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माओवादी वार्ता के अंधेरे में

बहस

 

माओवादी वार्ता के अंधेरे में

दिवाकर मुक्तिबोध

माओवादी


लोकसभा चुनाव की खबरों की भीड़ में एक खबर दबकर रह गई, जबकि वह बेहद महत्वपूर्ण थी. 5 अप्रैल को मीडिया के कुछ हिस्सों में एक खबर आई, जिसमें कहा गया था कि माओवादी कुछ शर्तों के साथ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं. संगठन की केन्द्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय के हवाले से कहा गया कि वार्ता सचमुच की शांति के लिए और ईमानदारी के साथ होनी चाहिए लेकिन इसके लिए जेल में बंद वरिष्ठ नेताओं को रिहा करना होगा ताकि वार्ता के लिए माओवादियों की तरफ से प्रतिनिधिमंडल का गठन किया जा सके.

चूंकि सेन्ट्रल कमेटी के प्रवक्ता अभय के साक्षात्कार के रूप में यह बयान जारी हुआ है लिहाजा इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं है और यह माना जाना चाहिए कि पार्टी बातचीत के लिए वाकई तैयार है. यह सुखद है. इसे नक्सल समस्या के समाधान की दिशा में एक नई पहल के रूप में देखा जा सकता है.

तीन वर्ष पूर्व, 1 जुलाई 2010 को 58 वर्षीय चेरिकुरि राजकुमार उर्फ आज़ाद के कथित इनकाउंटर में मारे जाने के बाद यह पहला मौका है जब माओवादियों की तरफ से वार्ता के लिए पहल की गई हो. सीपीआई माओवादी सेन्ट्रल कमेटी के प्रवक्ता एवं पोलित ब्यूरो के सदस्य आज़ाद वह शख्स था, जिसके प्रयासों एवं मध्यस्थता की वजह से केन्द्र सरकार और माओवादियों के बीच वर्षों से जमी बर्फ पिघल रही थी और वार्ता के लिए वातावरण बन रहा था.

इसके पूर्व नई दिल्ली में नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने 9 फरवरी 2010 को अपने एक बयान में कहा था कि यदि नक्सली हिंसा छोड़ते हैं तो सरकार किसी भी मुद्दे पर उनसे बातचीत के लिए तैयार हैं लेकिन बाद के बयानों में चिदंबरम ने यह भी कहा था कि यदि नक्सली हिंसा जारी रही तो सरकार का आपरेशन भी जारी रहेगा.

छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित राज्यों में आपरेशन ग्रीन हंट पूरे शबाब पर था तथा तमाम हिंसक वारदातों के बावजूद नक्सली बैकफुट पर नज़र आ रहे थे. लेकिन हिंसा और प्रतिहिंसा के उस दौर में भी केन्द्र सरकार ने वार्ता के लिए दरवाजे खुले रखे. हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने की गृहमंत्री की नक्सलियों से अपील पर अपील का यह नतीजा निकला कि एक सिलसिला शुरु हुआ, कुछ शर्तें एक-दूसरे के सामने रखीं गईं.

माओवादियों की प्रमुख शर्त यह थी कि आपरेशन ग्रीन हंट तत्काल बंद किया जाए तथा अर्द्धसैनिक बलों को अपने बैरकों में लौटने के निर्देश दिए जाएं जबकि केन्द्र सरकार चाहती थी कि नक्सली हिंसा बंद करें और हथियार डालें तथा उसके बाद ही वार्ता जैसी कोई चीज संभव होगी. सार्वजनिक रूप से जारी किए गए पत्रों एवं बयानों के बीच वार्ता की दिशा में आगे बढ़ा जा रहा था कि इस बीच आज़ाद की कथित गिरफ्तारी एवं आंध्रप्रदेश के जंगलों में उसके मारे जाने की घटना से नक्सली बिफर गए और वार्ता की सारी संभावनाएं खत्म हो गईं. तब से लेकर अब तक न तो केन्द्र एवं छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित राज्यों की ओर से बातचीत के लिए वातावरण बनाने की कोशिश की गई और न ही माओवादियों ने ऐसा कोई इरादा जाहिर किया. लेकिन माओवादियों के प्रवक्ता के हालिया बयान से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि माओवादी बातचीत के लिए राजी हैं लेकिन उनकी अपनी कुछ शर्तें हैं. माओवादी प्रवक्ता अभय के बयान को केन्द्र ने कितनी गंभीरता से लिया, फिलहाल इसके कोई संकेत नहीं मिले हैं लेकिन यह खबर मीडिया में भी दबकर रह गई और किसी छोर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई. यह संभव है लोकसभा चुनाव के बाद नई सरकार इसे संज्ञान में ले या यह भी संभव है कोई प्रतिक्रिया न दें.

दरअसल माओवादी प्रवक्ता के बयान में कुछ बातें ऐसी हैं जिसे स्वीकार करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए नामुमकिन है. मसलन अभय का कहना है- ‘‘शांतिवार्ता के लिए जरूरी है कि सरकार माओवादियों के आंदोलन को देश के लोगों का आंदोलन, एक आंतरिक संघर्ष और गृहयुद्ध के रूप में स्वीकार करें. तब कहीं जाकर वार्ता के जरिए बुनियादी मुद्दों को सुलझाया जा सकेगा ताकि गृहयुद्ध खत्म हो जाए.’’ माओवादी प्रवक्ता के इस बयान को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? नक्सलियों के द्वारा की गई हिंसा को जिसमें पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों के जवानों एवं निरपराध नागरिक बड़ी संख्या में मारे गए हैं और यह दौर अभी भी जारी है, को कैसे जनआंदोलन कह सकते हैं? क्या इसे आंतरिक संघर्ष और गृहयुद्ध कहा जाएगा? क्या लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान होता है?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Binay singh [binaysingh@gmail.com] kulti - 2014-05-01 04:42:51

 
  जिस लोकतंत्र में हम जी रहे हैं इसमें आने वाले दिनों में माओवादियों की संख्या बढ़ेगी. जो लो सरकार में आज तक बैठे हैं उन्होने जमीन पर खट कर कमाया खाया नहीं है. मगर उन्हों लोगों को शोषण करना आता है. इस कानून में गरीबों को कभी न्याय नहीं मिलेगा. और ऐसी कोई सरकार नहीं बनेगी जो जमीनी लोगों के लिए सही कानून बनाए. 
   
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