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खाड़ी में प्रवासी मज़दूरों की दुर्दशा

मुद्दा

 

खाड़ी में प्रवासी मज़दूरों की दुर्दशा

रघु ठाकुर

मज़दूर


खाड़ी देशों में भारत ओर पड़ोसी देशों, नेपाल, बंगलादेश आदि के काफी बड़ी संख्या में मज़दूर काम करते है. इन खाड़ी देशों में मुख्यतः दुबई, सउदी अरब, कतर आदि देश शामिल है. यहां के अमीरों के पास तेल का भारी पैसा है और वे अपने हाथ से कोई काम नहीं करते. वैसे तो यूरोप और अमरीकी देशों में भी काफी संपन्नता है परन्तु उनके यहां हाथ से काम करने की परंपरा एकदम समाप्त नहीं हुई तथा मज़दूरों या आदमी के बजाय यूरोप, अमरीकी देशों में मशीनों का इस्तेमाल ज्यादा है, जिनमें मज़दूर की आवश्यकता कम होती है.

परन्तु खाड़ी के देशों में चूंकि अमीर लोग हैं जो अपनी अमीरी के कारण हाथ से काम करना हीन या तुच्छ समझते हैं और इसीलिये खाड़ी देशों में भारतीय भू-भाग से बड़े पैमाने पर मज़दूर लोग काम करने के लिये बुलाये गये हैं. भारत बंगलादेश या नेपाल की तुलना में उन्हें इन खाड़ी देशों में ज्यादा मजदूरी मिलती है. अतः लाखों की संख्या में मज़दूर काम के लिये जाते हैं और इन देशों में कठिन परिस्थितियों में अपना समय गुजारते हैं.

कतर में भारत के मज़दूर बड़ी संख्या में हैं परन्तु वहां उनकी हालत इतनी चिंतनीय है कि बड़ी संख्या में वे मौत के शिकार हो रहे हैं. पिछले 3 वर्षों में लगभग 750 भारतीय और पिछले 2 वर्षों में लगभग 500 नेपाली मज़दूर कतर में मरे हैं. इसके अलावा श्रीलंका, फिलीपीन्स और पाकिस्तान के मरने वाले मज़दूरों की संख्या अभी ज्ञात नहीं हो सकी है.

वैश्वीकरण के समर्थक भारत को उभरती हुई आर्थिक शक्ति या फिर अमरीकी आर्थिक शक्ति से न केवल छद्म तुलना करते हैं बल्कि कभी कभी तो यह भी दावा करते हैं कि बहुत शीघ्र भारत, अमरीका से आगे निकल जायेगा. भारत की अर्थव्यवस्था के विकास का जिक्र करते हुये फोरविस जैसी पत्रिकायें दुनिया के संपन्न लोगों की सूची में भारत के भी कुछ संपन्न लोगों का नाम दर्ज करते है. वे दुनिया में संपन्नता के किस पायदान पर हैं, वे यह घोषित करते हैं.

हम भारतीय लोग इन पत्रिकाओं में भारत के उद्योगपति अंबानी, मित्तल, अजीम प्रेमजी, टाटा आदि के नाम पढ़कर आत्मविभोर हो जाते हैं. इतना ही नहीं, दुनिया की बड़ी उपभोक्ता या वित्तीय कम्पनी के बड़े प्रबंधक पदों पर कौन-कौन भारतीय पदस्थ हैं और किस प्रकार उन्हें करोड़ों रूपये की तनख्वाह के पैकेज मिलते हैं, बताने वाले समाचार पढ़ने को मिलते हैं.

यह भी अक्सर छापा जाता है कि इन्दिरा नुई या श्रीमती चंदा कोचर आदि वे सफल महिलायें हैं, जो भारतीय मूल की हैं और इन विशालकाय कम्पनियों की नियंत्रक हैं. इन्हें दुनिया की प्रभावी महिलाओं की सूची में शामिल किया जाता है, जिससे देश के करोड़ों गरीब लोग जो एक प्रकार से सरकारी भिक्षा पर जिंदा हैं, वे भी न केवल मनमोहित होते हैं बल्कि सपनों में इसी संपन्नता के सपने देखने लगते हैं. यह तथ्य दृष्टि ओझल हो जाता है कि यह क्या कारण है कि भारत के लाखों लोग, रोजगार याने मजदूरी की तलाश में अपना वतन छोड़कर जाने को लाचार हैं. यहां तक कि मजदूरी पाने के लिये भी उन्हें एजेन्टों, दलालों को कमीशन देना पड़ता है और इन मज़दूरों के पासपोर्ट, यात्रा टिकिट और भेजने वाले दलालों के कमीशन में ही पचास हजार से एक लाख रूपये लग जाते हैं, जो यह मज़दूर विदेश जाकर अपनी आमदनी से चुकाते हैं.

जिस भीषण गर्मी में तथा तकलीफों की हालत में यह मज़दूर काम करते हैं, उनकी तकलीफ को समझना भी आसान नहीं है जो मज़दूर जाते हैं, उनके पासपोर्ट ठेकेदार अपने पास रख लेते है और इन मज़दूरों को लौटकर आना भी आसान नहीं होता. अनेक अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थाओं ने अपनी रिर्पोट में उन अमानवीय स्थितियों का जिक्र किया है, जिनमें ये भारतीय भू-भाग के मज़दूर काम करते हैं. कतर में 2022 में फीफा वर्ल्ड कप का आयोजन होना है, जिसके लिये स्टेडियम, होटल आदि निर्माण कार्य हो रहे हैं.

