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एनआरआई को वापस मिले सम्मान

मुद्दा

 

एनआरआई को वापस मिले सम्मान

प्रीतीश नंदी


क्या आपको पता है कि न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वेयर पर भाषण में प्रधानमंत्री को सबसे ज्यादा तालियां किस बात पर मिलीं? यह तब हुआ जब उन्होंने अनिवासी भारतीयों से कहा कि वे जानते हैं कि जब भारतवंशी स्वदेश आते हैं तो एयरपोर्ट पर उनका सामना किस चीज से होता है. वे आव्रजन और कस्टम के लोगों का उल्लेख कर रहे थे, जिनसे उन्हें निपटना पड़ता है.

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आव्रजन अधिकारी ऊपर से नीचे तक आपको ऐसे गहरे संदेह से देखते हैं कि आपको अहसास हो जाता है कि आपका यहां कतई स्वागत नहीं किया जा रहा है. लंबी उड़ान के उपरांत लंबी कतार में खड़े रहने के बाद आप यह तो कतई नहीं चाहेंगे कि कोई आपसे भौंहें चढ़ाकर पेश आए. खासतौर पर आपका हमवतन, जिसका काम पासपोर्ट पर ठप्पा लगाकर आपको जाने देने का है.

दूसरी तरफ कस्टम अधिकारी इस अनुमान के साथ शुरुआत करते हैं कि आप तस्करी करके कोहिनूर लेकर आ रहे हैं. यह सही है कि ऐसे लोग भी होते हैं, अवैध रूप से न जाने क्या-क्या ले आते हैं पर सच तो यह है कि ज्यादातर वे यह सब बिल्कुल वैध तरीके से करते हैं. आमतौर पर व्यवस्था की मिलीभगत से. न तो स्वदेश लौट रहे सारे भारतीय या पीठ पर बैग लटकाए आने वाले विदेशी माल ढोने वाले खच्चर हैं कि उनके सामान की हर चीज की कई-कई बार जांच की जाए (यदि आप अश्वेत हों तो मामला और खराब हो जाता है.)

इसमें मामूली अपवाद होते हैं, यह सही है, लेकिन उन्हें कोमलता से निपटाने की जरूरत होती है. ऐसी बातों के लिए एयरपोर्ट पर घंटों प्रताड़ित करने की जरूरत नहीं है बल्कि फटकार लगाना या चेतावनी देना काफी है. जैक डेनियल की अतिरिक्त बोतल या किसी नए आईपैड को जान-बूझकर की गई आपराधिक गतिविधि मानने की जरूरत नहीं है. या मध्यपूर्व में काम करने वाला कोई कामगार बेचारा घर के लिए टीवी सेट ले आया हो. मुझे इससे ज्यादा कोई दृश्य देखकर दुख नहीं होता, जितना किसी हमवतन को चेहरे पर डर का साया रखकर कस्टम से बचकर निकलने की कोशिश करते देखता हूं. सिर्फ इसलिए कि वह परिवार के सदस्यों के लिए तोहफे लेकर छह साल बाद स्वदेश लौटा है.

आइए, कुछ और उदाहरण लेते हैं. क्या आपको टैक्स नोटिस मिला है? क्या वैट के लोगों ने आपसे किसी ऐसे लेन-देने के बारे में कोई जानकारी मांगी है, जिससे अापका कोई संबंध नहीं है? आप तो सिर्फ किसी क्लर्क की गलती के कारण इसमें घसीटे गए हैं. क्या आपने ऐसे पत्र पढ़े हैं? अब कल्पना कीजिए कि यदि आपके 90 वर्षीय पिता को ऐसा नोटिस मिलता है? क्या आपको लगता है कि वे इसे बर्दाश्त कर पाएंगे? आपका सीए चाहे इसे प्रक्रिया का अंग बताकर खारिज कर दे पर क्या प्रक्रिया इतनी रूखी, धमकाने वाले अंदाज की और आक्रामक होनी चाहिए?

पलानीअप्पन चिदंबरम के दिनों में आपने वे भद्‌दे अखबारी विज्ञापन पढ़े होंगे, जिनमें टैक्स अधिकारी आपको (और हर अन्य करदाता को) नसीहत देते हैं कि खबरदार! आपकी हर गतिविधि, हर लेन-देन बल्कि हर सांस पर सरकार की नजर है और यदि आप अपने सारे टैक्स समय पर नहीं चुकाते हैं तो आपको भगवान ही बचाए! मैंने कभी किसी सरकार को अपने ही नागरिकों को इस तरह की धमकी देते हुए नहीं देखा. यदि इस विज्ञापन के पास से गुजर रहा कोई विदेशी देखे तो समझेगा कि यह तो कर चोरों का राष्ट्र है.

