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किसान के लिये कैसा चुनाव

मुद्दा

 

किसान के लिये कैसा चुनाव

देविंदर शर्मा

किसान


अपने तय समय पर 12 मई को नौवें दौर का मतदान संपन्न हो जाएगा. इसलिए किसानों के लिए भी यह आराम करने का समय होगा. ऐसा इसलिए नहीं होगा कि औपचारिक चुनाव अभियान समाप्त हो जाएंगे, जिस कारण उन्हें बहुत थकान हुई और न ही इसलिए कि उन्हें घर-घर जाकर अपने प्रत्याशियों के लिए चुनाव प्रचार करना पड़ा. असल में सच्चाई यही है कि इस वर्ष के चुनाव में उन्हें लोकतंत्र के इस उत्सव को देखने के लिए बमुश्किल ही समय मिल पाया.

खेतों में खड़ी गेहूं की फसल काटने में किसान बहुत व्यस्त रहे. आदर्श तौर पर अप्रैल के पहले सप्ताह में किसान अपनी फसलों को काटने के बाद बाजार में बेचकर निश्चिंत हो जाते हैं, परंतु अप्रैल के पहले सप्ताह में विलंब से हुई असामान्य बारिश और ओलावृष्टि के कारण किसान अपनी फसल नहीं काट सके. देश के समूचे उत्तार-पश्चिमी हिस्से में असामान्य बारिश के कारण फसलों की कटाई में तकरीबन एक पखवाड़े का विलंब हुआ.

फसलों की धीमी कटाई, मंडियों का खराब रखरखाव और बिक्री में विलंब के कारण खरीद प्रक्रिया प्रभावित हुई. इस कारण किसान चुनावों से दूर ही रहे. इस हालात में राजनीतिक पार्टियों ने भी ग्रामीण इलाकों से दूरी बरती.

उदाहरण के तौर पर पंजाब में यह तथ्य सामने आया कि तकरीबन 250 उम्मीदवारों के क्षेत्रों में खेती-किसानी राजनीतिक हलचल से अप्रभावित ही रही. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी परिदृश्य कुछ अलग नहीं है.

एशिया के सबसे बड़े बाजार खन्ना अनाज मंडी में गेहूं के अपने ढेर पर बैठे मंडियाला कलां गांव के संतोष सिंह बताते हैं कि हालांकि कुछ राजनीतिक पार्टियों ने गांव में अपनी सभाएं कीं, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा, क्योंकि किसानों के पास उनके लिए समय नहीं था.

कोई आश्चर्य नहीं कि चुनाव अभियानों में किसानों से जुड़े मुद्दे गायब रहे या उनकी कोई चर्चा नहीं हुई. अधिकांश उम्मीदवारों ने किसानों का जिक्र किया, लेकिन उनकी समस्याओं पर बात नहीं की. अकेले किसान ही क्यों, उम्मीदवारों ने मंडियों से संबंधित उनकी समस्याओं और गेहूं की फसलों के भंडारण पर भी कुछ नहीं बोला.

जो बात हैरान करती है वह यह कि किसी भी राजनीतिक दल के एजेंडे में खुले में पड़े गेहूं के विशाल स्टॉक का समुचित भंडारण चुनावी मुद्दा नहीं बना और न ही सड़ रहा अनाज कोई मुद्दा बना. पंजाब के समूचे मालवा क्षेत्र में घूमने के बाद मैंने पाया कि तमाम जगहों पर खुले में अनाजों का भंडारण किया गया है. खुले आसमान के नीचे काली पन्नियों में भरकर रखे गए अनाज के ढेर कई जगहों पर दिखाई दिए. पिछले 25 वषरें से आज तक मैं इन चीजों का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं. फसल की कटाई के हर मौसम में पुराने स्टॉक की जगह नए अनाज भंडार आ जाते हैं. आज तक कुछ भी नहीं बदला है. खुले में पड़ा यह अनाज भंडार आगे के वर्षों में और अधिक खराब होता जाता है.

इस वर्ष भी स्थिति यही है कि पंजाब और हरियाणा में नए अनाज भंडारण के लिए जगह की कमी है. अब मध्य प्रदेश भी इसमें शामिल हो गया है, क्योंकि वह अब गेहूं के बड़े उत्पादक राज्य के तौर पर उभरा है. कमजोर मौसम स्थितियों के कारण पंजाब में फसल की कटाई में एक पखवाड़े की देरी हुई. बावजूद इसके यह निराशाजनक है कि मंडियों में गेहूं के भंडार हर कहीं बिखरे देखने को मिल रहे हैं. किसानों की शिकायत है कि मंडियों में अपना अनाज रखने के लिए जगह पाने के लिए अभी कुछ दिन और इंतजार करना होगा.

