाम धमाकों में क्यों ले रहे हैं ? धमाके तो मुंबई, दिल्ली आदि जगहों पर भी हुए हैं.
 
   
 

Rajiv Pandey (rajivreal@gmail.com) Bombay

 
 नरेंद्र मोडी देश की न्यायिक प्रणाली के चेहरे पर एख बदनुमा दाग है. शर्म आती है ये सोच कर कि इतने सबूतों के बाद भी कोर्ट से वो बरी हो जाते हैं. But one fine day have tpo face the punishment awarded by people at large. That is a hope people like me r living with. I would like the writer not to lose the hope as he has shown in the end of the article.  
   
 

Suresh Chiplunkar (suresh.chiplunkar@gmail.com) Ujjain (MP)

 
 "विकास वो हो जिसमें सब आगे बढें, विकास वो हो जो समग्र हो, जिसमें बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, बेहतर सड़कें और बेहतर जीवन-स्तर तो शामिल हो ही, उसमें सभी को बराबरी का दर्जा और इज्जत से जीने का हक भी मिले. इन सब मुद्दों से टाटा और उनके क्लब के सदस्यों को कोई वास्ता नहीं है. उनका दृष्टिकोण वही है जो जर्मनी के उद्योगपतियों का हिटलर के प्रति था..." ये शब्द तो सभी राज्यों पर लागू होने चाहिये, सबसे पहले पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र पर, बंगाल पर इसलिये कि वहाँ तो एक ही पार्टी का शासन पिछले 30 साल से है, फ़िर उन्होंने क्या कर लिया और महाराष्ट्र इसलिये क्योंकि इसकी राजधानी देश को सर्वाधिक आयकर का पैसा देती है, लेकिन सबसे अधिक किसान इसी राज्य में आत्महत्या करते हैं… मोदी को महिमामंडित क्यों न करें? मप्र में बिजली की माँग में 2000 मेगावाट का अन्तर है, अन्य राज्यों में तो यह और भी ज्यादा है, इसे आप क्या कहेंगे? मोदी के प्रशंसक यूँ ही नहीं बन गये हैं लोग. 
   
 

Asha Joglekar (ashaj45@gmail.com) Anderson

 
 What is happening in the states where these people belong. It is important to look in to your own house before you start cannons
on others.
 
   

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