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पुरुष-तंत्र के जाले में

मुद्दा

 

पुरुष-तंत्र के जाले में

अनिता मिश्रा

स्त्री के खिलाफ आरोप


''आपने मेरे काम के बारे में कभी बातचीत करना जरूरी नहीं समझा.'' यह लाइन उस पीड़ित महिला पत्रकार के इ-मेल की है, जिसने अपने खिलाफ यौन-उत्पीड़न की घटना के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत की. लेकिन जिस काम का हवाला उस युवती ने दिया, उसे अपनी पत्रिका में अपनी नौकरी से बाहर होना पड़ा.

सवाल है कि इस पूरी घटना में अपराध या गलती क्या उसकी थी कि उसे काम छोड़ना पड़ा? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ‘विशाखा गाइडलाइंस’, नए यौन हिंसा विरोधी कानून आदि के अनेक पहलुओं पर काफी बातें हो रही हैं और अभी और तथ्य सामने आएंगे. यों भी, हर घटना के बाद कानूनी पहलू पर जोर-शोर से चर्चा शुरू हो जाती है. ऐसी चर्चा होनी भी चाहिए. आखिर कानून ही वह हथियार है, जो गुनहगार को सजा दिलाएगा.

लेकिन इन सब बातों के बरक्स एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अगर किसी संस्थान में किसी लड़की के साथ यौन-उत्पीड़न की घटना होती है और वह उसके विरोध में आवाज उठाती है, उसके बाद उसका भविष्य क्या होगा. उसका यौन उत्पीड़न करने वाला खुद उसका बॉस है तो आवाज उठाने पर पीड़ित की नौकरी जाना तय है, वह किसी भी रास्ते हो.

तेजपाल कांड में युवती ने खुद इस्तीफा दिया. लेकिन उसके सामने क्या रास्ता था? अगर किसी सहकर्मी ने इस तरह की हरकत की तब भी लड़की को ही तमाम लानतें झेलनी पड़ती हैं. कई तरह के ताने सुनने पड़ते हैं. मसलन, ‘और हंस- हंस कर बातें करो’ या फिर ‘ऐसे कपड़े क्यों पहनती थी’, ‘बड़ी मॉडर्न बनी फिरती थी’! इस तरह की कुंठाओं से भरी हुई वाहियात बातों का सामना पीड़ित महिला को ही करना पड़ता है. ‘तहलका’ की पूर्व मैनेजिंग एडीटर ने खुद एक सशक्त, सक्षम और नारीवादी पहचान की महिला होने के बावजूद पीड़ित युवती का साथ देने के बजाय इसी तरह के कुतर्कों का सहारा लेकर प्रकारांतर से आरोपी का बचाव करने की कोशिश की.

आमतौर पर कार्यस्थल पर उत्पीड़न के होने की स्थिति में इसके विरोध में आवाज उठाने वाली महिला के लिए माहौल इतना असहज हो जाता है कि उसका काम करना दूभर हो जाता है. इस तरह की बातों के पंख लगे होते हैं, इसलिए यह फौरन एक जगह से दूसरी जगह पर फैल जाती हैं. वह अगर संबंधित जगह पर नौकरी छोड़ती है तो दूसरे संस्थानों में भी उसे यह सब सुनना पड़ सकता है कि अरे यह तो वही है, जिसने वहां इतना बवाल किया था. मतलब साफ है कि जिसके साथ अपराध हुआ, उसी को गुनहगार ठहरा दिया जाता है. सिर्फ इसलिए कि हमारे समाज ने मान लिया है कि अगर वह स्त्री है, तो उसे सब कुछ चुपचाप सहना चाहिये. कम से कम यौन हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठा कर खुद को ‘बदनाम’ करने की कोशिश तो उसे नहीं ही करना चाहिये.

इन सब बातों की वजह हमारा सामाजिक ताना-बाना भी है जो पूरी तरह से पितृसत्तात्मक जड़ता और पूर्वाग्रहों से लैस है और इस तरह के अपराधों की स्थिति में आमतौर पर पीड़ित को ही दोषी मान लेता है. ज़्यादा अफसोस की बात ये है कि परंपरागत समाज हो या आधुनिकता से आच्छादित शहरों-महानगरों के बौद्धिक कहे जाने वाले दफ्तर, सब जगह स्त्री के खिलाफ एक तरह की मानसिकता कायम है. लज्जा और भय को स्त्री का गहना समझे जाने की मानसिकता सब जगह बनी हुई है.

