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बजट से बदलाव लाने का मौका

मुद्दा

 

बजट से बदलाव लाने का मौका

प्रीतीश नंदी


नरेंद्र मोदी को चुनाव में जीत मिली इसकी एक वजह यह भी है कि लाखों भारतीयों को उनमें बदलाव लाने वाले व्यक्ति की झलक मिली. उनमें तेजी से कड़े फैसले लेने की क्षमता नजर आई. ऐसे फैसले जिनसे शासन में बहुत बड़ा बदलाव संभव हो. लोग सुस्ती और अनिर्णय की स्थिति से उकता गए हैं. वे किसी ऐसे व्यक्ति को चाहते थे, जो उनके जीवन को आसान बनाने के लिए कड़े निर्णय ले सके. पहली परीक्षा तो आगामी बजट ही है. फिलहाल तो हमें अपेक्षाओं को थोड़ा कम करने के प्रयास नजर आ रहे हैं.

नरेंद्र मोदी


यूपीए पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि उसने अर्थव्यवस्था को बहुत खराब हालत में छोड़ा है. हो सकता है यह बात सच हो, लेकिन नए प्रधानमंत्री से हमें न सिर्फ हुए नुकसान को ठीक करने की अपेक्षा है बल्कि इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन कर दिखाएं. लोग सिर्फ करों (और कमरतोड़ महंगाई) से राहत नहीं चाहते. वे एक अलग ही किस्म की सरकार को काम करते देखना चाहते हैं. ऐसी सरकार जिसमें वे भरोसा कर सकें. ऐसी सरकार जो न्यायशील, निष्पक्ष और ईमानदार हो. उन्हें तत्काल नतीजों या फायदों की अपेक्षा नहीं है. वे चाहते हैं कि कोई उनकी ओर ध्यान देता नजर आए. यह सबसे महत्वपूर्ण बात है. वे यह भी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जाए, वसूली पर रोक लगे.

यूपीए के टैक्स संबंधी विज्ञापन के जरिये इस बात को समझा जा सकता है. ये विज्ञापन सिर्फ फूहड़ और अपमानजनक ही नहीं थे, उससे दुनिया में संदेश गया कि हर भारतीय कर चोर है, एक अपराधी है. सवा अरब लोगों में से 3.6 करोड़ भारतीय यानी वे 2.8 फीसदी लोग जो 10 फीसदी खुदरा महंगाई के बावजूद टैक्स चुकाते हैं, उन्हें बार-बार चेतावनी देना कि वे लगातार निगरानी में हैं, क्योंकि सरकार को संदेह है कि वे कर चुकाने में धोखाधड़ी करते हैं, जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी बात हुई. किसी भी सरकार को अपने नागरिकों से इस तरह अपमानजनक लहजे में बोलने का हक नहीं है, सबसे भ्रष्ट सरकार को तो कतई नहीं.

टैक्स की वसूली प्रेरित करके संपन्न की जाने वाली प्रक्रिया होती है. यदि लोग टैक्स नहीं दे रहे हैं तो इसके दो अर्थ हो सकते हैं. या तो कर प्रणाली गलत है या फिर लोगों को भरोसा नहीं है कि आप उनका पैसा बुद्धिमानी से इस्तेमाल कर रहे हैं. दोनों मामलों में गलती सरकार की ही है. करदाताओं को धमकाने से कुछ हासिल नहीं होगा. जरूरत से ज्यादा टैक्स (भारत में वेतनभोगी अमेरिका व चीन में ज्यादा कमाने वालों से भी अधिक टैक्स देते हैं) देना वैसे ही भारी पड़ता है. ऊपर से जब मालूम पड़ता है कि आपकी गाढ़ी कमाई ऐसी सत्ता के पास जा रही है जो भ्रष्ट तथा अपव्ययी है तो स्थिति और भी खराब हो जाती है. किंतु जो चीज लोगों को सबसे ज्यादा गुस्सा दिलाती है वह यह कि दर्जनों घोटालों में फंसी वही भ्रष्ट और अपव्ययी सरकार धमकाने लगती है, और अधिक कर की मांग करने लगती है. पिछली तारीख से टैक्स वसूली तो अपमानजनक व्यवहार की हद है.

अब आमूलचूल बदलाव लाने का वक्त है. दशकों से हर वित्तमंत्री आंकड़ों से ही खेलता रहा है. किसी में वह दूरदृष्टि नहीं थी कि वह नीतियों को ही पूरी तरह बदल दें. उन्हें नया रूप दे. नतीजा यह हुआ कि केवल करों का आतंकवाद बढ़ता रहा. व्यर्थ के खर्चों में पैसे की बर्बादी कम नहीं हुई. करदाताओं के दृष्टिकोण को कभी ध्यान में नहीं लिया गया. हम यह भूल जाते हैं कि टैक्स कानून कितने अच्छे हैं यह जानने का एक सरल सा, हर परिस्थिति में लागू होने वाला टेस्ट है. यदि लोग ईमानदारी से अपना कर चुकाते हैं तो साफ है कि कानून न्यायपूर्ण और निष्पक्ष है. यदि वे कर नहीं चुकाते तो इसका मतलब है कि आप उनसे वाजिब से ज्यादा वसूली कर रहे हैं. सरकार उन्हें डरा-धमकाकर झुका नहीं सकती. कर कोई जबरन वसूली का जरिया नहीं है. कर इसलिए चुकाए जाते हैं, क्योंकि इससे राष्ट्र निर्माण होता है, न कि भ्रष्ट राजनेताओं की जेबें भरने के लिए और न काहिल नौकरशाही को सत्ता में बनाए रखने के लिए.

जरा सोचें, सुधार कितने आसान हो सकते हैं. क्यों न 20 फीसदी की एक समान दर से केवल उन्हीं से टैक्स लिया जाए जो 10 लाख रुपए साल या इससे ज्यादा कमाते हैं. फिर चाहे वे वेतनभोगी हों, खुद का व्यवसाय करते हों या फिलहाल कोई कर नहीं देने वाले करोड़पति किसान ही क्यों न हों. सारे स्टैंडर्ड डिडक्शन, सरचार्ज और शुल्क खत्म कर दीजिए. इस तरह से करदाताओं की संख्या 3.6 करोड़ से घटकर 50 लाख हो जाएगी पर बड़ी संख्या में ऐसे करोड़पति इसमें शामिल हो जाएंगे, जिन्होंने कभी टैक्स दिया ही नहीं है. टैक्स वसूली भी आसान और ज्यादा न्यायसंगत हो जाएगी.

सुपररिच यानी सालाना 50 लाख रुपए या इससे अधिक कमाने वाले 10 फीसदी अतिरिक्त कर चुका सकते हैं. टीडीएस जैसे यंत्रणादायक तरीकों को खत्म कर दीजिए (एक अक्षम, आलसी सरकार की ओर से कर वसूल करना यह मेरा या आपका काम नहीं है.) इसी प्रकार मैट को भी खत्म कीजिए. घाटे में जा रही कंपनी को कर क्यों चुकाना चाहिए? इसकी बजाय मुनाफे में चल रही सारी कंपनियों से 25 फीसदी की समान दर से कर लीजिए. यदि वे ज्यादा पैसा कमाती हैं तो उनका विस्तार होगा. वे ज्यादा नौकरियां देंगी और वैश्विक स्तर पर अधिक स्पर्धा करने की स्थिति में होंगी.

सरकार के साथ समस्या यह है कि वह लगातार ज्यादा धन जुटाने की कोशिश में लगी रहती है जबकि वह हमें यकीन ही नहीं दिला पाती कि जो पैसा इसे पहले से ही मिल रहा है उसे उचित रूप (और ईमानदारी) से खर्च किया जा रहा है. भारत में (जैसे अन्य देशों में भी) ज्यादातर करदाता ईमानदार, कानून का पालन करने वाले वेतनभोगी लोग हैं, जिन्हें करों से राहत की जरूरत है. वे मंदी में फंसी अर्थव्यवस्था, लगातार बढ़ती महंगाई और गर्दन पर सवार संदेह से भरी सरकार को हमेशा सहन नहीं कर सकते.

मोदी यह सब बदल सकते हैं. वे भरोसा बहाल करने से शुरुआत कर सकते हैं. और हां वे खुद सरकार में ज्यादा जवाबदेही ला सकते हैं. यदि निजी कंपनियों में काम करने वालों को उनके काम के आधार पर आकलन कर पुरस्कृत और दंडित किया जा सकता है तो यही नियम सरकारी अधिकारियों पर क्यों नहीं लगाया जा सकता. क्यों नहीं अच्छे अधिकारियों को सही फैसले लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता बजाय इसके कि वे फाइलें इधर से उधर भेजते रहें और यथास्थिति को कायम रखने में लगे रहें. क्यों नहीं काहिल व भ्रष्ट अफसरों को बर्खास्त किया जाता. बजट वास्तविक बदलाव की शुरुआत करने के लिए अच्छा मौका हो सकता है. बजाय इसके कि उन्हीं पुराने आंकड़ों के साथ खेला जाए, हेराफेरी की जाए. उन्हीं पुरानी, सड़ी-गली नीतियों की जुगाली की जाए, जो अपनी प्रासंगिकता काफी पहले ही खो चुकी हैं.

19.06.2014, 22.19 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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