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यह किसका विकास है

विचार

 

यह किसका विकास है

इरफान इंजीनियर


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर अपनी आमसभाओं आदि में कहते हैं कि वे सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास के प्रति प्रतिबद्ध हैं. उनके कहने का अर्थ शायद यह होता है कि वे सभी भारतीयों के विकास के लिए काम करेंगे, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या नस्ल के हों, चाहे उनकी संस्कृति कोई भी हो व वे देश के किसी भी इलाके में रहते हों. यह सोच सराहनीय है और इस दिशा में प्रयास करने वाले नेता को हम सभी का पूरा समर्थन मिलना चाहिए.

नरेंद्र मोदी


परंतु यदि हम थोड़ी गहराई से सोचें तो दो प्रश्न हमारे मन में उभरेंगे. पहला यह कि क्या हमारे देश के पास इतने संसाधन हैं कि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास सुनिश्चित कर सकें? तथ्य यह है कि हमारे संसाधन अत्यंत सीमित हैं और चाहे हम कितने ही आकर्षक नारे क्यों न लगायें, ऐसा विकास असंभव है जिसका लाभ सभी भारतीयों तक पहुंचे. विकास पर परस्पर विरोधाभासी दावे होना अवश्यंभावी है. जो लोग संगठित हैं और जिनके पास सरकारी तंत्र को प्रभावित करने की ताकत और नौकरशाही तक पहुंच है, वे विकास के फल उन लोगों तक नहीं पहुंचने देंगे जो अपनी आवाज उठाने में सक्षम नहीं हैं. इसलिये सभी का विकास या तो केवल एक पवित्र इरादे की घोषणा है या सहज विश्वासियों को बेवकूफ बनाने का हथियार.

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हमारे देश में व्याप्त असमानताओं के परिप्रेक्ष्य में, यदि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तो क्या यह न्यायपूर्ण है? दुनिया के 100, बल्कि 50, सबसे रईस व्यक्तियों में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है परंतु यह भी सच है कि 20 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन से कम की आमदनी पर जीवनयापन करने वाले भारतीयों की संख्या 83.6 करोड़ है. लगभग 20 करोड़ भारतीय, हर रात भूखे सोते हैं, लगभग 21.2 करोड़ कुपोषित हैं और हर वर्ष लगभग 7,000 भारतीय भूख से मर जाते हैं. अगर हम इनमें उन लोगों को जोड़ लें जो कुपोषण-जनित बीमारियों से मरते हैं तो यह संख्या करीब 1 करोड़ हो जायेगी.

सबसे रईस 50 या 100 लोगों के क्लब में भारतीयों की संख्या के बढ़ने से कुछ भारतीय, विशेषकर शहरी मध्यम वर्ग, स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं. वे भारत में बढ़ती असमानता की ओर देखना ही नहीं चाहते. वे इस तथ्य की ओर शुतुरमुर्गी रवैया अपनाये रहते हैं कि भारत, मानव विकास सूचकांकों की दृष्टि से, दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी पीछे है. शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच, शिशु व बाल मृत्यु दर आदि की दृष्टि से हम बहुत पिछड़े हुये हैं. शुतुरमुर्गी मुद्रा में रेत में सिर गड़ाये हुये शहरी मध्यमवर्ग के भारतीय, ऐसा कुछ भी देखना-समझना नहीं चाहते जो गौरव के उनके भाव को चोट पहुंचाए. जब प्रधानमंत्री मोदी सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तब तकनीकी रूप से वे गरीबों के विकास की बात भी करते हैं. परंतु चूंकि संसाधन सीमित हैं इसलिये प्रश्न यह उठता है कि सभी भारतीयों का विकास करने की उनकी रणनीति क्या है? सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं? करदाताओं के पैसे का सरकार किस तरह इस्तेमाल करना चाहती है?

एक रणनीति तो यह हो सकती है कि देश के पिछड़े इलाकों में आधारभूत संरचना का निर्माण किया जाये. इसके लिये संबंधित क्षेत्र के सभी जातियों व समुदायों के लोगों के श्रम का इस्तेमाल हो. ऐसा करने से वहां के निवासियों को विकास का लाभ तो मिलेगा ही, उन्हें रोजगार भी उपलब्ध हो सकेगा. इससे उन लोगों को नये अवसर मिलेंगे, जिन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है. इससे भूखों और कुपोषितों के हाथों में कुछ पैसा आयेगा. इस आमदनी से वे जो सामान खरीदेंगे उससे उद्योगों को अपरोक्ष रूप से लाभ होगा. परंतु जब प्रधानमंत्री सब के विकास की बात करते हैं तब उनके दिमाग में स्पष्टतः यह रणनीति नहीं होती.

