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प्रीतीश नंदी | Pritish Nandi | असहिष्णुता

विचार

 

असहिष्णुता को साधने की कला

प्रीतीश नंदी

 

 

सहिष्णुता में कोई बुराई नहीं है यदि आपको यह पता हो कि इसे कैसे उदात्त भाव से पेश करना है. कुछ महानतम कला, संगीत, कविता, फिल्में असहिष्णुता से ही उभरी हैं. इनका सृजन ऐसे लोगों द्वारा किया गया जो क्रोधित, हताश और असंतोष की भावना से ग्रस्त थे.

यह उनकी भीषण असहिष्णुता ही थी, जिसे सृजनात्मक अभिव्यक्ति मिली और जिसने हमें कलात्मक आजादी का सबक पढ़ाया. यह सिर्फ इस तरह की आजादी ही है कि आज जो हमारे चारों ओर हो रहा है और जिसके खिलाफ हममें से ज्यादातर लोग गुस्सा और हताश हैं, यह उसे उदात्त भाव में पेश कर सकती है.

ऐसा तब होता है जब आप इस तरह की कलात्मक आजादी को रोकने की कोशिश करते हैं, जब आप लेखकों को अपनी मनचाही बात लिखने से रोकते हैं, जब आप चित्रकारों को खुद को अभिव्यक्त करने से या संगीतकारों को अपने संगीत या गीतों में अपनी चिंताओं को आवाज देने से रोकते हैं, जब आप कवियों को मौजूदा माहौल के बारे में आवाज देने से रोकते हैं, जब आप सड़कों पर पसरी हिंसा और गुस्से को दर्शाने वाली फिल्मों को सेंसर करते हैं, तब आप अत्यधिक रोष और रक्तपात के लिए माहौल तैयार करते हैं. और अंधा प्रकोप अपना रास्ता राजनीतिक अतिवाद में खोजता है.

यही कारण है कि सृजनात्मक आजादी को संरक्षित करने की जरूरत है. जब आप ऐसी आजादी को रोकते हैं और चीजों को सेंसर करने लगते हैं, तो आप परिष्कार की प्रक्रिया में बाधा डालते हैं. रोष और हिंसा को अभिव्यक्ति की इतनी जरूरत होती है कि यदि सही रास्ता न मिले तो यह असहिष्णुता हिंसक अभिव्यक्ति के रूप में उतरने लगती है. इसकी शुरुआत बसों, रेलों और सार्वजनिक संपत्ति को जलाने से होती है. इसके बाद यह आपके गुस्से का खास निशाना तलाशती है- किसी खास जाति, समुदाय या धार्मिक विश्वास से जुड़े लोग जो इस अंधे प्रकोप के विकार से ग्रस्त होते हैं, उस सबका प्रतिनिधित्व करने लगते हैं जो आपके या आपके आस-पास गलत घटित हुआ या हो रहा है. उसके बाद आती है अराजक भीड़, आतंकवादी हमले, बम धमाके, इन सबके के पीछे होता है जटिल(और अकसर घुमावदार) तर्र्को से बना एक वैचारिक या राजनीतिक आव्यूह, जिनमें से ज्यादातर तर्क वास्तव में बकवास होते हैं.

हां आतंकवाद को सबसे भयानक अपराध माना जाता है जबकि ननों के साथ बलात्कार करने, दलितों की हत्या करने या प्रवासी मजदूरों को पीटने जैसी घटनाओं को खलनायकी के पैमाने पर काफी नीचे रखा जाता है.


यहीं राजनीतिक पार्टियां आपके गुस्से को नई वैधता प्रदान के लिए आगे आती हैं. इसके बदले में वे आपको अपना गुलाम बनाना चाहती हैं. आप अब उस गुस्से का स्रोत नहीं रहते. आप उग्र राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा बन जाते हैं और आपकी सुरक्षा आंकड़ों में सिमट जाती है. आप जनता में जाकर अपने गुस्से को जाहिर कर सकते हैं. आप घरों और धार्मिक पूजा स्थलों को जला सकते हैं. आप अराजक भीड़ में शामिल हो सकते हैं. आप सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकते हैं और जितना क्रोध व रोष आपके मन में भरा है, उसे आवाज दे सकते हैं. यहां तक कि आप लूट, डाका, हत्या और बलात्कार को दंडाभाव से अंजाम दे सकते हैं क्योंकि आपको अब ऐसा करने के लिए नैतिक स्वीकृति मिली होती है. आप निमित्त का प्रतिनिधित्व करते हैं.

