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एनजीओ और सरकार चलाने का फर्क

मुद्दा

 

एनजीओ और सरकार चलाने का फर्क

राहुल राजेश

अरविंद केजरीवाल


पिछले दो सालों से लगातार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बड़ी-बड़ी सुर्खियाँ बटोरने वाले और साफ-सुथरी राजनीति, ईमानदारी, सादगी, सुशासन और सुराज के दावे और वादे करने वाले अरविंद केजरीवाल और उनके नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी अब विवादों में चौतरफा घिरने लगी है. उनपर भी वही रंग चढ़ता दिख रहा है जो अन्य राजनैतिक दलों पर अमूमन चढ़ा दिखता है. दिल्ली और कमोबेश पूरे देश की जनता को अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी से बहुत उम्मीदें जगी थीं, क्योंकि पिछले वर्ष सन् 2013 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे बेहद चौंकाने वाले थे. लेकिन उनकी सारी उम्मीदें अब मटियामेट होती नजर आ रही हैं.

ढीली-ढाली कमीज पहनकर, गले में मफलर बाँधकर सादगी का प्रतीक बने अरविंद केजरीवाल, ईमानदारी और सादगी की पुख्ता पैकेजिंग कर सत्तासीन राजनैतिक पार्टियों के विरूद्ध उमड़ रहे जनाक्रोश और असंतोष को अपने हक में भुनाने वाले अरविंद केजरीवाल अब खुद भुरभुराते नजर आ रहे हैं. दिल्ली की जिन पस्त-त्रस्त जनता और उत्साही युवाओं का विशाल सैलाबी समर्थन और सक्रिय सहयोग पाकर और जिस सोशल मीडिया के रथ पर सवार होकर अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने भारी और अप्रत्याशित जीत हासिल की थी, जिस मीडिया ने उनके पक्ष में जोरदार हवा बनाई थी, जिन सोशल साइटों पर उनकी जय-जयकार और वाह-वाह लगातर सुनाई दे रही थी, वहीं अब हताशा, निराशा और थू-थू-हाय-हाय के स्वर सुनाई देने लगे हैं! उनपर आलोकनाथ के संस्कारी जोक्स की तरह "केजरीवाल जोक्स" गढ़े जाने लगे हैं!

कहने की जरूरत नहीं कि आम आदमी पार्टी के मंत्रियों, विधायकों और स्वयं मुख्यमंत्री के बयानों, बखेड़ों और कारनामों के कारण अरविंद केजरीवाल अब खुद तमाशा बनते जा रहे हैं. दिल्ली विधान सभा में अपनी सरकार के पक्ष में विश्वासमत साबित करने के लिए 03 जनवरी, 2014 को नियम के विरूद्ध आम आदमी पार्टी की टोपी पहनकर सदन में पहुँचने से लेकर दो दिनों के भीतर ही सादगी का स्वांग त्यागकर सभी मंत्रियों के लंबी-चौड़ी महँगी गाड़ियों में सवार होकर सचिवालय आने तक, बतौर सरकारी आवास पाँच-पाँच कमरों के दो-दो जुड़वाँ फ्लैट लेने और फिर जनता और मित्रों के तथाकथित आग्रह पर इसे लेने से पलट जाने तक, सड़क पर बैठकर सरकार चलाने से लेकर मुफ्त पानी-मुफ्त बिजली देने में पेंच लगाने तक, सचिवालय की छत पर चढ़कर जनता दरबार चलाने और बेकाबू भगदड़ के कारण इसके फिसड्डी साबित हो जाने तक, दिल्ली पुलिस के तीन थानेदारों के तबादले-निलंबन की माँग करते हुए रेल भवन के सामने खुद धरना-प्रदर्शन-अनशन पर बैठ जाने से लेकर, चौतरफा निंदा होते देख अपना चेहरा बचाने के लिए आधा-अधूरा समझौता कर धरना वापस ले लेने तक- अरविंद केजरीवाल हर जगह अपने आप ही तमाशा बनते जा रहे हैं.

