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महात्मा गांधी होने के मायने

विचार

 

महात्मा गांधी होने के मायने

रघु ठाकुर

महात्मा गांधी


पिछले दिनों एक सार्वजनिक कार्यक्रम में महात्मा गॉंधी की चर्चा करते हुये एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र ने कहा कि गॉंधी जैंसा कोई दूसरा होना संभव नही है गॉंधी से मुझे भय लगता है और गॉंधी के अनुगमन के अर्थ में गॉंधी असंभव है. उनकी बात को सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ और चिंता भी क्योंकि ऐसी ही चर्चा कुछ न कुछ समय में अनेकों बुद्धिजीवियों के मुंह से सुन चुका हूं.

गाँधी एक विराट विचार और कर्म वृक्ष है जिन्होने जीवन के लगभग हर विषय के संबंध में सोचा कहा लिखा और जिया है. हमारे आधुनिक समाज को आदर्श की पाषाण प्रतिमा के रूप में गॉंधी अच्छे लगते हैं और लेखों और भाषणों में उत्तेजित करने की वस्तु भी परन्तु उन्हे जब गॉंधी को जीने की कसौटी पर कसा जाता है तब उन्हे गॉंधी से भय लगता है. निजी जीवन में गॉंधी सत्य की खोज करते हुये सत्य का अनुगमन करते हुये एक ऐसे मानव के रूप में हैं जो कुछ भी छिपाते नही है.

दुनिया को सही लगे या गलत अच्छा लगे या बुरा पर गॉंधी वही कहते और करते हैं जो उन्हे सत्य है उनके पास छिपाने को कुछ भी नही और यहॉं तक कि अपनी गलतियों और कमजोरियों को भी वे सच्चाई के साथ दुनिया के सामने रख देते हैं. इस अर्थ में गॉंधी एक पाखंड रहित व्यक्ति है जिनके विचार और कर्म अंदर और बाहर में कोई द्वैत नही है और यही वह पक्ष है जो लोगों को प्रभावित भी करता है और भयभीत भी करता है.

बीसवी सदी कल कारखानों और तकनीक की सदी है जो निरंतर तकनीक के विस्तार और भोग को बढ़ा रही है. इस सदी में तकनीक पर लोगों की निर्भरता इस कदर बढ़ी है कि बहुतेरे लोग तकनीक के नशेड़ची बन चुके हैं. कुछ लोग यह भी महसूस करते हैं कि गॉंधी तकनीक और मशीन के विरोधी हैं परन्तु गॉंधी न तकनीक के विरोधी थे न मशीन के. उन्होने मशीन का भी इस्तेमाल किया और तकनीक का भी. उन्होने पानी के जहाज से कार से रेल से और साईकिल से भी देश और दुनिया की यात्रा की. उन्होने सिंगर सिलाई मशीन की भी चर्चा की और कहा कि ऐंसी मशीन समाज को उपयोगी है.

दरअसल गॉंधी बड़ी मशीनों के खिलाफ थे और वे चाहते थे कि मशीन ऐसी हो जो इंसान के नियंत्रण में हो न कि ऐंसी जो इंसान को नियंत्रित करे. वे देख रहे थे कि किस प्रकार ब्रिटेन के मेनचेस्टर की बड़ी मशीनें भारत के कपास पैदा करने वाले किसानों का व मजदूरों का शोषण कर रही हैं और भारत को लूटकर ब्रिटेन को संपन्न कर रहे हैं. गॉंधी तकनीक के मानवीय उपयोग के खिलाफ नही थे बल्कि वे ऐसी परिस्थिति नही चाहते थे जिसमे तकनीक आदमी को मशीन में बदल दे. मशीन से मेरा तात्पर्य है कि एक ऐसा लोह यंत्र जिसमे मानवीय संवेग और संवेदनायें विचार मूल्य आदि न हो.

