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खलनायकों का आकर्षण बढ़ा

समाज

 

खलनायकों का आकर्षण बढ़ा

प्रीतीश नंदी


पिछले सप्ताहांत में मैंने एक फिल्म देखी. हमेशा की उबाऊ, बड़े बजट की वह फिल्म नहीं, जिसे लेकर हर कोई धमाकेदार शुरुआत का दावा कर देता है. यह छोटी, दिलचस्पी पैदा करने वाली फिल्म थी, जिसे काफी शिद्दत के साथ प्रमोट किया गया है. यह मूवी विलेन के बारे में है. मांस-पेशियों वाले हट्टे-कट्टे हीरो को लेकर हमारे जुनून से थोड़ी हटकर. फिल्म का खुला दावा है कि इसके प्रमुख पात्र विलेन हैं.

gabbar singh


इसे देखने की मेरी रुचि इसलिए भी जागी, क्योंकि समीक्षकों ने इस फिल्म को एक कोरियाई फिल्म की नकल बताते हुए बड़ी खुशी के साथ इसकी धज्जियां उड़ा दी थीं. मुझे कोरियाई फिल्में पसंद हैं (मैंने खुद एक कोरियाई फिल्म से आइडिया लिया था). इसलिए मेरे लिए तो इस फिल्म में अतिरिक्त आकर्षण था.

'एक विलेन' की जोरदार शुरुआत हुई और सप्ताहांत में इसने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की. ट्रेड पंडितों का दावा है कि पहले तीन दिनों में ही इस फिल्म ने 50 करोड़ रुपए कमा लिए. यदि आप इस बात को ध्यान में रखें कि फिल्म में कोई हीरो नहीं है तो इसे एक उपलब्धि ही मानना चाहिए. इसमें दो प्रमुख पात्र हैं. एक उदास-सा नजर आने वाला अंडरवल्र्ड का हिटमैन और दूसरा मध्य वर्ग का शांत दिखाई देने वाला सीरियल किलर. फिल्म शुरू ही इससे होती है कि सीरियल किलर, हिटमैन की पत्नी की हत्या कर देता है, वह भी बिना किसी स्पष्ट कारण के. ऐसा लगता है कि अपराधी ने सिर्फ अपनी खुशी के लिए यह कृत्य किया.

जैसे-जैसे कहानी खुलती गई मैं अपने आस-पास बैठे लोगों को देखने लगा. किसी को भी इस जघन्य हत्या से धक्का नहीं लगा. फिर चाहे बिना किसी कारण के की गई हत्या का यह दृश्य अचानक ही उनके सामने क्यों न आ गया हो. यह दृश्य बिना तरतीब के सामने आ गया. किलर भी सड़कों पर घूमने वाला बेतरतीब सा शख्स था. खास तरह का सफेदपोश काम करने वाला मध्यवर्गीय शख्स. घर पर पत्नी हमेशा तंग करती रहती है और दफ्तर में बॉस, जो संयोग से महिला ही है, धमकाती रहती है.

मगर हमारा यह विलेन अपने परिवार को गहराई से चाहता है और बड़ी शिद्दत से उनसे अच्छी खबर सुनना चाहता है. परिवार के लिए दिन का हर क्षण जीता है. सिर्फ कभी-कभार वह परिवार से कुछ घंटों के लिए अलग होकर अपनी एकमात्र खुशी हासिल करने में लग जाता है. यह खुशी है अज्ञात महिलाओं का क्रूरतापूर्वक खून! यही वह कहानी है, जिसने दर्शकों को पिछले हफ्ते सिनेमाघरों पर भीड़ लगाने पर मजबूर किया और इसके युवा डायरेक्टर मोहित सूरी को नया सितारा बना दिया. मजे की बात है कि फिल्म को रोमांटिक थ्रिलर बताकर प्रचारित किया गया है और इसे बहुत ही अच्छे रोमांटिक संगीत से सजाया गया है. इसके तीन गीत पांच सर्वश्रेष्ठ हिट गीतों में शुमार हैं.

यहीं पर मैं अपने असली सवाल पर आता हूं: खलनायकी से हमारा रोमांस कब शुरू हुआ था? सच कहें तो दशकों पहले. 'शोले' में गब्बर सिंह असली स्टार था और हम बहुत कम मौकों पर यह स्वीकार करते हैं पर 'मधुमति' जैसी कुछ सबसे बड़ी हिट फिल्मों में खलनायक ने नायक को पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिया है. वास्तविकता तो यह है कि खलनायक व खलनायिका (वैम्प) बरसों से हमारे पसंदीदा चरित्र रहे हैं. बुराई ने जिस तरह चुपचाप अपना दायरा फैलाकर दर्शकों की तालियां बटोरी हैं उस पर मैं हमेशा चकित होता रहा हूं. फिर चाहे अंत में हट्टा-कट्टा हीरो ही विजयी होता है. (राज)नैतिक रूप से सही होने की प्रतीकात्मक स्वीकृति.

