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अराजकता की जरूरत

विचार

 

अराजकता की जरूरत

प्रीतीश नंदी


पिछले हफ्ते मरीन ड्राइव से गुजर रहा था तो मैंने एक नेता का बैनर देखा. उस पर लिखा था, 'हमारा लोकतंत्र अच्छी दशा में है और अराजकता के बिना भी यह काम कर सकता है.' इशारा साफ है. हालांकि, यह तर्क ठीक नहीं है कि हमारी राजनीति में अराजकता के लिए जगह नहीं है. यहां हर चीज के लिए जगह है. यही तो हमारी खासियत है, किंतु हमारी मुख्यधारा के राजनीतिक दल मौजूदा स्थिति पर सवाल उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को हमेशा संदेह से देखते हैं.

केजरीवाल


अराजकता विचलित करने वाले सवाल उठाती है, पर कभी-कभी ये सवाल पूछना जरूरी होते हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि अराजकता अच्छी होती है, लेकिन यह एक खास काम करती है. मौजूदा हालात को झकझोरने का.

उथल-पुथल हमें जड़ यथास्थिति के चंगुल से छुड़ाती है, बदलाव लाती है. यदि यह नहीं होगा तो यथास्थिति बनी रहेगी और शोषण की एक उप-संस्कृति और विकसित हो जाएगी. (पिछले हफ्ते राज्यसभा के लिए नामांकित 58 नए सांसदों में 50 करोड़पति हैं और इनमें से कई तो करोड़ोंपति हैं, यह छोटा-सा उदाहरण है.)

मजे की बात है कि लोकतंत्र की शेखी बघारने वाले ही असहमति से खफा होते हैं. पहले तो वे इसकी उपेक्षा कर देते हैं (इरोम शर्मिला के अनशन की 500 हफ्ते से उपेक्षा की जा रही है.) फिर आधी रात को विरोध कुचलने की कोशिश होती है. (बाबा रामदेव के अनुयायियों पर हमला) आखिर में आती है जेल. यदि इससे भी काम न बने तो पुलिस एनकाउंटर. सौभाग्य से हमारे यहां जागरूक मीडिया और सतर्क न्यायपालिका है. आप विद्रोह के फर्जी आरोपों पर विनायक सेन को जेल में डाल सकते हैं पर जब सुप्रीम कोर्ट उन्हें रिहा करने का आदेश देती है तो आपको मानना ही पड़ता है.

व्यवस्था अन्ना का धरना तोड़ सकती है, पर उनकी विश्वसनीयता और केजरीवाल का उत्साह खत्म नहीं कर सकती. मुख्यमंत्री बनने के बाद भी जन लोकपाल बिल के लिए केजरीवाल का संघर्ष जारी है. ऐसी दृढ़ प्रतिबद्धता आखिर में बदलाव लाती है न कि अच्छे शासन के प्रति खोखली बातें. यही वजह है कि इस बार हमारे सामने मौजूदा सरकार को चुनौती देने वाले पूरी तरह से दो भिन्न नेता उभर रहे हैं. और अपनी ही पार्टी को भीतर से चुनौती दे रहे राहुल इस त्रिकोण को पूरा करते हैं.

इसी वजह से अराजकता लोकतंत्र का अविभाज्य अंग है. जब कोई समाज इस विकल्प की अनदेखी करता है तो इसका अर्थ या तो यह है कि समाज आकलन शक्ति खो चुका है (जैसे यूपीए-2) और वह मानता है कि इससे बेहतर नहीं हो सकता. दूसरा अर्थ पूरी तरह असहाय होने का भी हो सकता है. सौभाग्य से दोनों ही बातें सच नहीं हैं, इसलिए हमें नए समाधानों की तलाश करनी होगी. जो व्यवस्था में हलचल मचाते हैं वे ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि एक बेहतर समाज, बेहतर व्यवस्था वास्तव में संभव है. हो सकता कि शुरू में उन्हें यह पता न हो कि इसे कैसे हासिल किया जाए. उनसे गलतियां, मूर्खतापूर्ण गलतियां भी हो सकती हैं, लेकिन व्यवस्था को चुनौती देने की उनकी तैयारी ही परिपक्त लोकतंत्र की पक्की निशानी है.

13.02.2014, 14.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sanjay kumar mishra [snjkmrmishra4@gmail.com] gaya - 2014-02-17 11:13:55

 
  सही कहा आपने सर सतर्क न्यायपालिका और जागरूक मीडिया न होती तो इस देश कि और बड़ी दुर्गति हो जाती भगवन मंगल करे जी हमारे देश का. 
   
 

anil jain [aniljin938@gmail.com] new delhi - 2014-02-13 12:27:18

 
  लोकतंत्र और लोकलाज. सभा जरूरी है एक अच्छी व्यवस्था देने में. अन्ना के अनशन को तो किसी ने अराजक नहीं कहा. क्यों दिल्ली की कुछ घटनाओं में अराजकता की बात आई. 
   
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