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सबको पसंद है बढ़ती कीमतें

विचार

 

सबको पसंद है बढ़ती कीमतें

प्रीतीश नंदी

 

महंगाई

जब मैं बच्चा था तो प्राय: मुझे कहा जाता था कि जरा दौड़कर जाओ और बाजार से कुछ ताजी सब्जियां और फल ले आओ. मैं यह बताकर आपको बोर नहीं करूंगा कि मुझे क्या-क्या लाने के लिए कितने-कितने पैसे दिए जाते थे और न मैं यह बताऊंगा कि उन दिनों किस चीज का क्या भाव था. इतना ही बताना काफी है कि मेरे पिता की तनख्वाह 92 रुपए महीना थी और इससे पांच सदस्यों के हमारे परिवार का काम महीनेभर आराम से चल जाता था. मेरी मां का वेतन पिताजी से पांच रुपए ज्यादा था, जिसके कारण हमारी पढ़ाई-लिखाई व जीवन-स्तर ऐसा था कि हमें धनी परिवारों के बच्चों के सामने लज्जित होने की कोई वजह नहीं थी.

यह बात सही थी कि उन दिनों हम बहुत किफायत से जिंदगी बिताते थे, लेकिन यह वह जमाना था जिसमें किफायतशारी कोई ऐसी बात नहीं थी कि जिस पर हम बच्चों को कोई शर्मिंदगी महसूस हो. यह तो हमारे लिए गर्व की बात थी और प्राय: हम उन बच्चों का मजाक उड़ाते थे, जो महंगी कारों में बैठकर स्कूल आते या कीमती ड्रेस पहनते थे. हालांकि, यह बात भी है कि कोलकाता हमेशा से ऐसा ही रहा है. चाहे आप शहर के सबसे अच्छे स्कूलों में से किसी में पढ़ते हों, जैसे कि मैं पढ़ता था क्योंकि मेरी मां वहां पढ़ाती थीं और मुझे वहां फीस में छूट भी मिलती थी.

आज मुंबई में मैं देखता हूं कि लोग बहुत ज्यादा कमा रहे हैं और इसके बावजूद फल और सब्जियां खरीदना उनके लिए कठिन होता जा रहा है. खलनायक को पहचानना कठिन नहीं है, जिसे खत्म करना असंभव-सा है. वह खलनायक है महंगाई. बेशक, महंगाई (आतंकवाद की तरह) बहुत डरावनी है, क्योंकि इसका इस्तेमाल लोग उन सारी चीजों का स्पष्टीकरण देने में करते हैं, जिन पर कोई विचार-विमर्श नहीं करना चाहता. यदि किसी पखवाड़े कीमतें नहीं बढ़तीं तो हम अपनी जन्म-कुंडली के सितारों का अहसान मानते हैं. इसकी वजह यह है कि अब तक तो हम सब को यह यकीन हो गया है कि महंगाई बढ़ती अर्थव्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम है. वास्तविकता तो यह है कि आपको कई ऐसे लोग भी मिल जाएंगे, जो दलील देंगे कि यह तो सामान्य व नियमित प्रक्रिया है और अर्थव्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत है.

इसलिए अब हम यह मानकर ही चलते हैं कि कीमतें तो बढ़ेंगी ही और यही वजह है कि शिकायत करने की बजाय हमने अपनी बचत पर बैकों से ऊंचे ब्याज (इन दिनों 7 फीसदी तो सामान्य बात है) की मांग करनी शुरू कर दी है. साथ में अधिक वेतनवृद्धि (हम अपेक्षा करने लगे हैं कि यह 8 से 10 फीसदी तक हो), तेजी से प्रमोशन ( या फिर हम नौकरी बदल लेते हैं) और गाहे-बगाहे छोटी-मोटी टैक्स राहत, जो कंजूस सरकारें आमतौर पर चुनाव के पहले देती रहती हैं.

हम भूल जाते हैं कि दुनिया में अन्य जगहों पर मौसम, जलवायु और फसल कैसी रही इसके आधार पर कीमतें बढ़ती-घटती हैं. हमारे यहां कीमतें कभी गिरती तो हैं ही नहीं. ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि वे स्थिर रहती हैं यानी बढ़ती नहीं हैं, लेकिन वे ज्यादा, बहुत ज्यादा बढ़ती हैं. यदि बारिश नहीं हुई तो कीमतें बढ़ती हैं. ज्यादा बारिश हो जाए तो कीमतें बढ़ती हैं. सूखे में बढ़ती हैं और बाढ़ आ जाए तो बढ़ती हैं. फसलें अच्छी हों और मार्केट भरा हो तो भी बढ़ती हैं और बाजार में चीजों की कमी हो तब तो कीमतें बढ़ना लाजमी है. कई बार तो कीमतें बढ़ने का कोई कारण ही नजर नहीं आता. फिर हमें गुस्सा आता है और हम यह गुस्सा जाहिर करते हैं. हालांकि, जल्द ही हम इससे उबर जाते हैं और अपना गुस्सा जताने के लिए अन्य मुद्‌दों की ओर बढ़ जाते हैं.

