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तय करो किस ओर हो तुम

विचार

 

तय करो किस ओर हो तुम

प्रशांत दुबे

सुनील


विकास के दो पक्ष हैं, एक विकास से फायदा लेने वाले लोगों का और दूसरा विकास की भेंट चढ़ रहे लोगों का. यह आपको तय करना है कि आप कैसे देखेंगे विकास को.
केसला मीडिया संवाद-2013 में सुनील भाई

मुझे ठीक-ठीक तो याद नहीं लेकिन यह शायद 1995 की बात थी. हम अपने गाँव (शोभापुर , जिला-होशंगाबाद) में क्रिकेट खेल रहे थे. बस स्टैण्ड की ओर से एक इकहरे बदन के कुर्ता,पायजामा पहने व्यक्ति ने हमसे राजा साहब के घर का पता पूछा. मैंने उन्हें राजा साहब के घर तक छोड़ा. रास्ते में थोड़ी सी बातचीत हुई. उस समय तक हम लोगों ने क्षेत्रीय युवा संगठन की स्थापना कर ली थी. उस संक्षिप्त बातचीत में उन्होंने उस संगठन के कामकाज के विषय में पूछा. उस समय तक ना तो संगठन ने ही अपनी दिशा तय की थी और न ही मैंने व्यक्तिगत तौर पर कुछ पढ़ा-लिखा था. मैंने तपाक से कहा कि हम तो नेत्र शिविर लगवाते हैं और उसके आगे-पीछे कुछ नहीं. उन्होंने कहा वैचारिक स्तर पर, मैंने कहा कुछ नहीं. राजा साहब का घर आ गया था तो हमने उन्हें छोड़ा और नमस्ते की. सुनील भाई से यह मेरी पहली मुलाकात थी.

पढ़ाई खत्म करके पत्रकारिता में कदम रखने के बाद वर्ष 2000 में उनसे फिर मुलाकात हुई भोपाल चूंकि सामाजिक आन्दोलनों के लिए महत्वपूर्ण गतिविधियों का केन्द्र था और सामाजिक क्षेत्र में काम करने के कारण फिर यह मुलाकात आम होती गई. 2001 में उन्होंने एक किताब पढ़ने को दी लेकिन उसके पैसे भे बता दिए. पैसे तो दे दिये लेकिन यह लगा कि यह व्यक्ति तो अपनी किताबें ही बेचता रहता है. वह किशन पटनायक जी के लेखों का संग्रह था. बहरहाल समाजवाद में ज्यादा दिलचस्पी थी नहीं, तो बेमन से पढ़ना शुरू किया पर मन से रखा उस किताब को. बहुत बाद में समझ में आया कि यह किताबें नहीं आंदोलन हैं.

2004 के लोकसभा चुनाव में मैं अपने गांव गया था, उस समय तक बहुत ज्यादा झुकाव बीजेपी की तरफ था. शनिवार (बाजार के दिन) मैंने अपनी जीप पर खड़े, हांथ में चुंगा माइक लिए एक प्रत्याशी को भाषण देते पहली बार सुना था. उस भाषण ने सुनील भाई को लेकर मेरी राय बिलकुल बदल दी. उन्होंने तत्कालीन आर्थिक परिदृश्य, एलपीजी युग से बात शुरू कर हमारे गांव के बाजार में तेल/नमक/मसाला बेच रहे व्यक्ति तक की पूरी बात सरल रूप में कही थी. यह भाषण लगभग 1 घंटे का था और वे अकेले बोले जा रहे थे. मैंनें पूरा भाषण सुना और उनसे मिला भी. उन्होंने मुझसे हमारे संगठन के साथियों के साथ बैठने का आग्रह भी किया. कोशिश की, पर वो बातचीत सफल नहीं हो पाई. पर उनके उस भाषण ने मुझे इतना प्रभावित किया था कि उस चुनाव में मैंने उन्हें ही वोट किया था. पर भारतीय राजनीति का जो हाल है वह कमोबेश यहाँ भी रहा. यहां भी नमक बेचने वाला व्यक्ति यह तो जानता है कि वे उनके हक की बात कर रहे हैं, पर यह बात वोट में बदलती नहीं है. सुनील भाई चुनाव हार गये.

