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स्कूलों में बढ़ी रैगिंग समस्या

विचार

 

स्कूलों में बढ़ी रैगिंग समस्या

रघु ठाकुर


इस समय देश में रैगिंग की समस्या निरंतर वृद्धि पर है और मीडिया की चर्चा में भी है. पिछले कुछ दिनो से शायद ही कोई दिन बाकी गया हो जब म.प्र. या देश के अन्य राज्यों में कोई न कोई रैगिंग के नाम से गम्भीर घटना मीडिया में न आई हो . म.प्र. में तो अचानक पिछले एक सप्ताह से लगभग हर दिन रैगिंग की घटनाओं की चर्चा है और यह स्वाभाविक भी है. जिस प्रकार से गम्भीर और घातक घटनायें घट रही है, वे न केवल समूचे शिक्षा जगत के लिये बल्कि समूचे समाज के लिये चिंताजनक है.

रैगिंग


ग्वालियर के सिंधिया स्कूल, जो एक प्रतिष्ठित स्कूल माना जाता है, में बिहार के एक मंत्री के बेटे ने रैगिंग से तंग होकर फॉंसी लगाकर आत्महत्या का प्रयास किया. भोपाल के ओरियंटल कालेज तथा अन्य कई कालेजों में गम्भीर घटनायें हुई. यहॉं तक कि एक जगह तो वरिष्ठ छात्रों ने कनिष्ठ छात्रों के कमरे में रात में जाकर छापामारी की, उन्हे सिगरेट पीने को बाध्य किया, उनसे पैसे मांगे और ब्लेड से कई जगह काट दिया.

इंदौर के एक कोचिंग सेंटर में एक पत्रकार मित्र के परिवार के बच्चे को रैगिंग के नाम पर इतना परेशान किया गया कि उसने अपने परिजनों को खबर की और कहा कि हमे वापिस ले जाओ तथा उसके परिवार वाले उसे वापिस ले गये. जिस प्रकार अभी तक दहेज प्रताड़ना और मौतों के समाचार, समाचार पत्रों में आते थे उसी प्रकार अब रैगिंग के समाचार आ रहे हैं.

रैगिंग का चलन मूलतः ब्रिटिश शिक्षा परम्परा का चलन है और यूरोप में वहॉं के वरिष्ठ छात्र नये भर्ती होने वाले छात्रों से जिन्हे फ्रेशर कहा जाता है, उन्हे कुछ डरा धमका कर, कुछ प्रताड़ित कर उनसे परिचय करते थे. एक प्रकार से यह परिचय की परम्परा तो थी परन्तु इसमें वरिष्ठ छात्रों का सम्मान स्वप्रेरणा या प्रेम से नही बल्कि दंड और भय के आधार पर था. दरअसल रैगिंग, एक सामंती समाज की विकृत और भय उत्पादक प्रक्रिया की संतान है जिसकी ब्रिटिश काल के पहले भारत में कोई कल्पना भी नही कर सकता था. सम्मान को हासिल करने के लिये प्रेम, मदद और त्याग की भारतीय परम्परा है तथा बल और दंड के आधार पर सम्मान छीनना यूरोप और पश्चिम की परम्परा है.

दरअसल रैगिंग एक सेडिस्ट मनोवैज्ञानिक क्रिया का रूप है जिसमें एक व्यक्ति जो अतीत में पीड़ा पाता है, वह अपने से कमजोर किसी दूसरे की पीड़ा पहुंचा कर न केवल आनंदित होता है बल्कि अपने अतीत की भोगी हुई पीड़ा का शमन करता है यह परपीड़क मनोवृत्ति हमारे देश की मध्ययुगीन सास, बहू की परम्परा की याद दिलाती है. जब कोई नई बहू घर में आती है तो कई घरों की सासें उसे प्रताड़ित कर आनंद लेती है और कहती है कि यह तो कुछ भी नही है हमारी सास ने इससे ज्यादा प्रताड़ित किया था. पर पीड़ा की यह परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है. हालांकि यह कोई राष्ट्रीय सार्वभौमिक सत्य नही है बल्कि ऐसें प्रकरणों को अपवाद ही माना जाना चाहिये. ऐंसे भी बहुत से परिवार है जहॉं सास अपनी बहू को बेटी के समान ही मानती है और सास को भी नव दुल्हन अपनी दूसरी मॉं मानती है.

