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PRITISH NANDY | कैसा भारत बनाना चाहते हैं

विचार

 

कैसा भारत बनाना चाहते हैं हम

प्रीतीश नंदी

 

 

अब जहां भारतीय अर्थव्यवस्था इस कदर गड़बड़झाले में उलझी है कि लगता है कुछ चीजें शायद खुद अपने आप को दुरुस्त कर लेंगी. यदि ऐसा होता है तो इस सुधार, जो हमें 36,50,00 करोड़ रुपए से भी भारी पड़ा है; के बाद हमारा जीवन वापस पटरी पर लौट सकता है. मगर इसके लिए हमें अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा.

 

पिछली बार जब सेंसेक्स इस स्तर तक पहुंचा था, तब मुद्रास्फीति आज के मुकाबले तकरीबन आधी थी. तेल की कीमतें कम थीं. रोजगार मिलना आसान था. रुपया मजबूत था. संपत्तियों की कीमतें आज के रियायती दामों से तकरीबन 30 फीसदी कम थीं और (जो सबसे ज्यादा जरूरी है) हम एक आशावादी राष्ट्र थे. मगर हम वापस वहीं पहुंच गए जहां पहले थे, लेकिन इस समय हमारे हौसले पस्त हैं और हमारा उत्साह ठंडा पड़ चुका है. न सिर्फ इस वजह से कि हमने काफी कुछ खो दिया है वरन हम यह भी नहीं जानते कि भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है.

हमारी राजनीति विघ्नकारी बनी रही. जाति और धर्म जैसे मसले विवादास्पद बने रहे और इसमें हर दिन में नया मोड़ आता जो विशुद्ध लोलुपता और राजनीतिक मिलीभगत से प्रभावित होते.


क्या कोई चमत्कार होगा? इसके बारे में हम कुछ नहीं जानते. लगता है कि यह भयावह दौर आगे चलकर लंबा खिंच सकता है. हमें अब ज्यादा सतर्कता बरतनी होगी. फिलहाल हम यह दिखावा करने में लगे हैं कि यदि हम थोड़ा धैर्य रखें तो सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन आप बड़े पैमाने पर छाई इस वैश्विक मंदी से सेंसेक्स के बारे में उत्साहवर्धक बातें करके या ज्यादा करेंसी नोट छापकर नहीं लड़ सकते.


हमारे पड़ोस में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है. इस संकट से निपटने के उपाय खोजना बहुत जरूरी है, जैसा कि चीन कर रहा है. हमें उनका भी हाथ थामना होगा, जिन्हें इससे सबसे ज्यादा आघात लगा है, जैसे कि मध्य वर्ग. बाकी सब देश भी ऐसा कर रहे हैं. आखिरकार अमेरिकी पूंजीवाद और इसे जिस तरह से झुकना पड़ा है, उसके खिलाफ ताना मारने की बजाय हमें सबसे पहले इस झंझावात से बाहर निकलना होगा. हां, हम खुशनसीब हैं कि हमने रुपए को पूर्ण परिवर्तनीय नहीं बनाया.


हम इसलिए भी खुशनसीब हैं कि निर्बाध भूमंडलीकरण के खिलाफ डटे रहे. ऐसे समय में थोड़ी-सी बुद्धिमानी बहुत महत्वपूर्ण साबित होती है, लेकिन नहीं, जश्न मनाने का कोई कारण नहीं है. यदि हम इस क्षरण को और आगे बढ़ने से रोकना चाहते हैं, तो हमें तुरंत कुछ उपाय करने होंगे. इस दिशा में पहला काम है उनमें भरोसा बहाल करना, जो इसे खो चुके हैं.


अर्थव्यवस्था सिर्फ आंकड़ों के आधार पर काम नहीं करती है. जबकि हम आंकड़ों पर निर्भर हैं, क्योंकि हम चीजों को आंकने का यही एक तरीका जानते हैं. धन-संपत्ति का निर्माण और विनाश कहीं ज्यादा रहस्यमय तरीकों से काम करता है और हमें इस बात को स्वीकार करना होगा. आंकड़े भी कभी-कभार भ्रमित कर सकते हैं.


