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कशअमीर से हमें कोई मतलब नहीं

आलेख

 

कश्मीर से हमें कोई मतलब नहीं

एल एस हरदेनिया


मध्यप्रदेश के उज्जैन में वहां के विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर कौल ने विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले जम्मू-कश्मीर के विद्यार्थियों की सहायता करने की अपील जारी की. यह अपील तथाकथित हिन्दू संगठनों को नहीं भायी. गत् 15 सितंबर को, बजरंग दल व विहिप के लगभग 25-30 कार्यकर्ता, लाठियां लेकर प्रोफेसर कौल के कमरे में घुस गये. इस अचानक हुये हमले और दुर्व्यवहार से प्रोफेसर कौल इतने आहत हुये कि उन्हें एक स्थानीय अस्पताल के आईसीयू में भर्ती होना पड़ा. हमलावरों ने उनके पक्ष में जमकर तोड़फोड़ मचाई. उन्होंने कम्प्यूटर आदि नष्ट कर दिये.

विहिप और बजरंग दल


ये दोनों संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं. क्या संघ, इन संगठनों के माध्यम से यह चेतावनी देना चाह रहा था कि हम कश्मीर के बच्चों की कतई सहायता नहीं करेंगे? वे भूखे रहें, उनपर छत का साया रहे न रहे, वे चाहे फीस न चुका सकें, हमें इससे कोई मतलब नहीं. क्या हम उनसे यह कहना चाहते हैं कि हमें इस बात से भी कतई मतलब नहीं कि कश्मीर भारत का हिस्सा बना रहता है या नहीं. इस हमले का मतलब तो यही है.

बजरंग दल और विहिप के कार्यकर्ताओं को इस बात की परवाह भी नहीं थी कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह दौड़े-दौड़े कश्मीर गये और वहां के लोगों को भरोसा दिलाया कि हम आपके साथ हैं, पूरा भारत आपके साथ है. ऐसी ही बात मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी कही.

परंतु भाजपा और विहिप जैसे संगठनों के लोगों की मजबूरी है कि इनका संपूर्ण प्रशिक्षण घृणा पर आधारित है. जिस समय उज्जैन की घटना हुई उस समय उत्तरप्रदेश में भाजपा के बड़े नेता महंत आदित्यनाथ, साक्षी महाराज व उत्तरप्रदेश के भाजपा अध्यक्ष और कुछ केन्द्रीय मंत्री ‘लव जिहाद’ की बात कर रहे थे, ‘लव जिहाद’ के विरूद्ध महापंचायत का आयोजन कर रहे थे. फिर उसके प्रभाव से उज्जैन के विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता कैसे बच सकते थे?

मध्यप्रदेश में भाजपा के दो विधायक कह रहे हैं कि नवदुर्गा के दौरान आयोजित गरबा में मुसलमानों को शामिल न होने दिया जाना चाहिए. उनका कहना है कि गरबा में शामिल होने आये युवकों के मतदाता परिचयपत्रों की जांच की जानी चाहिए.

उज्जैन देश के पवित्रतम नगरों में से एक है. उज्जैन की गुरू-शिष्य परंपरा बहुत प्राचीन है. कहा जाता है कि उज्जैन के सांदीपनी ऋषि के आश्रम में भगवान कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा हुई थी. उनके साथ उनके भाई बलराम और उनके सखा सुदामा भी थे. यह वही महान नगर है जिससे विक्रमादित्य ने अपने शासन का संचालन किया था, जहां महान कवि कालिदास ने अपने गीत गाये थे. ऐसी महान नगरी की परंपराओं और उदार चरित्र पर ये असामाजिक तत्व आये दिन कालिख पोत रहे हैं और गुरूओं पर हिंसक हमले कर रहे हैं.

आज से 8 वर्ष पूर्व इसी उज्जैन शहर में प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या हुई थी. वे उज्जैन विश्वविद्यालय से संबंध माधव कालेज में प्रोफेसर थे. एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने उनका घेराव किया था क्योंकि वे प्रोफेसर सब्बरवाल के एक निर्णय से नाराज थे. हत्या का आरोप विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं पर लगा था. उनपर मुकदमा भी चला परंतु सभी बरी हो गये. इसका मुख्य कारण सभी 94 गवाहों द्वारा अपने बयान से मुकर जाना था.