गॉंधी के विचारों के चार खम्भे है - संयम सादगी स्वावलंबन और स्वदेशी. इन चार खम्भों पर गॉंधी का विचार भवन आधारित है. आधुनिक तकनीक के उपयोगकर्ताओं को गॉंधी से इतना भय इसलिये लगता है क्योंकि गॉंधी संयम की रेखा खींचते हैं सादगी का बंधन बॉंधते हैं स्वदेशी का मंत्र इस्तेमाल करते हैं और स्वावलंबन की मशाल जलाते हैं. तकनीक का इस्तेमाल करने वालों को हम मोटा मोटी तौर पर तीन भागों में बॉंटते हैं उपयोगकर्ता 2. उपभोगकर्ता 3. भोगकर्ता . अगर आदमी अपनी जरूरत के अनुसार याने अपनी वास्तविक आवश्यकता के अनुसार तकनीक का इस्तेमाल करे तो गॉंधी कहीं मार्ग में नही आते परन्तु जब आप तकनीक का उपभोग करते है तो फिर आप जरूरत की आवश्यक संयम रेखा को पार करते है. दरअसल उपयोग अंग्रेजी शब्द कंसम्पशन का अनुवाद है और इसीलिये उसमे कोई नैतिक मापदंड नही है. उपभोग को एक अर्थ में भोग से कुछ कम माना जा सकता है और यह व्यक्ति की आर्थिक क्षमता पर निर्भर करता है.

आज चलित फोन है और देश और दुनिया की बड़ी आबादी चलित फोन का या इंटरनेट फेसबुक गूगल या याहू के नाम के खोजी इंजनो का प्रयोग कर रही है परन्तु अतिसंपन्न तबका इनका उपयोगकर्ता नही बल्कि भोगी बन गया है याने एक ऐसा इस्तेमाल करने वाला जो जरूरत की सीमाओं को नही मानता और अधिकतम अनावश्यक इस्तेमाल करता है उसके लिये ये एक प्रकार का नशा है और अपनी आर्थिक क्षमता के मद में वह स्वतः ही तकनीक का नशेड़ची बन रहा है तथा अपनी आनेवाली पीढ़ियों को उस नशे का शिकार बना रहा है.

अमूमन मै यात्रा में देखता हूं कि कुछ संपन्न घरों की महिलायें और युवक रेल में बैठते ही लम्बी लम्बी बातें जो लगभग गैर जरूरी है शुरू कर देते हैं. एक बार लखनउ से यात्रा शुरू करते हुये मेरी पड़ोस की सीट पर बैठी एक महिला ने लगभग धारा प्रवाह 55 मिनिट तक अपने बेटे से बात की जिन्हे घर पर छोड़कर आये मुश्किल से 20 मिनिट हुये होंगे और उस समूची बात का लब्बो लुआब केवल यही था कि खाना खा ले दरवाजा ठीक से बंद कर ले और दिल्ली से उन्हे क्या चाहिये जिसे वे ले आयें. कई पढ़े लिखे नौजवान रेल में बैठते ही घंटो का प्रेमालाप शुरू कर देते है जिसकी निरर्थकता का बोध कुछ समय पश्चात उन्हे स्वतः हो जायेगा.

कुछ लोग चलित फोन पर या लेपटाप पर जोर की आवाज में गाने या फिल्म देखना शुरू कर देते है. वे यात्रा का नियम व शिष्टाचार भूल जाते हैं तथा देर रात्रि 12 - 2 बजे रात तक न सोते है न यात्रियों को सोने देते है. दरअसल यह तकनीक का न उपयोग है न उपभोग बल्कि दुरूपयोग है. गॉंधी चलित फोन के इस्तेमाल का विरोध नही करते बल्कि उपयोग की संयम सीमा बॉंधते. यह मैने एक उदाहरण दिया है इस उदाहरण को हर तकनीक के इस्तेमाल में चाहे वह कार हो या मोटर साईकिल टी.वी. हो या कुछ और गॉंधी की कसौटी पर कसा जा सकता है. क्या आज संपन्न लोग अपनी संपन्नता का इस्तेमाल दिखावे और भोग के उपर नही कर रहे है. हर तकनीक और मशीन कहीं न कहीं प्रकृति के इस्तेमाल से चलती है.