जाहिर है, जो महिला खामोश है, उसने इसी गहने को पहना हुआ है. इस घटना के बाद एक नेता का बयान आया कि ऐसे ही मामले होते रहे तो लड़कियों को नौकरी मिलना मुश्किल हो जाएगा. इस बात के दो मतलब निकलते हैं. एक यह कि लड़कियां लोगों पर आरोप लगा कर फंसा रही हैं. दूसरे, लोगों को इस बात का डर रहेगा कि अपना कोई हित न सधने पर लड़की उन्हें फंसा सकती हैं.

सवाल है कि क्या कोई पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर लड़की अपनी सारी प्रतिष्ठा इसलिए दांव पर लगा देगी कि अमुक व्यक्ति से उसका कोई हित नहीं सधा? इस तरह की सोच रखने वालों को सामाजिक व्यवस्था की उन जड़ों की पड़ताल करनी चाहिए, जहां यह स्वीकार ही नहीं किया जाता कि कोई लड़की अपनी योग्यता से आगे बढ़ी होगी.

उस पर या तो फंसाने का आरोप लगाया जाता है या फिर उसे फंसने की त्रासदी झेलनी पड़ती है. एकाध अपवादों के आधार पर इस समस्या का सरलीकरण नहीं किया जा सकता. सवाल है कि वे कौन-सी स्थितियां होंगी जिनमें एक स्त्री को उसकी क्षमता के आधार पर टिके रहने या आगे बढ़ने का मौका मिलेगा? स्त्री पर आगे बढ़ने के लिए ‘गलत रास्ते’ अपनाने का आरोप लगाने वाले कौन होते हैं और योग्यता और क्षमता को खारिज कर इस ‘गलत रास्ते’ को एक व्यवस्था की शक्ल देने वाले लोग कौन हैं?

क्या इसे समझने के लिए मंगल ग्रह पर जाना पड़ेगा कि हमारी समूची व्यवस्था पुरुषों के नियंत्रण में हैं और तमाम जायज-नाजायज रास्तों को एक व्यवस्था बना देने में उन्हीं का हाथ है और वही उसे संचालित करते हैं? इसमें अगर कोई स्त्री उनकी मर्जी के खिलाफ अपनी क्षमता के स्वीकार की मांग करती है तो उसके चरित्र को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है. क्या कभी किसी पुरुष के चरित्र का ऐसा ही विश्लेषण कर उसके बारे में इसी तरह के फैसले और नजरिए सामने आते हैं?

यह किसी से छिपा नहीं है कि ऐसी ज्यादातर घटनाओं में आवाज उठाने का खमियाजा महिलाओं को ही उठाना पड़ता है. इस संदर्भ में अपनी एक मित्र का जिक्र करना चाहूंगी. वे रिसर्च स्कॉलर थीं और वह जल्दी पूरा हो, यह उनके गाइड पर निर्भर था. उनके गाइड ने उनसे रिसर्च के काम की गति बढ़ाने के बदले शारीरिक संबंधों की मांग कर दी. मित्र ने इनकार कर दिया.

इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी पीएचडी अधर में लटक गई और कभी पूरी नहीं हुई. अगर वह पूरी हो पाती तो आज वे हाउसवाइफ के बजाय कहीं किसी कॉलेज में लेक्चरर होतीं. एक रास्ता और था. अगर वे अपने गाइड
के इस इरादे के खिलाफ आवाज उठाती तो दूसरी लड़कियों को भी हिम्मत होती और उनके लिए रास्ते खुलते. इसके बाद शायद दूसरे गाइड अपनी महिला विद्यार्थियों से इस तरह की आपराधिक मांग करने से डरते. लेकिन मेरी मित्र ने इस मामले में खामोशी का रास्ता चुना.

दरअसल, रसूख वाले लोगों के कुकृत्य के विरुद्ध आवाज उठाने से लड़कियां इसलिए भी डरती हैं कि अगर वे कोई सबूत पेश नहीं कर पाई तो उलटे उन्हें ही गलत समझ लिया जाएगा. इन सब बातों की वजह हमारा वह सामाजिक ढांचा है जो लड़कियों के व्यक्तित्व को एकमात्र शुचिता के पैमाने से देखता है. इसलिए घर-परिवार के लोगों को भी डर लगता है कि अगर लड़की के यौन-उत्पीड़न की बात खुल गई तो समाज में उनकी बदनामी होगी. जबकि लड़की के खिलाफ अपराध हुआ होता है. इसलिए ऐसी लड़कियों की तारीफ करनी चाहिए और उनका खुल कर साथ देना चाहिए जो अपने साथ किसी यौन उत्पीड़न की घटना के खिलाफ खड़ी होती हैं.