यह किसी से छिपा नहीं है कि मध्यप्रदेश की सत्ताधारी भाजपा के एक बड़े हिस्से ने अपराधियों का साथ दिया था. जब आरोपी अदालत द्वारा निर्दोष माने गये तो एक मंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रसन्नता जाहिर की गयी थी. प्रसन्नता जाहिर करते समय मंत्री महोदय यह भूल गये कि यदि अपराधी अदालत से निर्दोष साबित होते हैं तो उसे राज्य सरकार की असफलता माना जाता है. सत्ता की असफलता पर सत्ता से जुड़े व्यक्ति द्वारा प्रसन्नता जाहिर करना कहां तक उचित था?

प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या के अनेक दर्शक थे. उनमें उसी कालेज के शिक्षक व विद्यार्थी भी शामिल थे. परंतु उनमें से एक ने भी अदालत के सामने सच बोलने की शपथ लेने के बाद भी सच नहीं बोला. यदि उस घटना के विरोध में उज्जैन के शिक्षक एकजुट हो जाते तो शायद प्रोफेसर कौल पर हमला करने का साहस संघ परिवार के सदस्य नहीं दिखा पाते.

एक समाचारपत्र के अनुसार यदि प्रोफेसर कौल को विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी नहीं बचाते तो शायद उनकी भी हत्या हो जाती. उस दिन विश्वविद्यालय के शिक्षकों और कर्मचारियों ने प्रोफेसर कौल को बाथरूम में बंद कर दिया इसलिये उनकी जान बच गयी. न सिर्फ उस दिन वरन् बाद में भी शिक्षकों और कर्मचारियों ने एकजुटता दिखाई और घटना के विरोध में विश्वविद्यालय बंद रखा. आशा है कि शिक्षकगण इस एकजुटता को कायम रखेंगे.

अब देखना यह है कि हमलावरों के विरूद्ध ईमानदारी से कानूनी कार्यवाही होती है कि नहीं या 2006 की घटना के आरोपियों की तरह, इन्हें भी बचाने का प्रयास किया जाता है.

जहां कांग्रेस ने इस घटना की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है वहीं भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस घटना पर कोई टिप्पणी नहीं की है. उज्जैन के विधायक पारस जैन, जो मंत्री भी हैं, ने घटना पर केवल खेद प्रगट किया और कहा कि राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान करना ठीक नहीं है. इससे ज्यादा हल्का बयान और क्या हो सकता है? मंत्री महोदय ने निंदा करने तक की आवश्यकता महसूस नहीं की.

यहां इस बात का उल्लेख करना प्रासंगिक है कि तथाकथित हिन्दू अतिवादी संगठन प्रायः ऐसी हरकतें करते हैं जो कानून की दृष्टि में अपराध हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरूओं का सम्मान करने की शिक्षा देता है. विद्यार्थी परिषद, संघ की शाखा है और शिक्षकों व विद्यार्थियों का मिलाजुला संगठन है. इसके बावजूद विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता आये दिन गुरूओं का अपमान करते हैं. उज्जैन में प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या के बाद खंडवा में वहां के शिक्षकों के मुंह पर कालिख पोतकर उनका अपमान किया गया था.

क्या संघ, विद्यार्थी परिषद को यह परामर्श नहीं देता कि वह इस तरह की घटनाओं से बाज आये और अनुशासन की सीमा में रहकर अपना विरोध प्रगट करे?

20.09.2014, 17.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] Mandi ( Himachal Pradesh) - 2014-09-21 03:20:44

 
  अगर भारत का संविआन इसे धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणतंत्र घोषित करता है तो ऐसी सांप्रदायिक घटनाओं पर पाबंदी क्यों नहीं लगाई जा रही है और क्यों आदित्यनाथ और साक्षी महाराज जैसे लोगों की संसदीय सदस्यता समाप्त नहीं की जा रही है.  
   
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