दिल्ली की जनता की हताशा और मोह-भंग का आलम अब तो ये है कि लोग यहाँ तक कहने लगे हैं कि "इन्हें कुछ करना-वरना नहीं है, बस केवल धरना करना है!" मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा का तनिक भी ध्यान न रखते हुए 20 जनवरी, 2014 को दिल्ली में धरना पर बैठने के बचकाने हठ के बाद मीडिया में भी केजरीवाल का एक नया नामकरण देखने को मिला- "क्रेजी-वाल"! 'आज सीएम-कल पीएम' बनने के गुमान और छह महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भी फतह हासिल करने के मंसूबे पालने वाले अरविंद केजरीवाल से यह तो पूछा ही जा सकता है कि यदि आप कल देश के पीएम चुन लिए जाएँ तो अपनी माँगें मनवाने के लिए क्या आप इसी तरह फिर धरने पर बैठ जाएँगे? यह सोचकर ही दिल काँप जाता है कि अगर प्रधानमंत्री चुन लिए गए अरविंद केजरीवाल इसी तरह की बचकानी जिद करके अपना सारा काम-धाम छोड़कर फिर कहीं धरना-आंदोलन पर बैठ गए तो देश की कितनी फजीहत होगी!

इतना सबकुछ अवांछित घटित होते देख आम आदमी पार्टी यानी आप के लिए भी अब एक नया नाम आ गया है- "आम आदमी परेशान!" और यह नामकरण भी इसलिए किया गया है क्योंकि रेल भवन के सामने केजरीवाल के धरने पर बैठ जाने से दिल्ली के चार मेट्रो स्टेशनों को सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिहाज से बंद कर दिया गया था, जिसके कारण लाखों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा था. दिल्ली ही नहीं, पूरे देश की जनता को देश की लोकतांत्रिक राजनीति में ताजी हवा के झोंके का अहसास कराने वाले अरविंद केजरीवाल को दिल्ली का मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी धरना-आंदोलन पर बैठने की नौटंकी करता देख अंग्रेजी के मशहूर लेखक और स्तंभकार चेतन भगत ने तो यहाँ तक कह डाला कि आम आदमी पार्टी राजनीति की "आइटम गर्ल" है! आम आदमी पार्टी का वैचारिक समर्थन करने वाले और उनसे ढेरों उम्मीदें लगाए बैठे अनेक राजनीतिक विश्लेषक और बुद्धिजीवी भी अब यह कहने लगे हैं कि आम आदमी पार्टी आत्ममुग्धता, अराजकता और लंपटता का शिकार होती जा रही है! रेल भवन के सामने धरने पर बैठे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो अपनी जिद के अतिरेक में खुद ही कह डाला- "हाँ, मैं अराजक हूँ!"
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

hardeep [bkhardeep@yahoo.com] Ludhiana - 2014-02-26 12:28:54

 
  चाहे जो भी हो केजरीवाल मामले में मीडिया का पूर्वाग्रह दिखाई दिया है , निष्पक्षता गायब थी शायद अरविन्द का विरोध प्रायोजित था | मीडिया ने केजरीवाल के धरने की तो जमकर आलोचना कर दी लेकिन जिन मुद्दों को लेकर केजरीवाल ने धरना दिया था उन मुद्दों की चर्चा और उन पर बहस ना करना मीडिया की निष्पक्षता पर सवालिया निशाँ लगाता है | 
   
 

Dwijendra Nath Saigal [dwijendrasaigal@gmail.com] Bhopal M.P. India - 2014-01-31 13:32:02

 
  Congratulation sir! for enlightening the undotted I`s and the uncut t`s in Kejriwal`s documentation of GOOD GOVERNENCE.
The task at his hands need the willing and helping participation and reassuring support of those matured minds who can sell the same idea of patience to us Indians -- in our language-- as sold by ENGLISH... ROME WAS NOT BUILT IN A DAY. Probably we have to abandon the idea of doubting and criticizing the intentions of HAND AS WORKING AGENCY, because it is not delivering to satisfy THE SYSTEM\\\'s EXPECTATIONs in time schedule which is dictated by the desire of a dictating MOB who has seen and practiced CORRUPTION as a functioning solution for all their PROBLEMS
 
   
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