हाल के वर्षो में भारत में कई अच्छी घटनाएं घटी हैं. दुनिया एक राष्ट्र के तौर पर हमें गंभीरता से लेने लगी है. कभी दुनिया के अखबारों में पिछले पन्ने पर छोटे से कॉलम में सिमटे रहने वाला भारत आज प्रथम पृष्ठ की खबर बन गया है. किसी भी अन्य देश से ज्यादा धनकुबेर हमने पैदा किए हैं. हमने दुनिया की कुछ उत्कृष्ट कंपनियों और ब्रांड्स का अधिग्रहण किया है.


हमने अब तक दुनिया में सबसे ज्यादा आतंकी हमले झेले हैं और भले ही नया कारोबार स्थापित करने के मामले में हमारा रिकॉर्ड दुनिया में खराब हो, इसके बावजूद निवेशक आए. इसी तरह अरबों डॉलर भी आए. लेकिन हमारी राजनीति विघ्नकारी बनी रही. जाति और धर्म जैसे मसले विवादास्पद बने रहे और इसमें हर दिन में नया मोड़ आता जो विशुद्ध लोलुपता और राजनीतिक मिलीभगत से प्रभावित होते. भारत की अधिसंख्य गरीब आबादी उपेक्षित बनी रही. साक्षरता के लक्ष्य मुरझा गए. स्वास्थ्य सेवाएं आगे नहीं बढ़ सकीं. हम ज्यादातर मानवीय मसलों पर नाकाम रहे क्योंकि हम पैसा बनाने में कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहे.


कुछ समय के लिए ऐसा लगा मानो हम सबकी दिलचस्पी झुग्गी-बस्तियों को हटाने और अमीरों के लिए आलीशान फ्लैट्स व ऑफिस बनाने, सैकड़ों नए टेलीविजन चैनल खोलने, ज्यादा हवाई जहाज खरीदने, नई-नई क्रिकेट लीग की शुरुआत करने तथा और ज्यादा महंगी, बेतुकी फिल्में बनाकर हॉलीवुड को चुनौती पेश करने में है. भारतीय आकाश में और भी एयरलाइंस आ गई हैं. ज्यादा फैशन बुटीक्स और लक्जरी ब्रांड्स. प्रॉपर्टी की कीमतें आसमान छू रही हैं. इस देश में एक फिल्मी सितारे ने एक ही फिल्म से इतनी कमाई की, जो यहां के सभी स्कूल शिक्षकों की कुल सालाना वेतन से ज्यादा थी.


हमें यह स्मरण रखना होगा कि कोई भी देश अपनी गरीब जनता को नजरअंदाज कर अमीरों के साथ आगे नहीं बढ़ सकता. भारत में दुनिया की एक-तिहाई निर्धनतम आबादी रहती है. भ्रष्टाचार अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ गया.


मुद्रास्फीति हमें डराने लगी. जनता के प्रति जवाबदेही में कमी आ गई. उससे भी बदतर यह जिन सरकारी कर्मचारियों का उनकी इस बदहाली और विपन्नता में सबसे ज्यादा योगदान है, उन्हीं के वेतनमान में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की गई. यह वास्तव में इसके बारे में आत्मावलोकन का बेहतर समय है कि हम कैसा भारत चाहते हैं. हां, हम वैश्विक स्तर पर महाशक्ति बनना चाहते हैं लेकिन ऐसा सिर्फ कट्टरपंथियों, बिल्डरों, बाबुओं, दलालों और बॉलीवुड को सशक्त करने से नहीं हो सकता. राष्ट्र निर्माण और भी ज्यादा समावेशी प्रक्रिया है.

 

28.10.2008, 18.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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