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असली रूप में लौट रहा बाज़ार

विचार

 

असली रूप में लौट रहा बाज़ार

प्रीतीश नंदी


मैं ज्यादा खरीददारी नहीं करता. ऑनलाइन तो कतई नहीं. मैं जो खरीदता हूं वह अजीब, बिना सोचे-समझे और प्राय: विचित्र होता है. मसलन किसी को यह समझ में नहीं आता कि मैं जादू की चीजें बेचने वाली दुकानों में खरीददारी करना इतना क्यों पसंद करता हूं. मैं वहां घंटों गुजार देता हूं. कार्ड ट्रिक आजमाकर देखता हूं. आंखों को धोखा देने वाली चीजें खरीदता हूं. यह पता लगाने की कोशिश करता हूं कि भोले-भाले लोगों को कैसे चकमा दिया जाता है. कोई भी गॉड मैन यानी चमत्कारी पुरुष जो कर सकता है, वह मैं बेहतर ढंग से कर सकता हूं.

भारतीय बाज़ार


गैजेट स्टोर की भी वही बात है. उनसे मुझे मानव की चतुराई के दर्शन होते हैं. कैसे एक बड़ा आइडिया लाना और फिर स्टाइल, फैशन, ब्रांड और मॉडल के नाम पर बरसों तक उसका दोहन करना. यह चीजों को अत्यधिक आकर्षक वस्तुओं में बदलने की कला है. इतने वर्षों से मैं देख रहा हूं कि ऐसी चीजों के सिर्फ लुभावने डिजाइन और पैकेजिंग के जरिये ब्रांड मेरी जेब में हाथ डालकर पैसे निकाल लेते हैं, जिनकी मुझे जरूरत ही नहीं होती. मजे की बात तो यह है कि जब मैं पैसे दे रहा होता हूं तब भी मुझे यह बात मालूम रहती है.

खरीददार और बेचने वाले के बीच का जो संपर्क बिंदु होता है, उसमें शायद ही कभी नैतिकता होती है. बेचने वाला ज्यादा से ज्यादा मुनाफा खींचने में लगा होता है और खरीददार की कोशिश होती है कि उसे चीजें सस्ते में मिल जाए. यह तो एक प्रकार का संग्राम ही है. हम भारतीयों से ज्यादा इस चीज को कौन समझ सकता है, जिन्हें हर खरीददारी में मोल-भाव करना बहुत पसंद है. फल-सब्जियां हों, माणिक-रत्न या सोना हो, बंदूकें या भाड़े के हत्यारे ही क्यों न हो! विलुप्त प्रजाति के तोते सेंट क्रॉइक्स मकॉ से लेकर क्रिस्टल मेथ (मादक पदार्थ), जो हिटलर की एकमात्र लत थी, तक हर चीज खरीदी जा सकती है. रेनॉइर की पेंटिंग से लेकर बेरेटा का चमचमाता रिवॉल्वर, आप मांगिए तो सही, सबकुछ मिलेगा.

हमारे बाजार तो पहले से ही लुभावने रहे हैं और अब तो उन्होंने विशाल रूप ले लिया है. अब ब्रांड के लोगो छपे बड़े-बड़े प्लास्टिक बैग लेकर घूमने में कोई संकोच नहीं करता. युवा युगल अब घर पर खाना पकाते बैठने की बजाय बाहर से खाना मंगवा लेते हैं. पिज्जा उतना ही लोकप्रिय है, जितना मसाला डोसा. अब रिटेल का जमाना है. सारे बड़े रिटेलर मैदान में उतर चुके हैं. कुछ अपने ब्रांड लेकर आए हैं तो कुछ ने फ्रेंचाइजी ली है. अब तो बेचारे वडा पाव को भी ब्रांड बनाने के प्रयास चल रहे हैं. पिछले हफ्ते मैंने विटामिन वॉटर समझकर एक बोतल का ऑर्डर दिया, पता चला कि यह तो नींबू पानी है.

यह सब बहुत ही अद्‌भुत है और हर कोई काफी पैसा कमा रहा था जब तक कि टेक्नोलॉजी क्षेत्र के कुछ युवा ऑनलाइन शॉपिंग का आइडिया नहीं ले आए. शुरू में हर किसी ने इसे हंसकर खारिज कर दिया. बिना हाथ लगाकर देखे, महसूस किए और मोल-भाव किए कौन खरीदेगा? लेकिन ये टेक्नोलॉजी वाले बंदे भी कम खुदा नहीं थे. एक तो उन्होंने प्रोडक्ट चुनने के लिए इतनी बड़ी रेंज सामने रख दी कि आकर्षण से बचना मुश्किल हो गया और फिर कीमत पर डिस्काउंट इतना कि मोल-भाव की जरूरत ही नहीं बची. अब आपके फोन या लैप टॉप पर पूरा मॉल हाजिर है. भयानक ट्रैफिक का सामना करने की बजाय ऑनलाइन शापिंग लुत्फ उठाने की चीज हो गई. आप को ऑनलाइन कुछ भी मिल सकता है, फिर चाहे आउट ऑफ प्रिंट किताब हो या कोई फैशनेबल अंतर्वस्त्र.

