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तोड़नी होंगी व्यापार की बेड़ियां

विचार

 

तोड़नी होंगी व्यापार की बेड़ियां

प्रीतीश नंदी


पिछले हफ्ते फुमिहिको इके, होंडा के ग्लोबल चेअरमैन ने उसी बात की ओर ध्यान आकर्षित किया, जो हम सब बरसों से जानते हैं कि भारत में व्यवसाय करना कठिन और बहुत चुनौतीपूर्ण है. उनके शब्द थे, ‘यहां प्रक्रियाएं ‘जटिल’ और ‘बोझिल’ हैं.’ अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि उनके कहने का मतलब है कि हमारी व्यवस्था ‘भ्रष्ट’ और ‘यंत्रणादायक’ है. वे तो बस शिष्ट भाषा का प्रयोग कर रहे थे.

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दो दिनों के भीतर ऐसा कहने वाले वे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के तीसरे प्रमुख थे. खराब आधारभूत ढांचा (जर्जर सड़कें, सड़ा हुआ नीतिगत ढांचा) और अनिश्चत कर प्रणाली पूरे मामले को और भी खिझाने वाला बना देती है. ऐसे में किसी के लिए भी यहां गंभीर निवेश करना नामुमकिन हो जाता है. होंडा बॉस के इस वक्तव्य के एक दिन पहले वोडाफोन ने यही बात कही थी और यूरोप की दिग्गज तेल कंपनी बीपी का भी यही कहना था.

हम भारतीय बरसों से यह कहते रहे हैं, लेकिन किसी को हमारे कहने की परवाह ही नहीं थी, क्योंकि हम भारतीय पावलोव के कुत्ते की तरह प्रशिक्षित किए गए हैं कि व्यवसायी पर भरोसा करना मतलब खुद को लुटेरों के हवाले कर देना होता है. उससे सहानुभूति रखने की जरूरत नहीं है. हमें तो उन पर गहरा संदेह करना चाहिए. लिहाजा, हमारे सारे नियम इस तरह कड़े ढांचे में बनाए जाने चाहिए कि बिज़नेस पर कड़ी निगरानी रखी जा सके. बरसों की सतत सोच का यह असर है.

हर फिल्म में गांव में पैसा उधार देने वाला साहूकार खलनायक होता है. फैक्ट्री चलाने वाले तो हृदयहीन, क्रूर और गुलाम बनाने वाले लोग होते हैं. जरा अमिताभ बच्चन की पुरानी फिल्में याद कीजिए, जिन्हें देखकर हम तालियां कूटते थे? हमारे दिलो-दिमाग में आज भी अंग्रेजों के जमाने की औद्योगिक क्रांति चल रही है. कारखाने आज भी नर्क की तरह हैं. श्रमिक आज भी गुलाम हैं. तनख्वाह में हमें आज भी शोषण नजर आता है. मार्क्सवाद तो मर चुका है, लेकिन लाल झंडे के रोमांस ने हमें गुलाम बना रखा है.

इस बीच, दुनिया आगे बढ़ चुकी है और इसके साथ भारत भी. प्रदूषण फैलाने वाले कारखाने हमारी नई अर्थव्यवस्था के आधार नहीं रहे हैं. प्रतिभाशाली युवा अकेले, काम की छोटी जगहों में शांति से कड़ी मेहनत कर रहे हैं. अविश्वसनीय व्यवसायों का निर्माण कर रहे हैं. ऐसे व्यवसाय जो हमारे जीने, प्रेम करने, खाने, खरीदारी करने, साझेदारी और सीखने-सिखाने का तरीका बदल सकते हैं. इसे कहते हैं देश और दुनिया को साथ लाना. अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि फिल्मों में दिखाई देने वाले दुष्ट बनिए का युग खत्म हो गया है. बदलाव श्रम संगठनों या सरकारी कानूनों से नहीं आया है. बदलाव आया है नई पीढ़ी के उद्यमियों के कारण. ऐसे उद्यमी जो खुद को शोषको की तरह नहीं बल्कि खोजकर्ता, अन्वेषक और बदलाव के कारक के रूप में देखते हैं.

उनमें से कई सिर्फ पैसे के लिए काम नहीं करते. वे अपनी कल्पनाओं के आलोक में नए विचार निर्मित करने, जीवनशैली में रोमांचक बदलाव लाने और दुनिया को नया रूप देने के लिए काम कर रहे हैं. अब बिज़नेस किसी भी कीमत पर मुनाफा कमाने का अनैतिक विज्ञान नहीं रहा. अब यह दुनिया को नया रूप देने की, इसे हम सबके लिए रहने की बेहतर जगह बनाने की ठसकदार कला हो गई है. जहां संभव है कि इनमें से कुछ बदलाव हम-आप को रास न आएं, लेकिन आज ज्यादातर बिज़नेस के पीछे विचार यही है कि आस-पास बदलाव लाकर हमारे जीवन को ज्यादा रोचक-रोमांचक बनाया जाए.