इसके बाद तो जब सुनील भाई के विषय में बातें पता चलती गईं तो निश्चित रूप से मुझे लगता कि हम गांधी को ही तो देख रहे हैं. उनका शिक्षण/प्रशिक्षण, उनका रहन-सहन, पहनावा, खान-पान जितना सरल उसके ठीक विपरीत विचारों में उतनी ही दृढ़ता. एक जीवट व्यक्तित्व. बाद में पता चला कि दिल्ली विश्वविद्यालय में भी लोग उन्हें यही कहते थे.

उनकी लिखी बेहद पतली किताबें, जो कि लगभग विषम (3 रू./5 रू.) अंकों के मूल्य की हुआ करती थीं बहुत ही पैनी धार और साफ़ दृष्टिकोण के साथ वंचित तबके का प्रतिनिधित्व करती ही मिलीं. उनकी इस कम कीमत की किताब का मूल्य चुकाने में भी कई बार हमारे साथियों को लगा कि इनका क्या मूल्य दिया जाये? यह ठीक वैसे ही जैसे सूचना के अधिकार विषय पर प्रशिक्षण देते समय प्रतिभागियों को हम जब आवेदन शुल्क के विषय में बताते हैं तो उनके माथे पर बल आ जाते हैं कि अब इसके लिये भी शुल्क लगेगा? लेकिन जब उन्हें यह पता चलता है कि इस मामूली से शुल्क को चुकाकर वह इस पूरे तंत्र का हिस्सा बन जाता है और जवाब देहिता तय करता है. वैसे ही सुनील भाई की किताबों के साथ था, इस मूल्य को चुकाकर हम अपने आसपास घटित हो रहे घटनाक्रम को उनकी नजर से समझ सकते थे, भांप सकते थे. शायद, वे मित्र भी सही ही थे वो किताबें अमूल्य ही थीं और हैं. कई मौकों पर यह हुआ भी कि उन्होंने जो कहा वह शब्दशः सच साबित हुआ. उन्होंने हमें सोने/चांदी से लेकर पानी तक सभी मुद्दों पर अपनी पैनी नजर से चेताया था.

‘पचमढ़ी मीडिया संवाद-2012‘ के दौरान हमारा उनसे विशेष आग्रह था कि वे भूमण्डलीकरण को वंचित तबके के संदर्भ में हमारे पत्रकार मित्रों के बीच रखें. सुनील भाई तैयार हुये और कहा दिल्ली में हूं, यहीं से सीधा पिपरिया आकर, पचमढ़ी आ जाऊंगा. गोपाल भाई (गांगुड़ा) से पता चला कि सुनील भाई अपने एक ऑपरेशन के लिए दिल्ली में हैं. पता चला कि उन्होंने अपनी किडनी अपने भाई को दी है इसी का जटिल आपरेशन है. यह सुनकर हमने अब आग्रह किया कि अब आप मत आईये और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दीजिए. भूमण्डलीकरण पर चर्चा फिर हो जायेगी. उन्होंने कहा कि इतने सारे पत्रकारों को हम इस महत्वपूर्ण मसले पर यदि अभी जानकारी नहीं दे पाये तो और देर हो जायेगी. यह जाकर अपने-अपने अखबार में इस पर लिखते रहेंगे तो हमारी फौज तैयार हो जायेगी. अपने मर्ज की चिंता न करते हुए इस तरह की बात शायद सुनील भाई ही कर सकते थे. हालाँकि बहुत मान मनुव्व्ल के बाद वे मान गए.