बहरहाल, तेजपाल कांड की पीड़िता का यह बयान बेहद महत्त्वपूर्ण है कि ‘तेजपाल अपने प्रभाव के लिए लड़ रहे हैं और मैं अपने आत्मसम्मान के लिए. मेरी यह लड़ाई अपने सम्मान और अपने अधिकार के लिए है कि मेरा शरीर मेरा है. मेरे एम्प्लॉयर का खिलौना नहीं.’ ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ऐसे ही साहस के साथ आवाज उठाना जरूरी है और इससे भी ज्यादा जरूरी है समाज में ऐसी महिलाओं के प्रति नजरिए में बदलाव की. उन्हें न तो सहानुभूति या बेचारगी के नज़र से देखा जाए, न उन्हें ही दोषी ठहराया जाए. कानून गुनहगार को सजा दिलाने के लिए है, लेकिन सामाजिक सोच बदलेगी तभी लड़कियां पूरी हिम्मत से अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के विरोध में बेहिचक आवाज उठा सकेंगी. इस डर से अपराधी मनोवृत्ति वाले लोगों की हिम्मत भी टूटेगी.

10.12.2013, 02.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

anil jain [aniljain938@gmail.com] new delhi - 2014-02-13 12:13:51

 
  अनीता जी, आपका एक लेख मैने हाल ही में पढ़ा था. चेतन भगत के लेखन में लड़किया सिड्यूसर क्यों हैं. आपके विचारों से पूर्णता में सहमत हूं. समय के साथ जब स्त्री को आजादी मिली है लेकिन मर्दो की सोच ज्यों की त्यों है. ऐसा क्यों? जरा आप स्त्री और पुरुष की प्रकॉति पर सोचें. नारी को घी और पुरुष को अग्नि की उपमा दी है. नैचुरली आग के नजदीक जाते ही घी पिघल जाता है. शायदी यही कारण हो सकता है, जो बुद्धिजीवी वर्ग में बदलाव नही ला पाया. 
   
 

Rajeev Ranjan Prasad [rajeev5march@gmail.com] BHU, Varanasi - 2014-01-22 03:43:39

 
  पुरुष-तंत्र या पितृ-तंत्र का ढाँचा टूट रहा है। अपने आत्मसम्मान और अधिकार की लड़ाई लड़ रही लड़कियों/स्त्रियों के प्रति समाज की बौखलाहट जिस तरह बढ़ी है; वह इसका प्रमाण है। कमज़ोर व्यक्ति स्वयं को धिक्कारता नहीं, पश्चताप नहीं करता, सुधरता नहीं; बल्कि आक्रामक तेवर अपनाता है....हाल में बढ़ी स्त्री-विरोधी घटनाएँ इसकी तसदीक पुरज़ोर करती हैं।

दूसरा पक्ष भी गौरतलब है। यहाँ संकट सामाजिक-सांस्कृतिक पुरोधाओं(पुरुष या स्त्री) के चरित्र का है। वे इस मामले में संवेदनशील नहीं है। बुद्धि-विवेक वाले अपना चरित्र तेजी से खो रहे हैं। साहित्यिक दर्पण में हँसोड़ महफ़ीलें जमाई जा रही हैं। सम्मानित शिक्षकगण अपने कुंठाओं को विद्यार्थियों से वरण करने को उकसा रहे हैं। समाजसेवा का दंभ भरने वाली ‘सोसाइटियाँ’ अपनी जवाबदेही का व्याख्या करने में खुद अक्षम हैं।

यहाँ जनमाध्यम का चरित्र ‘स्त्रियों’ का वस्तुकरण कर रहे हैं...और लड़कियाँ/स्त्रियाँ इस कुत्सित प्रचार को देख/सुनकर मुस्कुराने पर बाध्य की जा रही हैं। रिश्तों की संवेदनशीलता और मर्यादा की रक्षा और परवाह हम करना भूल नहीं गए हैं; बल्कि चाहते ही नहीं हैं।