अकेले कतर में 15 लाख बाहर के मज़दूर काम करते हैं, जिनमें 6 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी मज़दूर हैं. भीषण गर्मी और अमानवीय परिस्थितियों के चलते सैकड़ों मज़दूरों की मृत्यु , हृदयगति अवरोध से हो जाती है. इतना ही नहीं वर्ष 2012-13 में दोहा के ट्रामा सेंटर में लगभग 3 हजार मज़दूर भरती कराये गये, जिनमें से लगभग 10 प्रतिशत स्थाई अपंग हो चुके हैं क्योंकि ये लोग काम करते हुये गंभीर रूप से दुर्घटनाग्रस्त हो गये.

समूची दुनिया में बसे और काम करने वाले भारतीय मज़दूरों की संख्या 2 करोड़ से अधिक है. बीबीसी की एक रिर्पोट के अनुसार इन मज़दूरों ने पिछले 3 वर्षों में एक सौ नब्बे अरब डॉलर याने लगभग डेढ़ लाख करोड़ रूपया भारत, अपने परिजनों को भेजा है अर्थात प्रतिवर्ष लगभग 50 हजार करोड़ रूपया भारत में इन विदेश में काम करने वाले प्रवासी मज़दूरों से आ रहा है और भारत के लगभग दस करोड़ आबादी के जीने और खाने का जरिया बन रहा है.

खाड़ी देशों में काम करने वाले मज़दूर भी लगभग 20 हजार करोड़ रूपया प्रतिवर्ष भारत में भेजते हैं. अपनी शारीरिक क्षमता भर वे वहां काम करते हैं और अपने परिजनों को पैसा भेजकर अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं.

लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि भारत से जाने के कुछ समय पश्चात इन्हें बीमारियों के अलावा साहूकारों का भी शिकार होना पड़ता है. दुबई और सउदी अरब आदि में कितने ही भारतीय मज़दूर कर्ज न चुका पाने की वजह से जेलों में बंद है. अपने पहुंचने के आरंभिक दिनों में ये मज़दूर कुछ ज्यादा खर्च कर देते हैं और मालिकों या ठेकेदारों के कर्जदार बन जाते हैं तथा बाद में कर्ज न चुका पाने की वजह से उन्हें जेलों में डाल दिया जाता है.

मुझे अनेक मित्रों ने बताया कि कई बार तो उनके साथ के मज़दूर चंदा जमा कर इन मज़दूरों का कर्ज चुकाते हैं ताकि वे किसी प्रकार वापस आ सकें और कई बार इन मज़दूरों के परिजन अपनी सम्पत्ति बेचकर इन मज़दूरों को रिहा कराते हैं.

हालांकि भारत सरकार के जिम्मेवार लोग इन हालात के प्रति चिंता करना तो दूर, उन्हें बताना भी पसंद नहीं करते. 6 फरवरी 2014 को राज्यसभा सदस्य आर. सी. खुटिया के प्रश्न के उत्तर में प्रवासी मामलों के मंत्री ने बताया कि दुबई, कतर और सेनेगल में काम करने वाले मज़दूरों की स्थिति अच्छी है, जबकि पिछले साल सितम्बर 2013 में नेपाल के राजदूत ने अमीरों के शासन वाले खाड़ी देशों को खुली जेल कहा था.

खाड़ी देशों में तापमान बहुत अधिक रहता है. कतर में औसतन दिन का तापमान 50 डिग्री सेंटीग्रेट से अधिक होता है. अब इतने तापमान में एक इंसान के द्वारा काम करना कितना कठिन होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. इसके साथ साथ कितने ही मज़दूर इसलिये जेलों में बंद कर दिये जाते हैं क्योंकि उन्हें ईश निंदा क़ानून का अपराधी माना जाता है. पाकिस्तान आदि देशों में तो ईश निंदा क़ानून के भय से लोग प्रतिरोध भी दर्ज नहीं करा पाते क्योंकि प्रतिरोध दर्ज कराने मात्र से नाराज़ होकर अगर उनके विरूद्ध कोई ईश अपमान की झूठी शिकायत भी कर देगा तो उन्हें न केवल जेल में रहना होगा बल्कि यातनायें भी सहनी होंगी.

दरअसल संयुक्त राष्ट्र संघ को ईश निंदा क़ानून के संबंध में पहल कर वैश्विक बहस चलाना चाहिये और इन देशों की सरकारों से इस क़ानून को समाप्त करने की मांग करना चाहिये. ईश निंदा क़ानून इतना व्यापक हो गया है कि किसी अन्य धर्मावलम्बी को अपने मजहब का पालन करना भी तकलीफदेह हो गया है.

जब ईश्वर या अल्लाह सर्वशक्तिमान है तो उसकी निंदा या आलोचना से उसके ऊपर क्या फर्क पड़ता है और अगर वह दंड देना चाहे तो वे स्वतः दंड दे सकते हैं परन्तु ईश्वर की निंदा या आलोचना का निपटारा इंसान करे, यह तो अपने आप में ईश्वर को कमजोर सिद्ध करना है और यह एक प्रकार से स्वतः ईश निंदा है. लेकिन यह सारी बहस उन देशों में बेमानी है जहां धर्मान्धता का राज है. जहां एक मजहब के नाम के देश है. भारत, नेपाल, बंगलादेश और श्रीलंका आदि को भी एकजुट होकर इन मामलों को संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाना चाहिये तथा प्रवासी मज़दूरों की स्थितियों को सुधारने के लिये पहल करना चाहिये.

04.05.2014, 17.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशित