पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >रघु ठाकुर Print | Share This  

संसद का बदलता चेहरा

विचार

 

संसद का बदलता चेहरा

रघु ठाकुर


भारत की 16 वी संसद अब अस्तित्व में आ चुकी है. इस संसद में बड़ी संख्या में ऐंसे भी लोग पहुँचे हैं जो वस्तुतः संसद में पहली बार पहुँचे हैं. यहॉं तक की भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भी पहली बार संसद के सदस्य बने हैं. आजकल अनेकों संस्थायें संसद के सदस्यों का विभिन्न आधारों पर विश्लेषण करती हैं और इसलिये संसद के बदलते स्वरूप को समझना आवश्यक है.

संसद


16वीं संसद में भाजपा को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ है जो सामान्य अनुमानों के और यहॉं तक कि स्वतः भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के अनुमान से ज्यादा है. परन्तु भाजपा को देश के कुल मतदाताओं का मुश्किल से 31 प्रतिशत वोट मिला है. 31 प्रतिशत वोट पाकर भाजपा को 283 सीटें मिली हैं जबकि 19.3 प्रतिशत वोट पाकर कांग्रेस पार्टी को 44 सीटें मिली है. दरअसल हमारी चुनाव प्रणाली में 25 प्रतिशत के उपर जाने वाले की सीटों की संख्या में तेजी से वृद्धि होती है.

पिछले दिनों दिल्ली के चुनाव में एन. डी. ए. को लगभग 33 प्रतिशत वोट मिले थे और अकाली दल को मिलाकर ही 33 प्रतिशत थे जबकि लगभग 25 प्रतिशत वोट पाने के बाद भी कांग्रेस पार्टी को मात्र 8 सीटें प्राप्त हो पाई थी. इसमे दो राय नही है कि हमारी वर्तमान निर्वाचन पद्धति को और बेहतर बनाने के लिये कदम उठाये जाने चाहिये परन्तु यह भी प्रश्न है कि यह कदम कौन उठायेगा ? वैसें तो दो प्रकार के सुधार ज्यादा लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व वाले हो सकते हैं:-

01. विजयी होने वाले प्रत्याशी को 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं का समर्थन हासिल हो. या फिर

02. दलों के मत प्रतिशत के आधार पर उन्हे संसद में हिस्सेदारी मिले. इस दूसरे सुझाव में दलीय तानाशाही की संभावनायें प्रबल होती है. हालांकि हमारे देश में लगभग दलीय तानाशाही की स्थिति अभी भी मौजूद है परन्तु इसके बाद यह संभावना और बढ़ सकती है. इस प्रकार के चुनाव सुधार कानून में या आवश्यकता अनुसार संविधान में संशोधन करके हो सकते हैं और कोई भी सत्ताधारी दल कम से कम पहले 50 प्रतिशत मत पाने वाले सिद्धांत को पसंद नही करेगा.

इस 16वीं संसद में लगभग 30 वर्ष के बाद एक अकेली पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ है. संसद संदस्यों मंे लगभग 82 प्रतिशत लोग उनके द्वारा ही दिये गये शपथ पत्र के अनुसार करोड़पति है याने मात्र 18 प्रतिशत प्रत्याशी याने बमुश्किल 92 - 93 संसद सदस्य ही करोड़ से नीचे वाले हैं और इनमे भी सर्वाधिक संख्या आदिवासी और दलित वर्ग के सांसदों की है. वर्ष 2004 में भारत की संसद में केवल 10 प्रतिशत सांसद करोड़पति थे. अनेकों सांसदों की संपत्ति में भारी उछाल आया है. कई सांसदों की संपत्ति तो 5 वर्षों में 100 गुना से लेकर 300 गुना तक बढ़ी है. मोदी के मंत्रिपरिषद् के सदस्यों की औसत संपत्ति 13.47 करेाड़ है जबकि कुछेक मंत्री 100 करोड़ से उपर वाले हैं.

संसद सदस्यों के साथ - साथ संसद के प्रत्याशियों में करोड़पति प्रत्याशियों की संख्या बढ़ रही है. इस 2014 के चुनाव में कुल 8163 प्रत्याशी खड़े हुये थे जिनमे से 2208 याने लगभग 26 - 27 प्रतिशत प्रत्याशी करोड़पति थे और संसद के कुल सदस्यों में जीते प्रत्याशियों में करोड़पति सांसदों की संख्या 82 प्रतिशत हुई है. याने कुल संसद के लगभग 425 संसद सदस्य. अब जीतने और हारने वाले लोगों में अधिकांश करोड़पति ही पहुंच रहे हैं और यह एक गंभीर तथा खतरनाक संकेत भी है.


चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव के खर्च की सीमा बढ़ाकर 70 लाख कर दी है. कौन सा गरीब, ईमानदार प्रत्याशी अपनी जेब से 70 लाख खर्च कर सकता है जबकि यह 70 लाख की सीमा तो हाथी के दिखाने के दॉंत है. अधिकांश प्रत्याशियों का खर्च अगर वास्तविक रूप से जाना जाये तो 7 करोड़ से 17 करोड़ तक होगा. अनेकों तथाकथित संसदीय बड़े दलों ने अपने प्रत्याशियों को औसतन 2 से 3 करोड़ रुपया दलीय सहयोग के रूप में दिया है.

हम भले ही अपने राष्ट्रीय चिन्ह में ’’सत्यमेव जयते’’ लिखते हो परन्तु आज अगर भारतीय राजनीति का कोई वास्तविक ’’लोगो’’ बनाया जाना हो तो उस पर ’’असत्यमेव जयते’’ लिखना होगा. मतदाताओं की सोच और मतदान के तरीके में भी बदलाव आया है. पहले याने 50-60 के दशक में कोई अति संपन्न व्यक्ति जनता का सीधा चुनाव न जीत सकता था और न लड़ने की हिम्मत कर सकता था. यहॉं तक कि राजस्थान में बड़े बड़े उद्योगपति चुनाव हार गये.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

d.k.prajapati [prajapatidk05@gmail.com] chhindwara - 2014-06-30 02:19:07

 
  आकलन सही है।इस तरफ गोर आवश्यक है। रघु भाई का सटीक आकलन है। 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in