बिजली चाहे परमाणु उर्जा हो चाहे कोयला उर्जा हो पवन उर्जा हो या जल उर्जा किसी न किसी प्राकृतिक संसाधन के इस्तेमाल से ही तैयार होती है और जब हम गैर जरूरी उपयोग करते है तब हम प्रकृति को नष्ट करते है और उसके दूरगामी परिणामस्वरूप स्वतः को भी नष्ट करते है. जब हम तकनीक के नशेड़ची बन जाते है तो हमारी दिनचर्या बगैर किसी कारण के अप्राकृतिक बन जाती है जो स्वास्थ्य को नष्ट करती है और बीमारियों को उत्पन्न करती है.

गॉंधी जब प्राकृतिक जीवन को जीने का मार्ग बताते है प्रकृति संरक्षण की सीख देते है तो वे आदमी को आत्म निर्भर और रोग मुक्त बनाने का प्रयास करते है. गॉंधी के बहुत सारे सिद्धांत और लक्ष्य है जिनकी तार्किकता नैतिकता संदेह से परे है और जिनके उपर अमल करने के लिये एक बड़े संयम की आवश्यकता है. जब गॉंधी के बेटे का दूसरा पुत्र हुआ तो गॉंधी उस पर खुशी के बजाय नाराज हुये और उन्होने कहा कि तुमने मुझे ब्रहमचर्य का वादा किया था जो तुमने पूरा नही किया.

अब दुनिया परिवार और आबादी को सीमित करने के लिये अनेकानेक दवाईयों और यंत्रों का इस्तेमाल कर रहे है गॉंधी उसे स्व-संयम से करना चाहते है. स्व-संयम एक कठिन प्रयोग तो है परन्तु उसे असंभव नही माना जा सकता. गॉंधी न पुरातनपंथी है न अतिरेकी है बल्कि वे एक तार्किक और वैज्ञानिक सोच के व्यक्ति है जो दुनिया के भविष्य को देख पा रहे है और उसे बचाने के लिये सावधान कर रहे है ताकि आदमी आदमी बना रहे.

दरअसल भारतीय सभ्यता या गॉंधी का सनातन धर्म क्या है वह व्यक्ति का निरंतर प्रकृति प्रेम सत्य संयम और स्वालंबन की ओर बढ़ने की क्रिया है. गॉंधी की आजादी का मतलब अपनी सरकार या देशी सरकार नही है बल्कि वे एक ऐसे आजाद इंसान की कल्पना करते है जो स्वनियंत्रित होगा. वे जानते हैं कि किसी भी प्रकार का परावलंबन आजादी को खत्म करने या कम करने वाला चाहे वह वस्तुओं का हो मशीन का हो उत्पादन का हो कानून का हो सत्ता को हो या किसी भी प्रकार का.

गॉंधी यह चाहते हैं कि इंसान इतना उन्नत हो कि उसे किसी भी प्रकार की परनिभर्रता की आवश्यकता न हो तभी सही अर्थों में इंसान आजाद हो सकता है. आज हम लोग आजादी की खोज में सत्ता का रास्ता खोजते है मशीनी दासता खोजते है पूंजी की गुलामी खोजते है और अपने मन विचार और आत्मा तन और जीवन मूल्य सब कुछ का समर्पण कर सुविधा और भोग विलास तलाशते है.

गॉंधी का आजाद नागरिक एक परिपूर्ण देशी नही बल्कि सम्पूर्ण विश्व है. गॉंधी उनके जमाने के 36 करोड़ का भारत या 3 अरब की दुनिया नही बल्कि 3 अरब चलते फिरते विश्व का सर्जन करना चाहते थे. गॉंधी न भयावह है न बाध्यता गॉंधी न डर है न डंडा बल्कि गॉंधी एक रोशनी है जो उसके प्रकाश पर चलना चाहे जितनी दूर चलना चाहे जब तक चलना चाहे चल सकता है और अगर अंधकार में भटकना चाहता है तो वह उसके लिये भी आजाद है.

02.10.2014, 11.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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