मुझे पक्का पता है कि सरकार में अच्छे इरादे वाले लोग हैं. वे अपने दायित्व खुशी-खुशी और सामान्य तरीके से पूरे करते हैं. जो दुर्भावना हमें और आपको नजर आती है वह तो अपने प्रिय हमवतन साथी के प्रति उनके मैत्रीभाव का हिस्सा है, लेकिन ईमानदारी से कहूं तो हमारा काम इसके बिना भी चल जाएगा. ऐसा करने की कोई जरूरत ही नहीं है. ईस्ट इंडिया कंपनी तो कब की जा चुकी है और अब इन लोगों को हमारे चुकाए टैक्स से तनख्वाह मिलती है. वे थोड़ा ज्यादा विनम्र, थोड़ा अधिक सम्मानजनक व्यवहार क्यों नहीं कर सकते?

नहीं, मामला यही नहीं खत्म हो जाता. यदि आप उन 2 फीसदी लोगों में से हैं जो तिमाही-दर-तिमाही, साल-दर-साल अपना टैक्स चुकाते हैं तो आपके मामले को विशेष जांच के लिए चुने जाने की संभावना ज्यादा है ताकि अधिक वसूली के लिए आपकी बाहें मरोड़ी जा सकें, जबकि टैक्स नेट से बचकर निकले 98 फीसदी लोग शानदार जिंदगी जीते रहते हैं. इनमें से कुछ को आप संसद में अपने फेफड़ों की शक्ति आजमाते हुए सुन सकते हैं.

ईमानदार करदाता के लिए स्थिति बहुत खराब है. न सिर्फ हमें अपना कर चुकाने में संघर्ष (और जैसा आपको पता ही होगा कि ये कर हमारी ओर म्यूटेंट निंजा की तरह चारों तरफ से आते हैं) करना पड़ता है, लेकिन अब तो हमें सरकार की ओर से अन्य लोगों से भी टैक्स वसूल करना है. यदि आप ऐसा करने में नाकाम रहते हैं या आपसे देर हो जाती है तो सजा उतनी ही कठोर है, जितनी अपना टैक्स न चुकाने की. हां, मैं उस घिनौनी चीज की बात कर रहा हूं, जिसे टीडीएस कहते हैं. मैं जब करदाता बना तो मुझे ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया कि मैं टैक्स कलेक्टर भी बन गया हूं.

मजेदार बात यह है कि ये सारी अपमानजनक बातें केवल आप और मुझ पर थोपी जाती हैं. रसूखदार लोग तो हत्या करके भी बच निकलते हैं. कोई उन्हें छू नहीं सकता. उन्हें रहने के लिए आकर्षक लुटियन्स बंगले मिलते हैं और प्राय: वे उनमें बरसों-बरस जमे रहते हैं. किराया इतना, जितना आप और मैं वन बीएचके के लिए देते हैं. उनकी जिंदगी में हर चीज पर सब्सिडी है. संसद में उनके भोजन से लेकर, हवाई यात्रा, फोन बिल, बिजली, पानी, उनके और उनके परिवार के सदस्यों के लिए चिकित्सा उपचार, पेट्रोल बिल और न जाने क्या-क्या. और समाज सेवा करने या किसान होने का दावा करके वे उन सारे करों से बच जाते हैं, जो हम-आप चुकाते हैं.

हालांकि, बात सिर्फ टैक्स की नहीं है. बात उस व्यवहार की है, जो हमारे साथ किया जाता है. यदि आपको कोई गंभीर समस्या हो और आपने किसी सरकारी अधिकारी को पत्र लिखा हो तो क्या कभी आपको जवाब मिला? नहीं. या तो वह, उसके लिए संभव हो तो समस्या को और जटिल बना देता है या आप भाग्यवान हो तो आपका पत्र कूड़ेदान में डाल देगा.

यही वजह रही कि मोदी जब यह कहकर थोड़ा रुके तो देश ने तालियां बजाईं. वे जानते थे कि उन्होंने लोगों के दिल की बात छू ली है. ब्रिटिश साम्राज्य तो कब का चला गया पर हम आज भी उसी व्यवस्था के गुलाम बने हुए हैं. एक ऐसी व्यवस्था, जो दादागिरी करने वाले दूसरे झुंड द्वारा चलाई जा रही है. जब आपकी सरकार ही आप को अपमानित कर खुश हो रही हो तो हम यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि दुनिया हमारा सम्मान करेगी?


19.06.2014, 22.19 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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