जब ज़माने की बयार ‘कुल यार’, ‘क्रेजी यार’,\'डाॅन्ट वरी डियर/डार्लिंग’ की साझा-भाषा(लड़का-लड़की) में बदल चुका हो, तो हम सबको चाहिए कि इस पर चतुराईपूर्वक नहीं समझदारीपूर्वक विचार करें। जो सक्षम हैं-वे जागरूकता शिविर लगाएँ, अधिकार अभियान चलाएँ....लोगों को एक-दूसरे को महत्त्व देना सिखाएँ। ताकि लड़कियाँ/स्त्रियाँ खिड़की खोलें, तो विनम्र सम्मान करता पुरुष चेहरा दिखे...ताकि साँस ले सके हमारा घर, समाज, बच्चे, किशोर, युवा, प्रौढ़, बुढे.....सब के सब।

राजीव रंजन प्रसाद, पत्रकारिता शोधार्थी, बीएचयू
 
   
 

shikha [] kanpur - 2014-01-06 08:36:02

 
  सवाल है कि क्या कोई पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर लड़की अपनी सारी प्रतिष्ठा इसलिए दांव पर लगा देगी कि अमुक व्यक्ति से उसका कोई हित नहीं सधा? इस तरह की सोच रखने वालों को सामाजिक व्यवस्था की उन जड़ों की पड़ताल करनी चाहिए, जहां यह स्वीकार ही नहीं किया जाता कि कोई लड़की अपनी योग्यता से आगे बढ़ी होगी......v true...nice artcle.
 
   
 

rohit [] lko - 2013-12-27 10:51:50

 
  कि ‘तेजपाल अपने प्रभाव के लिए लड़ रहे हैं और मैं अपने आत्मसम्मान के लिए. मेरी यह लड़ाई अपने सम्मान और अपने अधिकार के लिए है कि मेरा शरीर मेरा है. मेरे एम्प्लॉयर का खिलौना नहीं.’ ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ऐसे ही साहस के साथ आवाज उठाना जरूरी है और इससे भी ज्यादा जरूरी है समाज में ऐसी महिलाओं के प्रति नजरिए में बदलाव की. उन्हें न तो सहानुभूति या बेचारगी के नज़र से देखा जाए, न उन्हें ही दोषी ठहराया जाए. .......... सार्थक लेख .. 
   
 

dr sachidanandsingh [snsingh025@gmail.com] bharuch - 2013-12-18 06:18:33

 
  हर तबके के लोग बुराई दूर करना चाहते हैं पर उन्हें बुराई दिखाई नहीं दे रही है, वो कैसे बुराई दूर कर पाएंगे. इसके लिए सख्त कानून बने तबही संभव है. गलत और झूठ की मशीन अविष्कार करं जिससे झूठा और सच्ची का पता चले. जय हिंद जय भारत. 
   
 

Asima bhatt [asimabhatt@gmail.com] Mumbai - 2013-12-10 11:22:38

 
  दरअसल, रसूख वाले लोगों के कुकृत्य के विरुद्ध आवाज उठाने से लड़कियां इसलिए भी डरती हैं कि अगर वे कोई सबूत पेश नहीं कर पाई तो उलटे उन्हें ही गलत समझ लिया जाएगा. इन सब बातों की वजह हमारा वह सामाजिक ढांचा है जो लड़कियों के व्यक्तित्व को एकमात्र शुचिता के पैमाने से देखता है. इसलिए घर-परिवार के लोगों को भी डर लगता है कि अगर लड़की के यौन-उत्पीड़न की बात खुल गई तो समाज में उनकी बदनामी होगी. जबकि लड़की के खिलाफ अपराध हुआ होता है. इसलिए ऐसी लड़कियों की तारीफ करनी चाहिए और उनका खुल कर साथ देना चाहिए जो अपने साथ किसी यौन उत्पीड़न की घटना के खिलाफ खड़ी होती हैं. आज तक इन्हीं वजहों से हम औरतें चुप रहती आयीं है और अमर्यादित वारदात झेलती आयीं है. जो हिम्मत करके आगे आ रही हैं, उनका साथ दें. 
   
 

nikita [nikitaflame@gmail.com] kanpur - 2013-12-10 09:47:55

 
  very nice thinking to anita mishra 
   
 

हेमा अवस्थी [h197217@gmail.com] कानपुर - 2013-12-10 08:04:10

 
  बेहद सार्थक लेख .... किन्तु अफसोस कि इस समस्या का कोई समाधान नहीं .... समाज नही बदल सकता ...  
   
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