“केसला मीडिया संवाद 2013” के दौरान उन्होंने अर्थनीति और उसके आयाम पर जो बात रखी, वह वहां मौजूद 90 पत्रकारों के दिमाग में तो शब्दतः उतरी ही होगी. पीपुल्स समाचार में छपे मेरे लेखों पर उनकी स्नेह भर डाट मिलती रही. सामयिक वार्ता में लिखने के अरमान थे और जब यह पत्रिका इटारसी से निकलने लगी, तो लगा कि अब तो सुनील भाई को आलेख भिजाकर आसानी से छपवा सकते हैं. मैं गलत था. मैंने सामयिक वार्ता के लिये कई बार आलेख भिजाये, पर वे हर बार समालोचना के साथ वापस मिले. सुनील भाई और टीम ने इस पत्रिका के जो मापदंड स्थापित कर दिये हैं, वह बहुत ही उच्च कोटि के हैं. यहां से मुझे लगा कि उनका स्नेह अपनी जगह है लेकिन गुणवत्ता से कोई समझौता वे नहीं करते हैं और न ही करेंगे.

इसी संवाद के लिए मैंने उन्हें साथी फागराम को भी न्यौतने के लिए कहा. उन्होंने बहुत ही साफगोई से कहा कि फागराम हमारे साथी हैं, लेकिन वे स्थानीय नेता है और उनका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व है. आपको उन्हें आमंत्रित करना है तो आप स्वयं बात करें. हम सभी जानते हैं कि फागराम भाई जैसे साथी किस आंदोलन की बदौलत निकले हैं, लेकिन अपने साथियों के विषय में और स्थानीय नेतृत्व को इस तरह की तवज्जो सिर्फ वे ही दे सकते थ . हमने कई जनसंगठन भी देखे और संस्थाओं की बात ही मत पूछिए, नेता ही तय कर देता है, कि वो किसको लाएगा !!! यह भी तय करना होगा कि नेता कौन है, सुनील भाई या वे जो ......

अब सुनील भाई हमारे बीच नहीं है. अब हैं तो उनके विचार. उनकी पतली किताबें और उनके जीवन की झलक. कई बार लोग कहते हैं कि सुनील भाई ने क्या दिया ? हम कहते हैं कि सुनील भाई ने विचार दिये, स्पष्टता दी, बौद्धिकता दी, वैचारिक दृढ़ता दी, फागराम दिया, हौसला दिया और जिले को पहचान दी. उन्होंने समाजवाद की संभावना को जीवित रखा.

हम लोग अक्सर अपनी औपचारिक चर्चा में अपने जिले का बखान करते हुये कहते रहे हैं हम न समाजवादी हैं, न पूंजीवादी हैं, हम होशंगाबादी हैं. सुनील भाई से परिचय के बाद से हम यह कहने का साहस न कर पाये कि हम केवल होशंगाबादी हैं. हम यही कहते रहे और कहेंगे कि हम वो होशंगाबादी हैं, जहाँ एक खांटी समाजवादी रहता था.

02.05.2014, 15.53 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Rahul Shrivastava [rahul.samvad@gmail.com] Jabalpur - 2014-05-09 09:57:45

 
  This article is the one part of sunil bhai.. he is really a great person , who lived and died for his ideology & never compromised. Thanks for Prashant for good writen and tribute to sunil bhai..
Thanks prashant.. for salute to sunil bhai..
 
   
 

rakesh kumar maurya [rk436160@gmail.com] gonda u.p - 2014-05-07 08:39:55

 
  एक अदभुत महान समाजवादी के बारे मे जानकार देने के लिए धन्यवाद 
   
 

shobha [g.shobha07@gmail.com] indore - 2014-05-07 06:09:24

 
  सुनील भाई की बहन होने के बावजूद बहुत सी बातों से बेखबर थी मैं. उनके जाने के बाद नित नई जानकारियाँ मिल रही है मुझे। उनकी इतनी खासियतें और खूबियां पता ही नहीं थी। कहते है कि बहुत पास से देखने पर ठीक से दिखाई नहीं देता है। 
   
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