हर कोई जानता है कि खाद्य पदार्थों की कीमतें क्यों बढ़ती हैं, लेकिन किसी को भी यह भरोसा नहीं है कि वे इस बारे में कुछ कर सकते हैं. महंगाई और बढ़ती कीमतों को लेकर लोगों के मन में एक प्रकार से असहाय होने की भावना होती है. कभी-कभार आमतौर पर चुनाव के पहले बढ़ती कीमतें मुद्‌दा बनती हैं, लेकिन एक बार चुनाव का तमाशा खत्म हुआ कि स्थिति फिर सामान्य हो जाती है. इसकी वजह यह है कि हर किसी को महंगाई अच्छी लगती है, क्योंकि ऐसी किसी चीज को खरीद सकना, जो अन्य लोगों की खरीद क्षमता से बाहर हो, भारत में एक नया स्टेटस सिंबल यानी हैसियत का प्रतीक बन गया है!

एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए. अगली बार जब आप शहर में प्रवेश करें या इसे छोड़कर बाहर जाएं, हाईवे पर रुककर अपनी पैदावार बेच रहे किसी किसान से कुछ खरीदी करें. आप जो भुगतान करेंगे वह उसकी तुलना में पांच गुना कम होगा, जो आप अपने घर के नजदीक के स्टोर में करते हैं. किसान सस्ता बेचता है, बहुत सस्ता. कई बार तो फसल के पूरा तैयार होने के पहले ही बेच देता है. हम बाजार से महंगा खरीदते हैं, बहुत महंगा. दोनों के बीच में कीमतों में छह से आठ गुना वृद्धि हो जाती है. यह चमत्कार होता कैसे है? हम इसे क्यों नहीं रोक सकते? हम इसे नहीं रोक सकते, क्योंकि इसमें खाद्य पदार्थों की राजनीति है. बीच में बहुत सारे बिचौलिए हैं, जो प्राय: किसान का वेश बना लेते हैं. वे किसानों को कम भुगतान करते हैं, सस्ते में खरीदी करते हैं. फिर वे शहर में कुछ संगठनों के जरिये हमें बेचते हैं. इस दौरान वे जो मुनाफा कमाते हैं उसके आगे तो कोई दवाई कंपनी भी शरमा जाए.

मजे की बात तो यह है कि ये सारे लोग कोई टैक्स नहीं चुकाते, क्योंकि वे सारे किसान होने का दावा करते हैं. वे हर मौका भुनाते हैं. सूखा हो या बाढ़. जरूरत से ज्यादा आपूर्ति हो या खाद्य पदार्थों की कमी. फसल अच्छी हो या खराब, वे अपना मुनाफा बढ़ाने में लगे होते हैं. वे जमाखोरी और वायदा सौदे करते हैं. वे इतने धनी और इतने समृद्ध हैं कि किसी की हिम्मत नहीं कि कोई उन्हें छू भी ले. राजनीतिक दल उनके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, क्योंकि स्थानीय चुनाव में पैसा यही लोग देते हैं. यह जमात ही सत्ता की नई दलाल है. कोई भी सरकार यदि इन लोगों को करों के दायरे में ले आए तो उसे फिर टैक्स बढ़ाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी. इसके साथ काली अर्थव्यवस्था की उसकी चिंता भी खत्म हो जाएगी, क्योंकि काले धन का बड़ा हिस्सा तो यही पड़ा है. यही लोग गांवों में बड़ी-बड़ी जमीनें खरीद रहे हैं और बड़ा मुनाफा कमाकर बेच रहे हैं. किसानों को भीख मांगने पर मजबूर कर रहे हैं.

अब समय आ गया है कि उन 2 फीसदी भारतीयों से आगे भी देखा जाए, जो बरसों से ईमानदारी से टैक्स का भुगतान कर रहे हैं. अब बड़े रोकड़े पर शिकंजा कसना चाहिए, जो ठीक हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के केंद्र में मौजूद है. यदि हम यह कर सकें तो वह नापाक गठबंधन टूट जाएगा, जो इस दुश्चक्र को चलाता है. सरकार की तिजोरी में ज्यादा टैक्स आएगा और खाद्यान्न को लेकर राजनीति भी कम हो जाएगी. किसानों को भी उपज की बेहतर कीमतें मिलेंगी. किसानों की आत्महत्या दर घटेगी. और हां इससे हम-आप उस कोफ्त से बचेंगे, जो हर बार फलों और सब्जियों का भुगतान करते हुए हमें होती है.

01.08.2014, 11.29 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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