यह निमित्त आपकी हर कार्रवाई का हर्जाना है. यदि आप गिरफ्तार होते हैं तो आप पीड़ित बन जाते हैं. यदि आपको सजा मिलती है तो आप हीरो बन जाते हैं. आपका गुस्सा हर आदमी का गुस्सा बन जाता है. अब आप अलग-थलग नहीं होते. आपका भी कहीं जुड़ाव होता है. अतएव, आज जो भी जुर्म करते हैं वह एक राजनीतिक कार्रवाई के तौर पर तब्दील हो जाता है. और चूंकि लोकतंत्र आपको राजनीतिक आजादी देता है, लिहाजा आप अब बगैर जलालत और पछतावे के कुछ भी करने के लिए आजाद हैं जो आप करना चाहें. एंग्री यंगमैन अब एक राजनीतिक एरीविस्ट(संदिग्ध साधनों के जरिए कम समय में ज्यादा सफलता हासिल करने वाला व्यक्ति) में तब्दील हो गया है.

आज हम यही तो देख रहे हैं. ज्यादातर परिस्थितियों में सामान्य तौर पर नजर आने वाले युवाओं के गुस्से और हताशा को अब सृजनात्मक अभिव्यक्तियों के जरिए आवाज नहीं मिल रही है. अब यह ठगी, जुर्म, अराजक भीड़, आतंकवाद के रूप में बदल रहा है. वास्तव में इन अपराधों में कोई अंतर नहीं है, यद्यपि हम, एक राष्ट्र के तौर पर, उन्हें एक पैमाने पर आंकते हैं जहां आतंकवाद को सबसे भयानक अपराध माना जाता है जबकि ननों के साथ बलात्कार करने, दलितों की हत्या करने या प्रवासी मजदूरों को पीटने जैसी घटनाओं को खलनायकी के पैमाने पर काफी नीचे रखा जाता है.

हम नहीं समझ पाए कि ऐसे सभी अपराध एक ही जगह से शुरू होते हैं, एक ही पैटर्न पर चलते हैं: निराशा, असहायता, हताशा, अंधा रोष. यहां खलनायकी डर, नैराश्य, वेदना, क्रोध समेत उन सब कारकों का नतीजा है जिन्हें अभिव्यक्त करने के लिए और कोई जरिया नहीं मिलता और आखिरकार वे असहायता से घिर जाते हैं. और जैसा हम सब जानते हैं कि असहायता और अपराध में एक तात्कालिक जुड़ाव है. क्रुद्ध मराठी लड़के जिन्होंने मुंबई की सड़कों पर गरीब बिहारियों को मारा-पीटा, वे भी उतने ही असहाय हैं जितना कि उनके द्वारा पीड़ित लोग. यही कारण है कि वे आसान लक्ष्य चुन रहे हैं. यदि यह बिहारी नहीं होते तो कोई और होता- मुसलमान, दक्षिण भारतीय, बांग्लादेशी कोई भी. यह सिर्फ अंधा रोष ही है जो अभिव्यक्ति तलाश रहा है. राज ठाकरे जैसे लोग तो सिर्फ इसे आवाज और लक्ष्य देते हैं.

वापस अपनी पहली बात पर लौटते हैं. असहिष्णुता में तब तक कोई बुराई नहीं है जब तक कि हम इसे उचित मंच से अभिव्यक्त करते हैं, सड़कों पर नहीं. हर कोई अपना सोच रख सकता है, फिर वह कैसा भी हो. समस्या तभी पैदा होती है जब लोग बोलना छोड़ सड़कों पर पहुंच जाते हैं. इसलिए संभाषण जारी रहें. उन पर लगाम मत लगाइए, अन्यथा हर मसला सड़कों पर ही नजर आएगा और अपना राजनीतिक रहनुमा तलाशेगा जो उनका शोषण करेगा.

ऐसे में हमारी पहली प्राथमिकता राज्य की दखलंदाजी के बगैर, सेंसरशिप के बगैर अपनी परंपरागत संवाद प्रक्रिया को बहाल करना होना चाहिए. लोग जो कहना चाहते हैं, उन्हें कहने दीजिए. उन्हें और जाति, संप्रदाय, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन करने व खून बहाने के बजाय सुरक्षित मंचों पर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने दीजिए. हम सब भारतीय हैं और इस देश के किसी भी नागरिक के राष्ट्रीय अस्मिता के अधिकार को चुनौती देना देशद्रोह से कम संगीन नहीं है.

 

10.11.2008, 18.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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