रैगिंग को लेकर जब भी कोई समाचार आते है, आम अभिभावकों और लोगों के मन में दर्द होता है परन्तु एक सामान्य स्वीकृत हल लोगों की जुबान पर आता है कि इसे रोकने के लिये और कड़े कानून बनाना चाहिये. अपराध को रोकने के लिये चर्चा के समय कड़े कानून की गोली देश में आम दवा मानी जाती है. बलात्कार हो तो कड़े कानून, चोरी हो तो कड़े कानून. यहॉं तक कि तमिलनाडू के जज साहब ने आसंदी पर बैठकर यह टिप्पणी की कि इस्लामिक देशो में शरीयत के अनुसार चोरों के हाथ काट दिये जाते हैं वैसा ही भारत में किया जाना चाहिये. हो सकता है कि जज साहब ने यह टिप्पणी अति उत्साह में की हो या मीडिया में प्रचार पाने को की हो परन्तु ऐंसी टिप्पणियॉं जब बौद्धिक जगत की होती है तो सामान्य लोगों से और क्या अपेक्षा हो सकती है.

रैगिंग को लेकर भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कई कदम उठाये है. सी.बी.आई. के डायरेक्टर श्री राघवन की कमेटी बनी जिसने अपनी सिफारिशें दी और सर्वोच्च न्यायालय के नीति निर्देश के आधार पर सरकार ने एंटी रैगिंग एक्ट पारित किया जिसमे निम्न कदमो के प्रावधान है:-

1. भारत सरकार और राज्य सरकारें एंटी रैगिंग सेल का गठन करे जिसमे आन लाईन शिकायत की व्यवस्था हो.
2. संस्था के प्रंबंधन का दायित्व तय किया गया कि वह रैगिंग को रोकने की कार्यवाही करे व रैगिंग की सूचना पर कठोर कार्यवाही करें.
3. रैगिंग करने वाले छात्रों को निष्काषित करने के प्रावधान बनाये गये. अगर कोई संस्था रैगिंग को रोकने के लिये उपयुक्त कदम नही उठाती और दोषी पायी जाती है तो उस संस्था की मान्यता समाप्त की जा सकती है. अनुदान रोका जा सकता है और प्रबंधन के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है.

इतने स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों के बावजूद रैगिंग की बीमारी बढ़ रही है और यहॉं तक कि अब वह सरकारी या गैर सरकारी शिक्षण संस्थानों से बढ़कर अंशकालीन कोचिंग क्लासेस या संस्थान तक पहुंच गई है. इस बीमारी का विस्तार उत्तर में कुछ ज्यादा हुआ है तथा भारत की राजधानी दिल्ली के दिल्ली विश्व विद्यालय से संबद्ध कुछ कालेजों में रैगिंग की घटनायें सामने आयी हैं.

म. प्र. जैंसे प्रदेशों में तो अब सामान्य विश्व विद्यालय या कालेजों से ज्यादा रैगिंग की घटनायें तकनीकी शिक्षा संस्थानों और चिकित्सा शिक्षा संस्थानों में होने लगी है और बढ़ी है. हालांकि यह महत्वपूर्ण पक्ष है कि महाराष्ट, तमिलनाडू, कर्नाटक, केरल याने दक्षिण की शिक्षा संस्थानों में रैगिंग की चर्चा सुनने को नही मिलती है. कोटा, जो कोचिंग का एक बहुत बड़ा केन्द्र बन चुका है, ऐंसी कोई घटना सुनने को नही मिली. अतः मुझे रैगिंग की घटनाओं के निम्न कारण नजर आते हैं:-

1. शिक्षण संस्थानों में शिक्षा का अभाव, जिससे छात्रों के पास अपना समय बरबाद करने की स्थिति बनती है और जो पुरानी कहावत है कि खाली दिमाग शैतान का, वह उनके साथ भी होता है. जहॉं विद्यार्थी के पास पढ़ाई के अलावा अतिरिक्त समय नही होता वहॉं ऐंसी घटनायें संभव नही हैं.
2. अगर शिक्षक और छात्रों के बीच में जीवंत रिश्ता हो, छात्र अपने सुख दुख की चर्चा शिक्षक से बतौर अभिभावक और मित्र कर सकते हों तो भी रैगिंग संभव नही है क्योंकि छात्र अपने शिक्षक को खुलकर मन की बात बता सकता है.
3. रैगिंग की घटनायें छात्रावास में ज्यादा होती है क्योंकि शिक्षण संस्था के 6- 7 घंटे को छोड़ दे तो बकाया समय छात्र ही साथ रहते है और ऐंसी स्थिति में वरिष्ठ छात्र ऐंसी घटनाओ को अंजाम देने का समय और सुविधा पा लेते है.
4. प्रबंधन अगर सावधान हो और शिक्षण संस्था के शुरू होने के समय कुछ परिचय सम्मेलन कक्षा सह भोज, अभिभावक, छात्र और शिक्षक मिलन या कुल सम्मेलन जैसे आयोजन करे तो भी रैगिंग जैसी घटनाओं पर रोक लग सकती है.
5. अगर सरकारें भी घटना की सूचना मिलने पर खानापूर्ति के बजाय या राजनैतिक दबाव प्रभाव से हटकर नियमानुसार कार्यवाही करे तो भी रैगिंग जैसी घटनाओं पर रोक लग सकती है.
6. परिवार अगर अपनी सामाजिक भूमिका को सही अर्थों में अदा करे, अपने बच्चों को ठीक संस्कार दे, उनकी गल्तियों पर पर्दा डालने के बजाय उन्हे स्वतः दंडित कराने की पहल करे, यह मानकर की पीड़ित भी उन्हे के बेटे के समान है, उनके साथ खड़े हो तो भी वातावरण बदल सकता है.

