पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >राहुल राजेश Print | Share This  

मोदी को वोट दिया यानी फासिस्ट

विचार

 

मोदी को वोट दिया यानी फासिस्ट

राहुल राजेश

नरेंद्र मोदी


अक्सर कहा जाता है कि भारतीय जनता पार्टी सांप्रदायिक पार्टी है, फिरकापरस्त पार्टी है, फासिस्ट पार्टी है, कट्टरपंथी पार्टी है, देश को बाँटने वाली पार्टी है, देश को तोड़ने वाली पार्टी है, दंगे कराने वाली पार्टी है, मुसलमानों का कत्लेआम कराने वाली पार्टी है. नरेंद्र मोदी को भी कभी हिटलर, कभी हत्यारा, कभी मौत का सौदागर और न जाने क्या-क्या कहा जाता है.

इस बार के लोकसभा चुनाव में खुद को सेकुलर कहने वाली और मुसलमानों की हितैषी बताने वाली सभी राजनैतिक पार्टियों और नेताओं ने भाजपा और नरेंद्र मोदी को गरियाने में सारी हदें और मर्यादाएँ पार कर ही दी हैं. कोई मोदी की बोटी-बोटी कर डालने की धमकी दे रहा है, कोई उन्हें कुत्ते के पिल्ले का बड़ा भाई कह रहा है. कोई उन्हें बाघ कह रहा है. कोई उन्हें खून बेचने वाला कह रहा है. मोदी को और न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है. आजम खान, बेनी प्रसाद, दिग्विजय सिंह आदि के साथ-साथ उमर अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला आदि भी मोदी को गरियाने में भाषायी संयम खो चुके हैं. अब फारूख अब्दुल्ला ने गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक और विवादित बयान दे डाला है. उनका कहना है कि मोदी को वोट करने वाले समंदर में डूब जाएँ.

यहाँ सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भाजपा और मोदी को वोट करने वाले सभी के सभी सांप्रदायिक हैं, कट्टरपंथी हैं, फिरकापरस्त हैं, विखंडनकारी हैं, फासिस्ट हैं? क्या यह देश के उन सभी मतदाताओं का अपमान नहीं हैं, जिन्होंने अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनवाई? क्या यह गुजरात के उन सभी मतदाताओं का अपमान नहीं है, जिन्होंने नरेंद्र मोदी को एक बार नहीं, लगातार तीन-तीन बार मुख्यमंत्री चुना? क्या यह राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के उन सभी मतदाताओं का अपमान नहीं हैं, जिन्होंने इन तीन राज्यों में पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को बहुमत से चुना? क्या यह एनडीए के उन सभी घटक दलों का अपमान नहीं हैं, जिन्होंने भाजपा को समर्थन दिया?

इसी चश्मे से देखें तो फिर एनडीए के भूतपूर्व या मौजूदा सभी के सभी घटक दल भाजपा की तरह फासिस्ट, फिरकापरस्त, देश को बाँटने वाले, मुसलमानों का कत्लेआम करने वाले ही हुए न? फिर तो कल तक भाजपा की साझीदार रही नीतिश कुमार की जदयू भी फासिस्ट, फिरकापरस्त और मुसलमानों का कत्लेआम करने वाली पार्टी ही ठहरी न? क्या यह कहना कि भाजपा को वोट देने वाले संमंदर में डूब जाएँ, प्रकारांतर से पूरे लोकतंत्र और लोकतंत्र के इस महापर्व का अपमान नहीं है? क्या यह लोकतंत्र के नागरिकों और मतदाताओं का भी अपमान नहीं है? और अंतत: क्या भाजपा और मोदी को वोट देने वाले सारे हिंदू सांप्रदायिक हैं, फासिस्ट हैं? क्या भाजपा को समर्थन देने वाले सारे हिंदू कत्लेआम में विश्वास करते हैं?

खुद को सेकुलर कहने वाली पार्टियाँ गला फाड़-फाड़कर मुसलमानों को आगाह कर रही हैं कि मोदी को वोट मत दो, भाजपा को वोट मत दो. देश में अगर भाजपा की सरकार बन गई तो मुसलमानों को मार डालेगी. तो क्या गुजरात में 2002 के दंगों के बाद एक भी मुसलमान नहीं बचा? क्या राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में दुबारा सत्तारूढ़ भाजपा सरकारें मुसलमानों को वहाँ से खदेड़ने में ही लगी हुई हैं? क्या जब बिहार में भाजपा-जदयू गठबंधन की सरकार थी, तो उनका बस एक ही काम था कि मुसलमानों को मार भगाओ. क्या जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें नहीं हैं, क्या सिर्फ वहीं अमन-चैन है? क्या वहाँ कौमी दंगे नहीं हुए?

उत्तर प्रदेश में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सपा सरकार को ही सीधे-सीधे जिम्मेदार ठहराया है. क्या यह भी भाजपा और मोदी की ही चाल है? 2002 के गुजरात दंगों के मामले में भी एसआईटी और निचली अदालत ने नरेंद्र मोदी को निर्दोष पाया है और अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने भी एसआईटी की पूरी जाँच और इसके नतीजे को सही ठहराया है. लेकिन भाजपा और नरेंद्र मोदी को गरियाने-घेरने-धकियाने के चक्कर में राजनीतिक पार्टियाँ सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को भी दरकिनार करने से बाज नहीं आ रही हैं. क्या यह देश के सर्वोच्च न्यायालय का अपमान नहीं है?

खुद को सेकुलर कहने वाली और मुसलमानों का शुभचिंतक बताने वाली पार्टियाँ गुजरात दंगों का बार-बार जिक्र करके और नरेंद्र मोदी का भय दिखाकर उन्हें भाजपा के खिलाफ और अपनी तरफ लामबंद करने की कोशिश कर रही हैं. और इस तरह वे नरेंद्र मोदी की पीएम पद की दावेदारी को खारिज करने की कोशिश कर रही हैं. उनका तर्क है कि मोदी ने मुसलमानी टोपी नहीं पहनी, इसलिए वे सेकुलर नहीं हैं. लेकिन मुसलमानों के ही एक बड़े धार्मिक नेता ने यह साफ कर दिया कि मोदी ने टोपी नहीं पहनी तो कुछ गलत नहीं किया. जैसे हमें उनकी तरह माथे पर तिलक लगाने को कोई बाध्य नहीं कर सकता, उसी तरह हम उन्हें मुसलमानी टोपी पहनने को बाध्य नहीं कर सकते. यह हरेक का निजी मामला है और हमें एक-दूसरे की संस्कृति और परंपरा का सम्मान करना चाहिए. जी हाँ, यही सेकुलरिज्म है.
आगे पढ़ें

Pages:

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in