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Ram puniyani | झूठ झूठ झूठ यानी बन गई सहमति
बहस

 

झूठ झूठ झूठ यानी बन गई सहमति

राम पुनियानी

 

 

नोम चोमस्की असाधारण मेधा के धनी भाषाविद् होने के साथ-साथ मानवाधिकारों के लिए सबसे आगे की पंक्ति में खड़े होकर लड़ने वालों में से हैं. वे बताते हैं कि किस तरह अमरीकी सरकार अपनी हमलावर कार्यवाहियों के लिए आम जनों की सहमति का ''उत्पादन'' करती है. कम्यूनिज्म का हौआ खड़ा कर, वियतनाम को रौंदा जाता है तो महासंहारक अस्त्रों (डब्ल्यूएमडी) का डर दिखाकर ईराक में सेना उतार दी जाती है.


जब तक प्रश्न उठने शुरू होते हैं, तब तक यह प्रचार लोगों के दिलो-दिमाग में घर कर चुका होता है और वे प्रश्न पूछने वालों और संदेह व्यक्त करने वालों की सुनने को तैयार ही नहीं होते.


सहमति का ''उत्पादन'' कई तरीकों से किया जाता है, जिनमें प्रमुख है मीडिया का अत्यंत चालाकी से इस्तेमाल.

आज यदि यह साबित कर भी दिया जाए कि ईराक में डब्ल्यूएमडी नहीं थे, तो क्या? तेल के कुओं पर कब्जे का काम तो पूरा हो गया है.


लंबे समय तक उनको अनसुना करने के बाद जब तक जनता सच को सामने लाने वालों की बात सुनना शुरू करती है तब तक सरकार का उद्देश्य पूरा हो चुका होता है. आज यदि यह साबित कर भी दिया जाए कि ईराक में डब्ल्यूएमडी नहीं थे, तो क्या? तेल के कुओं पर कब्जे का काम तो पूरा हो गया है. 9/11 के हमले में कौन शामिल था, कौन नहीं इस पर आप अंतहीन बहस करते रहिए परंतु अफगानिस्तान तो अमरीका की जेब में आ ही चुका है.


सहमति के ''उत्पादन'' का यही काम राजनैतिक दल और समूह भी करते हैं, यद्यपि जाहिर तौर पर किसी देश की तुलना में छोटे स्तर पर. इस काम में राज्य के तंत्र, मीडिया और मुंह-जबानी प्रचार का सहारा लिया जाता है. भारत के मामले में अल्पसंख्यकों की खलनायक की छवि बनाने का काम हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लक्ष्य को लेकर चलने वाले राजनैतिक समूह ने निरंतर प्रचार के जरिए सफलतापूर्वक कर लिया है.


''सभी मुसलमान आतंकवादी हैं'' यह मान्यता इतने गहरे तक आम जनों के मनो-मस्तिष्क में बैठ चुकी है कि अनेक तथ्यपरक जांच रपटों और समर्पित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के कहने के बाद भी ये मान्यता जस की तस बनी हुई है. इस मान्यता ने इतने गहरे तक अपनी जड़ें जमा ली हैं कि पुलिस, प्रशासनिक तंत्र और जांच एजेन्सियां तक इस मान्यता को आधार बनाकर अपना काम करते हैं.


बाटला हाउस ''मुठभेड़'' को ही लें. पुलिस की कहानी में अनगिनत छेद हैं जिनकी तरफ मानवाधिकार संगठनों ने जनता और सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया है. उनकी मांग बहुत साधारण और तार्किक है- मुठभेड़ की गहराई से जांच कराई जाए. इस मांग को इस आधार पर अस्वीकार किया जा रहा है कि इससे पुलिस का मनोबल गिरेगा!


वैसे भी, जो लोग ''मुठभेड़'' पर प्रश्न उठा रहे हैं, उनकी आवाज जनता तक पहुंच ही नहीं पा रही है. मीडिया यह सुनिश्चित कर रहा है कि आम जनों तक केवल पुलिस की कहानी पहुंचे और आम जन उसे ही सच मानें. आतंकवादी हमलों के मामलों में- चाहे वे मस्जिदों के अहातों में ही क्यों न हों; हमेशा मुसलमानों को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है. जांच एजेन्सियों को पहले से पता रहता है कि उन्हें क्या करना है, किसे पकड़ना है और किस संगठन के सिर दोष मढना है.


पुलिस के कथनों को संदेह की दृष्टि से देखना, पत्रकारिता के स्थापित मानदंडों का भाग है. दुर्भाग्य की बात है कि हमारा मीडिया न केवल पुलिस की कहानियों पर आंख मूंदकर विश्वास करता है बल्कि अपनी तरफ से उनमें मिर्च-मसाला भी लगा देता है.


''इस्लामिक आतंकवाद'' शब्द का सबसे पहले उपयोग पश्चिमी मीडिया ने डब्ल्यू. टी. सी. टावर पर हमले के बाद शुरू किया था. अब तो इसका उपयोग दुनिया भर का मीडिया बेखटके करता है.


दिलचस्प बात यह है कि जब लिट्टे की धानु ने राजीव गांधी की जान ली थी तब किसी ने उसे ''हिन्दू आतंकवाद'' की संज्ञा नहीं दी थी. और न ही खालिस्तानियों द्वारा श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या को किसी ने ''सिक्ख आतंकवाद'' बताया था. आईआरए के आतंकवाद को कोई ''ईसाई आतंकवाद'' नहीं कहता.


चोमस्की ''सोचने लायक विचार'' और ''न सोचने लायक विचार'' के बीच भी विभेद करते हैं. विचारों का यह वर्गीकरण अंधाधुंध और अनवरत प्रचार का अंतिम नतीजा होता है. आज स्थिति यह है कि ''सभी मुसलमान आतंकवादी हैं'' एक ''सोचने लायक विचार'' है. इसके विपरीत, ''कोई और भी आतंकवादी हो सकता है'' यह ''न सोचने लायक विचार'' बन गया है. बजरंग दल के आतंकवाद से जुड़ाव संबंधी घटनाओं को या तो दबा दिया जाता है और या फिर भुला दिया जाता है. नांदेड़ और कानपुर में बम बनाने के दौरान बजरंग दल के कार्यकर्ताओं की मौत किसी को याद नहीं है. ''हिन्दू जागरण समिति'' के आतंकवाद की ओर से आंखें मूंद ली जाती हैं.


इसी तरह, ''ईसाई मिशनरियां धोखाधड़ी, लालच और दबाव से धर्म परिवर्तन करवाती हैं'', ''सोचने लायक विचार'' है. यह तो इतना पक्का विचार है कि उसके आधार पर ईसाईयों को मार डालना या उन्हें अपंग बना देना भी पूरी तरह औचित्यपूर्ण है. सच इसके विपरीत है परंतु मीडिया उसे सामने ही नहीं लाता.


मीडिया का एक हिस्सा यह दावा करता है कि वह निष्पक्ष है. परंतु सच यह है कि जहां ईसाईयों के खिलाफ हिंसा की खबरें अंदर के पेजों में डबल कालम में सिमटी रहती हैं वहीं ''इस्लामिक आतंकवादियों'' की हरकतें मुखपृष्ठ पर बैनर हैडलाइन बनाती हैं. टी. वी. चैनल ''जेहादी आतंकियों'' के बारे में इतना चिल्ला-चिल्लाकर बोलते हैं कि उड़ीसा में नन के साथ सामूहिक बलात्कार की खबर सुनाई ही नहीं पड़ती.


भारत में अब यह स्थिति बन गई है कि साप्रंदायिक ताकतों के सत्ता से बाहर रहने पर भी अल्पसंख्यकों की छवि खलनायकों जैसी बनाने का काम चलता रहता है. इस काम में संघ की शाखाओं में प्रशिक्षित लाखों लोग, जिनमें से कुछ मीडिया में हैं, कुछ न्यायपालिका में, कुछ पुलिस में; अनवरत लगे रहते हैं. मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की सेवा में लगा है- उन सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की, जो प्रजातंत्र का गला घोंट कर, अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहते हैं.


गुजरात के कत्लेआम का नेतृत्व करने वाले मोदी आज मीडिया के लिए ''हीरो'' और ''देश का भविष्य'' हैं. उड़ीसा की हिंसा में विहिप और बजरंग दल का हाथ होने के पुख्ता सुबूत होने के बावजूद ये संगठन सरकार को चुनौती दे रहे हैं कि उसमें हिम्मत हो तो वो उनपर प्रतिबंध लगाकर दिखाए. कारण यह कि सिमी पर प्रतिबंध तो ''सोचने लायक'' और ''अमल में लाने लायक'' विचार है वहीं बजरंग दल को गैर कानूनी घोषित करना ''न सोचने लायक'' विचार है.


चोमस्की ने अमरीका के संदर्भ में ''सहमति के उत्पादन'' का अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया है. भारतीय संदर्भ में अल्पसंख्यकों के विरूध्द सहमति का उत्पादन, भारत की सांझा संस्कृति को नष्ट करने वाला और हमारे स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों के विरुध्द है.

 

29.10.2008, 10.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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gulzar hussain (gulzar.mahanagar@yahoo.co.in) mumbai

 
 आतंकवाद को धर्म से जोड़े जाने के पीछे एक बड़ा राजनीतिक षडयंत्र नजर आता है. जबकि कोई भी उसकी बुनियादी वजहों को समझते हुए उसे दूर करने की कोशिश नहीं करता. दूसरी तरफ सभी धर्मों में कट्टरता का बोलबाला बढ़ता ही जा रहा है.
दरअसल राजनीतिक दल लोगों को धार्मिक रुप से कट्टर ही बनाए रखना चाहती हैं ताकि उनका वोट बैंक सुरक्षित रहे. आप देखिए कि कोई भी पार्टी भगत सिंह की नास्तिकता और समाजवाद की बात नहीं कहती बल्कि अंध धार्मिकता का ही गुडी-गुडी पाठ पढ़ाया जाता है.
आज की नई पीढ़ी को मार्क्स के इस विचार पर चलना होगा कि धर्म अफीम है. धर्म और जाति की दीवारों को जबतक नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक सांप्रदायिकता और आतंकवाद जैसी समस्या मुंह बाए खड़ी रहेगी.
 
   

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