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भारत: समुदायों का संघ

विचार

 

भारत: समुदायों का संघ

इरफान इंजीनियर

 

मुस्लिम

गत 25 जून को महाराष्ट्र की मंत्रिपरिषद ने मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का निर्णय लिया. मराठा, राज्य की आबादी के लगभग 32 प्रतिशत हैं और यह आरक्षण, कुनबी मराठाओं को ओबीसी की हैसियत से पहले से ही मिल रहे आरक्षण के अतिरिक्त होगा. मंत्रिमंडल ने यह निर्णय भी लिया कि 50 पिछड़ी मुस्लिम जातियों को भी 5 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा. मुसलमान, राज्य की आबादी का 10.6 प्रतिशत हैं और यह आरक्षण ओबीसी की सूची में शामिल मुस्लिम जातियों को मिल रहे आरक्षण के अतिरिक्त होगा.

इवर्तमान में जुलाहा, मोमिन, अंसारी, रंगरेज, तेली, नक्कासी, मुस्लिम काकर, पिंजारी और फकीर जातियों के मुसलमानों को ओबीसी की हैसियत से आरक्षण मिल रहा है. इस नए 21 प्रतिशत आरक्षण के साथ, राज्य में शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रतिशत बढ़कर 73 हो गया है.

बंबई उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर, मराठाओं को दिए गए 16 प्रतिशत आरक्षण को कई आधारों पर चुनौती दी गई है, जिनमें से प्रमुख यह है कि मराठा, शैक्षणिक या सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नहीं हैं. महाराष्ट्र के 17 मुख्यमंत्रियों में से 10 मराठा थे. वर्तमान में राज्य विधानसभा के 288 सदस्यों में से 152 मराठा हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में मराठा, राजनैतिक व सामाजिक दृष्टि से प्रभुत्वशाली हैं. वे बड़ी संख्या में सहकारी शक्कर मिलों, सहकारी बैंकों और व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों का संचालन कर रहे हैं. यहां तक कि यह मराठी राज्य, मराठा राज्य बन गया है.

संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार, राज्य, नागरिकों के उन पिछड़े वर्गों के सदस्यों को नियुक्तियों या पदों में आरक्षण दे सकता है, जिन्हें सरकारी सेवाओं में उपयुक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है.

यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या मराठा और 50 मुस्लिम जातियां, सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं? मंत्रिमंडल ने मराठा समुदाय के बारे में निर्णय, नारायण राणे समिति की रपट के आधार पर लिया जबकि मुस्लिम समुदायों को आरक्षण देने का आधार बनी डाक्टर एम. रहमान की अध्यक्षता में नियुक्त अध्ययनदल की रपट. दरअसल, मराठाओं में इतनी उपजातियां हैं कि उन्हें एक समुदाय कहना ही गलत है. मराठा समुदाय के दो मुख्य हिस्से हैं-किसान उपजातियां व योद्धा उपजातियां. पहले, कुनबी कहलाते हैं और दूसरे शायनावकुली. योद्धा उपजातियों का प्रभुत्व अधिक है. दोनों अपनी अलग पहचान कायम रखे हुए हैं और उनके आपस में वैवाहिक संबंध नहीं होते. अतः उपजातियों के इन दोनों समूहों को एक समुदाय मानकर, उसे पिछड़ेपन की कसौटी पर कसना ही गलत है.

यह दिलचस्प है कि अध्ययन दल ने जिन 50 मुस्लिम जातियों को पिछड़ा बताया या माना है, उनके नाम न तो अध्ययन दल ने सार्वजनिक किए और ना ही सरकार ने. ये वे समुदाय हैं जिन्हें नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 5 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध होगा. जहां मराठा समुदाय के सभी सदस्यों को आरक्षण का लाभ मिलेगा वहीं 50 पिछड़ी मुस्लिम जातियों के उन सदस्यों को यह लाभ नहीं मिलेगा, जो कि क्रीमिलेयर में आते हैं.

राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने मीडिया के साथ बातचीत में कहा कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं बल्कि पिछड़ेपन को बनाया गया है. मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट नहीं किया कि पिछड़ेपन को नापने के लिए किन मानकों का इस्तेमाल किया गया है. जहां तक अध्ययन समूह का सवाल है, उसकी रपट सन् 2001 की जनगणना, सन् 2006 की सच्चर समिति रपट और सन् 2009 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज के प्रोफेसर अब्दुल शब्बन द्वारा किए गए एक अध्ययन के आंकड़ों का संकलन मात्र है.

तीनों रपटों में न तो पिछड़े मुस्लिम समुदायों के नाम बताए गए हैं और ना ही उनका अलग से अध्ययन किया गया है. उदाहरणार्थ, इनमें से किसी रपट में नक्षबंदी, बेग, मीर, हकीम, मुल्ला, हैदरी, नूरी, उस्मानी इत्यादि समूहों के शैक्षणिक स्तर, साक्षरता, जीवनयापन का जरिया, रोजगार, सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व, आमदनी का स्तर, लैंगिक अनुपात, बैंक ऋण व स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आदि के संबंध में अलग से कोई आंकड़े नहीं दिए गए हैं. सारे आंकड़े सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय के हैं. जो चित्र इन रपटों से उभरता है वह निष्चय ही निराशाजनक है. बच्चे स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं कर रहे हैं और इसका कारण गरीबी व बाल मजदूरी है. यद्यपि मुसलमानों की साक्षरता दर 78.1 है तथापि उनमें से केवल 2.2 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं. मुस्लिम महिलाओं में ग्रेजुएशन करने वालों का प्रतिशत मात्र 1.4 है.

शहरों और गांवों में रहने वाले मुसलमानों में से लगभग 60 प्रतिशत गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं. मुसलमानों की कार्य सहभागिता दर (आबादी का वह हिस्सा जो या तो कोई काम कर रहा है अथवा ढूंढ रहा है) केवल 32.4 प्रतिशत है और महिलाओं के मामले तो यह 12.7 प्रतिशत मात्र है. महाराष्ट्र काडर में कोई आईएएस अधिकारी मुसलमान नहीं है और पुलिस बल में केवल 4.4 प्रतिशत मुसलमान हैं. इस परिस्थिति में यह समझना मुष्किल है कि मंत्रिमंडल इस निर्णय पर कैसे पहुंचा कि पूरे मुस्लिम समुदाय नहीं वरन् केवल 50 मुस्लिम जातियों को आरक्षण की जरूरत है.

आरक्षण की राजनीति
आरक्षण के जरिए, राज्य, शनैः शनैः समाज में व्याप्त गैर-बराबरी को दूर करने के अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा करता है. आरक्षण के जरिए यह सुनिष्चित किया जाता है कि समाज के उस वर्ग के नागरिकों, जिन्हें ऐतिहासिक कारणों से आगे बढ़ने के उपयुक्त व पर्याप्त अवसर नहीं मिले, को ऐसे अवसर उपलब्ध कराए जाएं ताकि जो क्षति उन्हें हुई है उसकी पूर्ति हो सके. परंतु महाराष्ट्र सरकार के आरक्षण संबंधी हालिया फैसले का इस संवैधानिक दायित्व की पूर्ति से कोई लेना-देना नहीं है.
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