आज हर कोई व्यवसाय कर रहा है. आमतौर पर खुद के लिए. घरों में नलों का काम करने वाले साधारण प्लम्बर से लेकर इलेक्ट्रिशियन ( जिसके बारे में पिछले ही हफ्ते मैंने अखबार में पढ़ा कि वह किसी इंजीनियर से ज्यादा कमाता है) और गलियों में खाद्य पदार्थ बेचने वाले फूड वेंडर तक, जिसकी कला को आज हाई फैशन की चीजों की तरह सराहा जाता है और जिसकी आमदनी परंपरागत बिज़नेस घरानों के पोस्ट ग्रेजुएट कर्मचारी की आमदनी को चुनौती दे सकती है. सारांश यह है कि भारत में हम बिज़नेस को जिस तरह जानते थे, वह तेजी से लुप्त हो रहा है. हमारे सामने रचनात्मक कलाकारों की पूरी पीढ़ी है, जो सरकार से नौकरी की भीख मांगने की बजाय अपना कौशल हासिल करने और उसके बल पर अपनी जीविका कमाने में लगी है.

किंतु भारत में बिज़नेस संबंधी कानून अब भी निरर्थक और उपनिवेशकालीन हैं. वे गहरे संदेह से उपजी मानसिकता से तैयार किए गए हैं. प्रत्येक व्यवसायी ही क्या हर ऐसा नागरिक जो अपनी प्रतिभा या कौशल के बल पर आजीविका कमाना चाहता है उसे संभावित चोर, ठग और कर-चोर के रूप में देखा जाता है और सारे कानून इस तरह बनाए जाते हैं, जो प्रतिभा को दबाएं, किसी भी नई पहल को कुचल डाले और स्वतंत्र विचारों का गला घोंट दें. इसके साथ उन लोगों की आत्मा का विनाश कर दें, जो अंग्रेजों के जमाने के बिज़नेस मॉडल से बाहर आना चाहते हैं.

वास्तव में हमारे कानून उन्हीं के सहायक हैं, जो अब भी वही सब कर रहे हैं. ये उन्हें कोई मदद नहीं देते, जो पुराने साचे से बाहर आकर नए प्रकार का बिज़नेस निर्मित करना चाहते हैं. इसकी वजह यह है कि हमारे नेता और नौकरशाह दुनिया में हो रहे व्यापक बदलावों को समझ ही नहीं पा रहे हैं. अनुमतियां देने और कर वूसली की व्यवस्था जर्जर, पुरानी और कालबाह्य हो चुकी है. वह अब भी पाषाण युग में काम कर रही है जबकि लाखों युवा डिजिटल युग में पहुंच चुके हैं. उन्हें प्रोत्साहित करने की बजाय यह व्यवस्था उन्हें रोकने, उगाही करने और बंधक बनाकर रखने में लगी है.

अब लड़ाई ईमानदार सरकार और भ्रष्ट व्यवसाय के की नहीं है. यह अच्छाई-बुराई की लड़ाई भी नहीं है. अब लड़ाई नए और पुराने के बीच है. सरकार पुरानी दादागिरी का प्रतिनिधित्व करती है. नया ये बेड़ियां तोड़कर साहस, उद्यम और उत्कृष्टता के स्वर्णिम मानक स्थापित करना चाहता है. यह लड़ाई कड़े सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था में देश को पीछे रोककर रखने वालों और इनसे मुक्त होकर दुनिया का सामना करने की इच्छा रखने वालों के बीच है. उन्हें आपकी नौकरियां नहीं चाहिए. उन्हें आपके फैले हुए हाथ भी नहीं चाहिए, जो या तो भीख देते हैं या रिश्वत मांगते हैं. उन्हें स्वतंत्रता चाहिए.

और क्या आपको पता है कि वे कितनी कड़ी मेहनत करते हैं? कोई सरकारी अधिकारी, कोई टैक्स अफसर इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता. ये अपनी कल्पनाओं, अपने आदर्शों के गुलाम हैं, किसी कारखाने या कर कानूनों के नहीं. उन्हें हमेशा रोककर रखने की बजाय अपने लक्ष्य प्राप्त करने की स्वतंत्रता दीजिए. यदि आप नहीं देंगे तो वे विद्रोह करेंगे या चुपचाप यहां से चले जाएंगे.

सारे ‘वसंतों’ का यही निचोड़ है. फिर चाहे यह मेरी युवावस्था में पेरिस का वसंत रहा हो या हाल का अरब जगह में आया वसंत. वे सभी स्वतंत्रता, साहस, नए सपनों के बारे में हैं. जब सरकारें यह देख नहीं पातीं तो वे अपनी मौत के फरमान पर दस्तखत कर देती हैं. याद रखें, अब पेट्रोल बम फेंकने की जरूरत नहीं है. एक छोटा-सा ट्वीट दमन की बड़ी से बड़ी इमारत ध्वस्त करने के लिए काफी है.

27.09.2014, 14.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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