जब अधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने दूसरे राज्यों की धीमी गतिविधि को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया. पंजाब को उम्मीद है कि अगले माह 20 लाख टन गेहूं बाहर भेजा जा सकेगा, लेकिन खाली होने वाला स्थान मिल के चावल से भर जाएगा, जो फिलहाल निजी चावल विक्रेताओं के यहां रखा हुआ है. यदि सरकार गेहूं के भंडारण की इस सतत समस्या का समाधान खोज सके तो मुझे आश्चर्य होगा. आखिर किसानों को अधिकाधिक उत्पादन करने को क्यों कहा जाता है? साफ है कि खाद्यान्न उत्पादन के मोर्चे पर कोई संकट नहीं है, बल्कि समस्या खाद्यान्न प्रबंधन की है.

तमाम हो-हल्ला के बावजूद पिछले कुछ वर्षों से हम समुचित भंडारण क्षमता उपलब्ध करा पाने में विफल रहे हैं. खबरों के मुताबिक पहली अप्रैल तक पंजाब में 143 लाख टन अनाज भंडारण की क्षमता थी. समस्या यह है कि इसमें से 121 लाख टन के लिए जगह पहले वाली फसलों से ही भरी हुई है.

इस वर्ष अकेले पंजाब से तकरीबन 140 लाख टन गेहूं की खरीदारी की उम्मीद है. इसमें से 70 फीसदी हिस्सा खुले में रखा जाएगा. प्लेटफार्म के किनारे तिरपाल से ढककर बोरियों में भी अनाज रखा जा रहा है. इससे कुल 114 लाख टन अनाज के लिए अतिरिक्त जगह उपलब्ध हुई है, लेकिन इसमें से 40 लाख टन जगह पहले से भरी हुई है.

हम जानते हैं कि खुले में पड़ा खाद्यान्न न केवल खराब होता जाता है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य और यहां तक कि पशुओं के उपभोग के लिहाज से भी खाने योग्य नहीं होता. यदि हम पड़ोसी राज्य हरियाणा की बात करें तो यहां तकरीबन 87.3 लाख टन गेहूं की खरीदारी होने की उम्मीद है. यहां खाद्य आपूर्ति अधिकारियों को नए अनाज के लिए जगह तलाशने हेतु कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.

इस तरह की कई और समस्याएं भी हैं. फतेहाबाद में गुस्साए व्यापारियों ने सरकार पर अनाज की समुचित खरीदारी नहीं करने का आरोप लगाते हुए मंडी के मुख्य द्वार पर तालाबंदी कर दी. स्थिति यह है कि यहां आने वाले अतिरिक्त खाद्यान्न को रखने के लिए शायद ही जगह है. अन्य जगहों पर भी स्थिति कुछ अलग नहीं है.

अच्छी खबर यही है कि इस वर्ष वास्तविक खरीदारी तय लक्ष्य से कम रहने की उम्मीद है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि सरकार द्वारा प्रस्तावित बोनस हासिल करने के लिए राजस्थान की सीमा से सटे इलाकों के किसान लाभ के लालच में अपना गेहूं सीमा पार बेच रहे हैं. राजस्थान सरकार ने गेहूं की उपज करने वाले किसानों को 100 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देने की घोषणा की है. मध्य प्रदेश में भी गेहूं की पैदावार बढ़ी है और वहां भी हालात बहुत कुछ पंजाब की तरह है. मध्य प्रदेश में 110 लाख टन अनाज भंडारण की क्षमता है, लेकिन काफी जगह पूर्व वर्ष के अनाज से भरी हुई है.

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि यह समस्या पिछले 25 बरसों से बरकरार है. हर वर्ष सरकार कुछ कदम उठाने का वादा करती है, लेकिन बदलाव कुछ भी नहीं हुआ. भंडारण क्षेत्र में 100 फीसदी एफडीआइ यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति से भी कोई विशेष मदद नहीं मिली. सवाल यही है इस खतरनाक लापरवाही से क्या हमने कोई सबक सीखा. मैं यह कभी नहीं समझ सका कि क्यों हमारी सरकार समुचित भंडारण क्षमता की दिशा में कोई कदम नहीं उठाती ताकि अनाज की बर्बादी को रोका जा सके.

01.05.2014, 15.53 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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