परन्तु पिछले दिनों हुई घटनाओं में यह नजर आया कि शासन और प्रशासन ने अपने दायित्व को पूरा नही किया. अब चाहे वह राजनैतिक दबाव में हो या फिर वर्गीय चेतना के कारण हो पर यही हुआ. एक बड़ा कारण यह भी है कि अब जो बड़ी - बड़ी शिक्षा की दुकानें खुल रही है, इनमे राजनेताओं, अधिकारियों और पूंजीपतियों का त्रिगुट शामिल रहता है, इसलिये संस्थायें अपनी भूमिका के अपराध से बच जाते हैं.

प्रबंधन यह सोचकर कि रैगिंग की खबरों से उनके यहॉं प्रवेश संख्या कम हो जायेगी, बजाय इसके कि कार्यवाही करें, उन्हे दबाने और छुपाने का प्रयास करते हैं. वे भूल जाते हैं कि बीमारी को छिपाने या दबाने से बीमारी साफ नही होती बल्कि और ज्यादा बढ़ती है. सिंधिया स्कूल के रैगिंग प्रकरण में पीड़ित छात्र के पिता जो बिहार सरकार में मंत्री भी है, ने स्वतः प्रबंधन को सूचना दी, इसके बावजूद भी प्रबंधन ने कुछ नही किया.

नये छात्र अकेलेपन से भयभीत रहते हैं और वे शिकायत करने से भी डरते हैं कि शिकायत करने पर वरिष्ठ उन्हे और भी प्रताड़ित करेंगे तथा कई बार प्रबंधन की छिपाऊ बचाऊ नीति से ऐंसी घटनाये बढ़ती हैं. लगभग ऐंसी ही घटना भोपाल के कालेज की भी है जहॉं छात्र ने अपने शिक्षक को रैगिंग की जानकारी दी थी और उक्त शिक्षक ने यह कहकर कि इसके लिये तैयार रहो, उसे टाल दिया.

हमारा समाज भले ही वैश्वीकरण के दौर के इस जुमले को गर्वोक्ति से कहता हो कि अब दुनिया एक गॉंव बन गई है और दूरियॉं कम हो गई है परन्तु सच्चाई यह है कि हमारा समाज कायर और भीरू समाज में बदल रहा है. दिल्ली में निर्भया बलात्कार कांड के समय कोई व्यक्ति उस पीड़ित बच्ची को तन ढकने को एक कपड़ा देने को तैयार नही हुआ. अभी हाल में मुंबई में चोरों ने घर की महिला को लेकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया, वह चीखती रही और कालोनी के पड़ोसी अपने घरों में दुबके रहे. यहॉं तक किसी ने 100 नंबर पर फोन करने की जहमत भी नही उठायी, चोरो का मुकाबला तो दूर की बात है. अगर वरिष्ठ छात्रों का भी एक समूह या नये छात्र भी सामूहिक रूप से रैगिंग के खिलाफ खड़े हो जाये तो भी रैगिंग रूक सकती है.

इन्दौर की कोचिंग में रैगिंग पीड़ित छात्र के परिवार ने मुझे बताया कि इन्दौर पुलिस के पास शिकायत पहुंचने के बाद एफ. आई. आर. दर्ज नही हुई. इससे रैगिंग करने वालों का दुस्साहस बढ़ता है जबकि होना यह चाहिये था कि एफ. आई. आर. दर्ज करते, अपराधियों को गिरफ्तार करते, उक्त संस्था की मान्यता और लायसेंस को समाप्त किया जाता तथा दोषी प्रबंधन के विरूद्ध भी कार्यवाही होती. अगर एक - दो भी ऐसी ठोस कार्यवाही हो तो रैगिंग की बीमारी रूक सकती है. परन्तु अब केवल सरकार के भरोसे बैठने के बजाय समाज और परिवार को भी आगे आकर अपना दायित्व निभाना होगा.

10.09.2014, 18.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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