दूसरी रणनीति यह हो सकती है कि करदाताओं के पैसे और देश के संसाधनों (जमीन, पानी, जंगल, खनिज व अन्य प्राकृतिक संसाधन) का इस्तेमाल कर भारी-भरकम उद्योग खड़े किए जाएं, जिनसे केवल कुछ लोगों को लाभ हो. इस रणनीति के पैरोकार हमें बताते हैं कि गरीब-मजदूर, किसान, छोटे व्यवसायी व कारीगर - उन्हें उपलब्ध कराए गए अवसरों का उचित इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे और वे उतनी तेजी से विकास की राह पर देश को आगे नहीं ले जा पाएंगे जितनी तेजी से वे लोग ऐसा कर सकेंगे जिनके पास ढ़ेर सारी पूंजी है. जब विकास तेजी से होगा तब रोजगार के अवसर बढेंगे और इससे अपरोक्ष रूप से गरीबों को फायदा होगा.

विदेशी निवेशक, भारत को भारी मुनाफा कमाने वाली जगह के तौर पर देख रहे हैं. परंतु वे श्रमिकों पर कम से कम पैसा खर्च करना चाहते हैं और देश के प्राकृतिक संसाधनों, जिनमें जमीन से लेकर स्पेक्ट्रम तक शामिल हैं, का भरपूर दोहन करना चाहते हैं. मुनाफा बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि श्रम पर कम से कम खर्च किया जाए. इसका एक तरीका तो यह है कि इस तरह की आधुनिक, मंहगी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए जिससे उद्योगों में कम से कम श्रमिकों की जरूरत पड़े. इस तरह का विकास, रोजगार नहीं लाता. दूसरा तरीका है कि मजदूरी की दर कम से कम रखी जाए.

‘विकास‘ की इस दूसरी रणनीति के तहत, राज्य, पूंजीपतियों को मिट्टी के मोल जमीन व अन्य प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध करवाता है और करदाताओं के पैसे से ‘विश्वस्तरीय‘ आधारभूत संरचना वाले कुछ द्वीप तैयार करता है, जिससे पूंजीपतियों को अच्छी सड़कें, फ्लाईओवर, बंदरगाह, बिजली आदि उपलब्ध कराई जा सके. राज्य, गरीबों से उनकी जमीनें जबरदस्ती छीनता है. किसानों को संगठित होकर अपनी जमीन की उचित कीमत पाने के लिए मोलभाव करने का मौका ही नहीं दिया जाता. गरीबों से कहा जाता है कि वे अपनी जरूरत की चीजें जैसे अनाज, खाद, कीटनाशक इत्यादि खुले बाजार से खरीदें क्योंकि अनुदान, अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. परंतु निवेशकर्ताओं से यह नहीं कहा जाता कि वे अपने उद्योग लगाने के लिए बाजार मूल्य पर जमीन आदि खरीदें.

इस तरह, इस दूसरी रणनीति से केवल और केवल उन लोगों को लाभ होता है जिनके पास अरबों रूपये हैं. राज्य उनका ताबेदार बन जाता है और उन्हें जमीन व देश के अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने की खुली छूट देता है. इसके साथ ही, श्रम कानूनों में इस तरह के ‘सुधार‘ किए जाते हैं जिससे ट्रेड यूनियनों के लिए श्रमिकों को संगठित करना मुश्किल हो जाता है. गरीबों को उनकी संपत्ति का उचित मूल्य नहीं मिलता और उन्हें कम से कम वेतन पर काम करना होता है. इससे देश में असमानताएं बढ़ती हैं. अपने विदेशी दौरों में प्रधानमंत्री मोदी अपने ‘मेक इन इंडिया‘ नारे से विदेशी कुबेरपतियों को यही लालच दे रहे हैं और मजे की बात यह है कि वे इसे सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास कहते हैं.
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