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टोल टैक्स नाके यानी टॉर्चर नाके

विचार

 

टोल टैक्स नाके यानी टॉर्चर नाके

रघु ठाकुर


केन्द्रीय परिवहन मंत्री श्री नितिन गड़करी ने संसद में टोल टैक्स के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण घोषणायें की हैं:-

1. उन्होने कहा कि निर्माण की लागत खर्च की पूर्ति होते ही टोल टैक्स वसूली बंद की जायेगी.
2. सरकार अग्रिम टोल टैक्स भुगतान की योजना के बारे में भी विचार कर रही है ताकि टोल टैक्स नाकों पर लंबी - लंबी लाईनें न लगें.

टोल नाके


निस्संदेह उनकी यह दोनो घोषणायें पुरानी व्यवस्था से कुछ आगे जाने वाली है और जनता के टोल टैक्स दर्द पर हल्की सी मरहम लगाने वाली है. परन्तु क्या यह वास्तव में, भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार के अनुकूल है ? क्या ये घोषणायें गॉंव व शहर के बीच के विभेद को दूर करने वाली है ? और क्या इनसे कोई बड़ा बदलाव हासिल हो सकेगा? इन दृष्टिकोणों से विचार करना होगा.

दरअसल टोल टैक्स नाकों का निर्माण और टोल टैक्स की कल्पना कहने को सरकार के पी.पी.पी. मॉडल की संतान है जिसे सार्वजनिक व निजी भागीदारी की कल्पना कहा जाता है और इस योजना के नाम पर सरकारों ने सड़क निर्माण के काम को निजी हाथों में देने का षड़यंत्र रचा था. आजादी के बाद से यह आम धारणा रही है कि सस्ता यातायात उपलब्ध कराना, आम जनता को सड़क बनाकर देना सरकार का दायित्व है परन्तु वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के दौर में सरकार ने बड़ी चतुराई के साथ मीठे शब्द जाल बांध कर सड़क निर्माण के काम को निजी क्षेत्र को सौंप दिया. अब सरकारें सड़क निर्माण के लिये टेण्डर मंगाती है जिन्हे बड़े - बड़े ठेकेदार भरते हैं, फिर सरकार परदर्शिता के साथ अपने सहयोगी या सहभागी ठेकेदारों को इस चतुराई व कौशल के साथ दिला देती है कि आरोप लगाना तो दूर उनकी मिलीभगत की भनक न लग पाये.

इस योजना के तहत सरकार ने यह तय किया है कि 75-75 कि.मी. से कम के खण्ड की सड़कें बनाने के टेण्डर निकाले जायेंगे और यह इसलिये होता है क्योंकि ठेकेदार ऐंसा ही चाहते हैं. इसका दूरगामी असर यह होता है कि सड़क निर्माण के बाद जब संबंधित ठेकेदार टोल टैक्स के लिये नाके शुरू करता है तो एक ही सड़क पर कई टोल टैक्स के नाके लग जाते हैं. उदाहरण के लिये अगर भोपाल से इंदौर जाना हो तो फिलहाल 3 कुछ समय बाद 4 टोल टैक्स के नाके लग जायेंगे. एक - एक कार, जीप गाड़ी वाले को औसतन 150-200 रूप्या टोल टैक्स में देना होता है. याने लगभग 1 रूप्या प्रति कि.मी. की टोल टैक्स की दर हो जाती है. अगर रेल में यात्रा करना हो तो सामान्य श्रेणी मे 30-40 पैसा प्रति कि.मी., स्लीपर क्लास 70-80 पैसा प्रति कि.मी. कुल किराया लगता है. जबकि टोल टैक्स 1 रूप्या प्रति कि.मी. के आसपास हो जाता है. बसों और ट्रकों को जो टोल टैक्स लगता है वह तो आने जाने पर हजारोें रूप्ये हो जाता है और अंततः उसे आम आदमी को या तो यात्री बस किराये के रूप में या माल भाड़े वृद्धि के रूप में देना होता है.

महानगरों में बड़े पैमाने पर सड़कें व फ्लाई ओवर बनाये जा रहे हैं जिन पर हजारों करोड़ रूप्या खर्च हो रहा है परन्तु वहॉं कोई टोल टैक्स नही लगता. देश की राजधानी दिल्ली में पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में फ्लाई ओवर बने हैं परन्तु उनके लिये कोई टोल टैक्स नही है क्योंकि उन्हे सरकार ने जवाहर लाल नेहरू शहरी विकास मिशन के नाम पर बनाये हैं.

इसको तो जरूर सरकार को धन्यवाद देना चाहिये कि उन्होने इस योजना का नाम जवाहर लाल जी के नाम से ठीक रखा है क्योंकि जवाहर लाल देश के विकास का मतलब महात्मा गॉंधी की राय के विपरीत शहरों का विकास मानते थे और यही कल्पना उनकी योजना में भी थी. हालांकि उन्होने भी अपने कार्यकाल में गॉंवों को विकास की कसौटी भले ही न माना हो परन्तु इतनी तो कृपा की ही थी कि गॉंव कस्बों की सड़कों का निर्माण सरकारी पैसों से होता था, पी.पी.पी. से नही होता था. और सड़क के बदले में वसूली के लिये टोल टैक्स नाके नही थे. वैंसे भी एक कल्याणकारी राज्य में सड़कों का निर्माण और रखरखाव सरकार का दायित्व होता है. यह बुनियादी जरूरत है. सड़क कोई उद्योग नही है और इसलिये अच्छा होता कि श्री गड़करी जी नई शुरूआत करते तथा सड़क निर्माण देशी विदेशी ठेकेदारों की पूंजी से कराकर जनता की जेब पर डाका डालने की इस दस्यू नीति को बदलकर कलयाणकारी नीति को लाते.


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