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खिलाफत से कौन डरता है?

समाज

 

खिलाफत से कौन डरता है?

प्रीतीश नंदी


थामस फ्रिडमैन को पिछले हफ्ते दिए इंटरव्यू में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने घोषणा की कि अमेरिका आईएसआईएस उग्रवादियों को ‘खिलाफत’ का निर्माण नहीं करने देगा. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि इसे रोकने के लिए उनसे जो कुछ संभव होगा, वे करेंगे.

आईएसआईएस खिलाफत


आश्चर्य नहीं कि अमेरिका ने इराक पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं. इस बार आईएसआईएस उग्रवादियों के खिलाफ, जिन्होंने उत्तरी इराक में यजीदी नामक अल्पसंख्यकों के छोटे से समुदाय को घेर रखा है. पारसी व सूफी जड़ों वाले यजीदी समुदाय को सिंजर से खदेड़ा गया है, जहां वे बसे हुए थे. कई लोगों की नृशंस हत्या कर दी गई है, यहां तक कि कइयों को जिंदा गाड़ दिया गया. उनकी महिलाओं व लड़कियों को बेचने के लिए गुलाम बना लिया गया है. अब जो बच गए हैं, वे पहाड़ी इलाके में भोजन व पानी के बिना जेहादियों से घिरे, फंसे पड़े हैं.

इस प्रकार इस बार जरूर अमेरिकी हवाई हमले वह करते नजर आ रहे हैं, जिसका ओबामा ने दावा किया है. दावा है धार्मिक अल्पसंख्यकों के ऐसे समूह को बचाने का, जो अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है. हालांकि, ओबामा दलील देते हैं कि इन हमलों का वृहद उद्‌देश्य तो ‘विशाल खिलाफत’ का निर्माण रोकना है, जिसमें इराक व सीरिया ही नहीं, लेबनान, जॉर्डन, कुर्दिस्तान, इजरायल और मिस्र तक शामिल होंगे. इसका सपना आईएसआईएस के रहस्यमय सरगना उग्र कट्‌टरपंथी सुन्नी अबु बक्र अल बगदादी ने देखा है.

हाल ही के दिनों में हतप्रभ कर देने वाले विविध अत्याधुनिक हथियारों से लैस आईएसआईएस की बढ़त के साथ आई उसके आतंकियों की क्रूरता की कहानियों और बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई बातों को छोड़कर उनके सपने पर ध्यान दें तो पाएंगे कि विशाल खिलाफत के सपने में डरने जैसा कुछ नहीं है. यह हमारे यहां के राम राज्य के विचार जैसा लगता है. वह विचार, जो हमारे यहां के सबसे नादान व आसानी से बहकाए जा सकने वाले तबके के लिए गढ़ा गया है.

क्या आपको वाकई लगता है कि किसी को राम राज्य चाहिए? ऐसा है तो आप मजाक कर रहे हैं, क्योंकि हम तो चीन जैसा होने और अपने यहां अगली सिलीकॉन वैली बनाने के सपने देख रहे हैं. हम क्यों खड़खड़ाती टाइम मशीन के जरिये इतिहास में जाकर वहां अपना भविष्य खोजेंगे? यह सच है कि हममें से कुछ राम राज्य के विचार का उपयोग ऐसे धूर्ततापूर्ण प्रतीक बनाने में करेंगे ताकि उन लोगों की कल्पनाशीलता को भड़काया जा सके, जिनमें यह क्षमता जरा कम है. हालांकि, जरा दिल थामकर सोचिए, मुझे संदेह है कि हममें से कितने लोगों (और यहां तो मैं भाजपा के कट्‌टर समर्थकों को भी शामिल कर रहा हूं) को भविष्य के भारत के निर्माण की बजाय राम राज्य के निर्माण की कल्पना आकर्षित करेगी. यहां तक कि नेहरूवादी नीतियों के दोहराव की कोई संभावना न रखने वाले नरेंद्र मोदी भी मंदिर और हवनों को नहीं, हाईवे और कारखानों के निर्माण को प्राथमिकता दे रहे हैं.