हमारी फिल्में ही नहीं हमारे महान महाकाव्यों ने भी खलनायकों को काफी ऊंचा उठाया है. और चाहे मेरे दोस्त, कवि एके रामानुजन का मौलिक निबंध 'थ्री हंड्रेड रामायनाज' को सरकारी आदेश से दिल्ली यूनिवर्सिटी की पाठ्यपुस्तकों से हटा दिया गया है पर रावण के लाखों प्रशंसक आज भी चारों ओर मौजूद हैं. कवि माइकल मधुसूदन दत्त ने पुत्र मेघनाद के मारे जाने पर राक्षसों के राजा रावण द्वारा शोक व्यक्त करने पर बहुत अच्छा महाकाव्य लिखा है (मैंने कई बरस पहले इसका अनुवाद किया था.) यह बंगाली भाषा के सर्वश्रेष्ठ महाकाव्यों में से है. सच तो यह है कि बुराई की रहस्यमयता हमें आकर्षित करती है. हमें ऐसे चरित्रों में मौजूद द्वंद्व पसंद आता है. हमें इसमें करिश्मा नजर आता है.

इस फिल्म में हम रितेश देशमुख द्वारा अभिनीत मध्यवर्ग के सीरियल किलर के पात्र से खुद को जोड़कर देखते हैं. आज वही हमारा हीरो है. एक बार आप यह तथ्य स्वीकार कर लें, एक बार आपको यह अहसास हो जाए कि हमने बुराई को हमारी जिंदगी का वास्तविक व अभिन्न अंग स्वीकार कर लिया है तो सबकुछ स्पष्ट हो जाता है. हमारी राजनीति, वे राजनीतिक चुनाव जो हम करते हैं. किसी भी कीमत पर सफलता की पूजा करने की हमारी प्रवृत्ति. ठगों, बदमाशों, हत्यारों व दलालों से हमारा लव-हेट (लगाव व नफरत) का संबंध. जिन लोगों को हम सत्ता में चुनकर भेजते हैं.

वे रोल मॉडल जिन्हें हम जीवन में उतारना चाहते हैं. सुर्खियां बटोरने वाले. कई-कई दिनों तक हमारे टीवी स्क्रीन पर छाए रहने वाले आतंकियों से लेकर गैंगस्टर, दुष्कर्मी, ठग, जबरन वसूली करने वाले लोग. ये हमारी रोज की खबरों से उसी प्रकार अंदर-बाहर होते रहते हैं, जैसे हम भीड़ भरी ट्रेनों व बसों में बढ़ते अपराधों पर गुस्सा जताते हुए चढ़ते-उतरते रहते हैं. मुझे आशंका है कि हम उन्हीं को चाहने लगे हैं, जिनसे हम सबसे ज्यादा नफरत करते हैं. खलनायकी अब जीवन में डिफॉल्ट मोड़ में आ गई है.

मुझे बताइए, हमारी जिंदगी पर शासन करने के लिए हम जिस प्रकार के लोग चुनते हैं उसका और कौन-सा कारण हो सकता है? हम सिर्फ वोट देकर उन्हें सत्ता में ही नहीं पहुंचाते, हम उन्हें महत्व देकर बड़ा भी बनाते हैं. हम विशाल पुष्पहारों से उनका स्वागत करते हैं और उनकी चमत्कारी उपलब्धियों पर शब्द बाहुल्य की नदियां बहा देते हैं, जबकि हम अच्छी तरह जानते हैं कि वे कौन हैं और कहां से आए हैं.

विचारक, संगीतकार, दार्शनिक, लेखक, कलाकार, अध्यापक, कवि और चिकित्सक जैसे हमारे परंपरागत हीरो हाशिये पर चले गए हैं. केवल कामयाबी, किसी भी कीमत पर कामयाबी ही हमें परिभाषित करती है, जैसे बुराई के साथ हमारा चिरस्थायी रोमांस. कोई आश्चर्य नहीं कि हाल में चुने गए हर तीसरे सांसद का आपराधिक रिकॉर्ड है और 70 फीसदी मतदाताओं को इसकी कोई परवाह नहीं है.

02.07.2014, 14.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित