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सीसैट यानी अंग्रेजी राजतंत्र का उदय

विचार

 

सीसैट यानी अंग्रेजी राजतंत्र का उदय

रघु ठाकुर


केन्द्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा पद्धति और उसमें वर्ष 2009 से शामिल किये गये सी - सेट को हटाने की मांग को लेकर दिल्ली के छात्र जो दिल्ली में कई वर्षों से रहकर आयोग की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, अब आंदोलन करने को लाचार हैं. ये छात्र अधिकांशतः देश के सभी प्रदेशों से आये हैं और इनमें से ज्यादातर मध्यमवर्गीय परिवारों से हैं. परन्तु देश की सभी प्रान्तीय भाषाओं और बोलियों के हैं.

सी सैट


वर्ष 2004 में केन्द्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा प्रणाली में अंग्रेजी की अनिवार्यता और विशेष दर्जे को कुछ कम किया गया था तथा हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के समकक्ष लाया गया था. याने आजादी के बाद से केन्द्रीय नौकरशाही के चयन में जो अंग्रेजी का विशेष स्थान था जिसके चलते भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के चयन में महानगरीय छात्रों की संख्या ज्यादा होती थी क्योंकि उनकी शिक्षा और संस्कार अंग्रेजी के होते थे और इसीलिये 2004 के बाद जब हिन्दी और भारतीय भाषाओं को प्रोफेसर डॉ. एस. कोठारी आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर अंग्रेजी के समकक्ष लाया गया तो परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों के सामाजिक, आर्थिक आधार में बड़े बदलाव आये.

भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में अंग्रेजी माध्यम वाले 51 प्रतिशत पर थम गये और शेष स्थानों पर हिन्दी और शेष भारतीय भाषाओं वाले छात्र चुने जाने लगे. इतना ही नही इन चुने जाने वाले छात्रों में गॉंव के किसानों के बेटे, छोटे दुकानदार और वर्ग 3 और 4 के कर्मचारियों के बेटे भी आयोग की परीक्षा में अच्छे ढंग से पास हुये और चयनित हुये क्योंकि उन्हे अपनी भाषा में परीक्षा देने या साक्षात्कार देने का अवसर प्राप्त हुआ. यह स्वाभाविक भी है क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपनी भाषा में जितनी बेहतर अभिव्यक्ति कर सकता है, उतना वह दूसरी भाषा का या विदेशी भाषा का ज्ञान होने के बाद भी उस भाषा में नही कर सकता.

केन्द्रीय नौकरशाही के इस वर्ग परिवर्तन से देश के शासकों और नौकरशाहों में अपने वर्गीय हितों को लेकर चिन्ता व्याप्त हो गई. उनका यह सपना कि बड़ा नौकरशाह बनना उनका और उनके बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है, खण्डित होने लगा. आजादी के बाद से भारतीय नौकरशाही का अखण्ड सामन्तवाद टूटने का भय पैदा हो गया. देश के उन शासकों को जिनका शिक्षापीठ और आदर्श केम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड है, उन्हे भी अपने वर्गीय सत्ता के खिसकने की चिन्ता हो गई. देश का श्रेष्ठी वर्ग इस बदलते नौकरशाही के चरित्र से चिंतित हो गया और सन 2004 से सन 2008 के चार वर्षों में जिस तेजी से देश के ग्रामीण अंचलों, कस्बों के किसानों व गॉंव के छोटे परिवारों के बच्चे आयोग की परीक्षाओं में चुनकर पहुॅंचे, उससे उनके मनों में भय व्याप्त हो गया.

समाजवादी नेता स्व. डॉं. राममनोहर लोहिया ने तो अंग्रेजी के साम्राज्यवाद और नौकरशाही सामंतवाद के इस षडयंत्र को 50 के दशक में ही पहचान लिया था और इसीलिये डॉ. लोहिया ने ’’ अंग्रेजी हटाओं, भारतीय भाषायें लाओं ’’ आंदोलन शुरू किया था. महात्मा गॉधी ने इस अंग्रेजी भाषा के सामंतवाद के खतरे और रूपांतरणों को समझते ही आजादी के बाद के अपने पहले साक्षात्कार में कहा था कि ’’दुनिया को बता दो कि गॉंधी अंग्रेजी भूल गया ’’ परन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि देश के तत्कालीन सत्ताधीशों ने गॉंधी के इस संदेश को समझ कर भी उसकी उपेक्षा कर दी. डॉं. लोहिया की बात की उपेक्षा की. अगर 1947 के बाद ही तत्कालीन केन्द्र सरकार ने गॉंधी और लोहिया की बात को माना होता तो भारत की नौकरशाही का चरित्र अंग्रेजी सामंतशाही का चरित्र न होता बल्कि ब्रिटिशकालीन नौकरशाही का भारतीयकरण या देशीकरण होता.

यह सी - सेट शासन और नौकरशाही के संयुक्त षड़यंत्र की संतान है. सन 2008 में 11279 छात्र मुख्य परीक्षा में बैठे थे जिनमें से अंग्रेजी माध्यम के 5817 और हिन्दी, कन्नड़, तेलगू व और अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यमों के क्रमशः 5082 - 14 - 17 - 98 छात्र चुने गये थे . याने अंग्रेजी माध्यम के चयनित छात्रों की संख्या 51.6 प्रतिशत तथा हिन्दी माध्यम वालों की संख्या 45.1 प्रतिशत थी व अन्य भारतीय भाषाओं के छात्रों की संख्या 3.3 प्रतिशत थी. सी - सेट के लागू होने के बाद वर्ष 2009 के बाद हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम वाले छात्रों की संख्या में तेजी से घटोत्री शुरू हुई. वर्ष 2009 में अंग्रेजी माध्यम वाले 54.5 प्रतिशत, सन 2010 में 62.2 प्रतिशत, सन 2011 में 82.2 प्रतिशत हो गये तथा हिन्दी वाले घटकर 16.2 प्रतिशत और अन्य भारतीय भाषाओं वाले घटकर मात्र 2 प्रतिशत रह गये.

अगर इसी प्रकार सी - सेट लागू रहा तो वह दिन दूर नही है कि एक दो सालों में अंग्रेजी माध्यम वालों की संख्या बढ़कर शत् प्रतिशत तक पहुंच जायेगी याने भारत की नौकरशाही से हिन्दी और भारतीय भाषाओं को सही अर्थों में भारत से बेदखल कर दिया जायेगा. अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी की सत्ता फिर से महारानी बन जायेगी और अंग्रेजी ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया का स्थान ले लेगी.

नौकरशाही और शासन के इस वर्गचरित्र परिवर्तन के पीछे वैश्विक आर्थिक शक्तियों का भी षड़यंत्र है क्योंकि विश्व व्यापार संगठन की भाषा अंग्रेजी बना दी गई है और वैश्वीकरण की नीतियों को लागू करने के लिये अंग्रेजी मानस ज्यादा उर्वरक होता है, इसीलिये वैश्वीकरण के साम्राज्यवाद की शक्तियों के दबाब में तत्कालीन शासकों ने यह सी - सेट लागू किया है.
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