ऐसे में हम कट्‌टरपंथी सुन्नियों और उनके झंडाबरदारों को महान इस्लामी खिलाफत का सपना देखने की इजाजत क्यों नहीं दे सकते? यह भी सिर्फ कल्पना की उपज है, एक और कल्पना लोक. हम सब जानते हैं कि राजनेता और धार्मिक नेता अपने अनुयायियों को कल्पना लोक के निरर्थक ख्वाब बेचते हैं. सातवीं सदी के रशीदुन से लेकर ओटोमान साम्राज्य तक कई खिलाफत हुए हैं. ओटोमान खिलाफत को तो 1924 में तुर्की गणराज्य के राष्ट्रपति कमाल अतातुर्क ने खत्म करके लोकतंत्र को अपनाया था. अन्य खिलाफत भी इसी प्रकार इतिहास के कूड़ेदान में चले गए, लेकिन यह भव्य सपना कायम है, जो अब वास्तविक लक्ष्य की जगह एक छलावा अधिक है. यहां तक कि ओसामा बिन लादेन ने भी खिलाफत का सपना देखा था. यह अल कायदा की सबसे बड़ी फैंटेसी में से एक था.

हमारे साथ समस्या यह है कि हम अब भी अपनी भिन्नताओं, हमारी गरीबी, हमारी असमानता, हमारी असहायता का समाधान ऐसी प्रतिगामी फैंटेसियों में खोजते हैं, जिनका आधार धार्मिकता में होता है. चाहे यह खिलाफत हो या राम राज्य या यूटोपिया ही क्यों न हो, जिसके लिए हेनरी अष्टम ने सर थामस मोर का सिर कलम कर दिया था, (चार सौ साल बाद पोप पायस ग्यारहवें ने उन्हें संत की उपाधि से विभूषित किया.) सपना वही है. प्लेटो ने ‘द रिपब्लिक’ के बारे में बहुत सारी बातें कहीं हैं. अमिश और हटराइट जैसे समुदाय अब भी हैं, जो अपने आस-पास की दुनिया को दरकिनार कर ऐसी ही कल्पनाओं में रुचि लेते हैं.

सौभाग्य से इतिहास के हर दौर में खिलाफत की तरह यूटोपिया भी आंतरिक विरोधाभासों व विसंगतियों और उनका नेतृत्व करने की हसरत रखने वालों की उछालें मारती महत्वाकांक्षाओं के कारण खत्म हो गए. आधुनिकता ने भी ऐसे ख्यालों को चोट पहुंचाई है. नई पीढ़ी को यह अहसास हो गया है कि खोखले सपनों से मानव जाति की समस्याएं नहीं सुलझने वाली. ये समस्याएं वास्तविक कदमों से ही सुलझेंगी बशर्तें हम उन्हें मौका दें.

मुद्‌दा यह है कि सामूहिक हत्याकांड रोकना अच्छी बात है और मुझे खुशी है कि ओबामा इसके लिए आगे आए हैं. उम्मीद है इस बार उनके पास अनुभव की काफी पूंजी है. फिर भी मैं सुझाव दूंगा कि वे महान इस्लामी खिलाफत के अस्तित्व में आने के भय को नजरअंदाज कर दें. यह तो सिर्फ फैंटेसी है और फैंटेसियों को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए. जब लोग उनसे ऊब जाते हैं और वास्तविकता की ओर लौट आते हैं तो ये अपनी मौत खुद ही मर जाते हैं. ऐसी बातों पर हमला करके आप उन्हें बढ़ावा ही देते हैं.

मैं याद दिलाना चाहूंगा कि पराधीन भारत में एक आंदोलन हुआ था, जो इसी प्रकार के महान इस्लामी खिलाफत की कल्पना से शुरू हुआ था. हालांकि, महायुद्ध और हमारे स्वतंत्रता संघर्ष ने अंतत: उसे हाशिये पर डाल दिया. गांधीजी तो केंद्रीय खिलाफत समिति के सदस्य भी थे और अली बंधु और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता इसके अंग थे. इसमें अच्छी बात यह रही कि इसने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में हिंदू-मुस्लिमों को एक कर दिया. जब इसका लक्ष्य हासिल हो गया तो यह आंदोलन अपनी मौत मर गया.

इस पूरी कथा का सबक यह है कि इस प्रकार के धार्मिक आइडिया यानी विचार चाहे जितने भयानक नजर आते हों, वे सिर्फ खोखली कल्पना ही होते हैं. वास्तविक संघर्ष की प्रचंड शक्ति के आगे वे नहीं ठहर पाते. और आज यह संघर्ष गरीबी, अन्याय, असमानता और बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ है. ओबामा को यह सब मालूम होना चाहिए और हमें भी.

13.08.2014, 14.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Naresh [] Shridham - 2014-08-14 15:48:34

 
  अहिंसात्मक तरीके से स्वपन देखने और उन्हें पूरा करने के प्रयासों को समझा जा सकता है किंतु जब हिंसा से अपने स्वप्नों का विस्तार और दूसरों के जीवन का विनाश होने लगे तो क्या करना चाहिए. केवल विश्लेषण या कोई प्रतिकार भी. 
   
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