तीन साल होते-होते तो हर कोई लॉग-इन करने लगा. जल्द ही उन्हें पता चल गया कि इस खरीद में उनके क्रेडिट कार्ड जोखिम में नहीं पड़ते. घर से कोई भी सामान मंगाओ और पैसे तब दो जब चीज घर पहुंच जाए. चीज देखे बगैर भुगतान करने की कोई जरूरत नहीं. इतना ही नहीं यदि चीज पसंद नहीं आए तो आप लौटा भी सकते हैं. रिफंड आसान, डिलेवरी भी बड़ी तेज. ये सारी बातें जंगल की आग की तरह फैलने लगी. जल्द ही गृहिणियां ऑनलाइन हो गईं. खुद शॉपिंग करने लगीं. समय, पैसे, मेहनत और पेट्रोल-डीजल की बचत तो है ही, इससे महिलाओं को इच्छा से मन-मुताबिक वक्त में खरीदी का हक मिल गया.

निवेशकों को भी ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स पसंद आने लगीं, उनमें से कुछ मुनाफा न कमाने के बावजूद तेजी से बढ़ीं और उन्होंने ग्राहकों की पूरी नई पीढ़ी का दिल जीत लिया. वह पीढ़ी, जिसके पास समय की कमी है और जिसे बटन के क्लिक पर चुनाव के लिए ढेर सारे विकल्प चाहिए. यही चलन अन्य व्यवसायों में भी होने लगा. आप मूवी टिकट ऑनलाइन खरीदने लगे. ऑनलाइन रैंकिंग देखकर रेस्तरां पसंद किए जाने लगे.

ऑनलाइन दुल्हनें खोजी जाने लगीं. हवाई जहाज के टिकट और होटलें ऑनलाइन बुक होने लगे. आप अपनी पुरानी कार ऑनलाइन बेच सकते हैं. आप अपना कोलोन या जिओमी एमआई3 ऑनलाइन क्यों नहीं खरीदेंगे?

फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, अमेजन, म्यांत्रा के नाम घर-घर पहुंच गए. वे अरबों डॉलरों की कंपनियां बन गईं. आर्थिक अखबार उनकी लगातार चर्चा करते. निवेशक उनका पीछा करते. इससे खेरची व्यापार की परंपरागत कंपनियां खफा हो गईं. मॉल में रौनक कम होने लगी. स्टोर बंद होने लगे. फिर वे हमेशा की तरह अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने लगे. पुराने कानून खोदकर निकाले गए. स्थानीय कर के मुद्‌दे उठाए जाने लगे. फिर पुराना आलाप लौट आया- किराने की दुकानें कहां जाएंगी? रोजगार कम हो जाएगा. वॉलमार्ट और आइकिया को विलैन की तरह बताया जाने लगा, लेकिन बरसों से लूटा जाता रहा भारतीय उपभोक्ता इन सब बातों में आने से इनकार कर रहा है. फिर नई दलील आई. सरकार को रिटेलर्स को लागत से कम कीमत पर बेचने से रोकना चाहिए. क्यों भाई? यदि कोई लागत से कम पर बेचना चाहता है तो यह उसका व्यवसाय है. आपको मंजूर नहीं है तो आप मत खरीदिए. और कहीं जाइए, 40 फीसदी ज्यादा कीमत चुकाइए.

हां, फ्लिपकार्ट की हाल की सेल फ्लॉप रही. यह इसलिए फ्लॉप हुई, क्योंकि इसे ठीक से मैनेज नहीं किया गया था. इसकी लॉजिस्टिक और टेक्नोलॉजी गड़बड़ा गई. कोई भी सेल फ्लॉप हो सकती है. यह कोई अपराध नहीं है. यह कमजोर प्रदर्शन था और फ्लिपकॉर्ट को इसकी कीमत चुकानी पड़ी. इसके कई वफादार ग्राहक दूसरी जगह चले गए. और ठीक ऐसा ही होना भी चाहिए. सरकार नहीं ग्राहक रिटेलर को पुरस्कृत या दंडित करे. सरकार को इस सबसे दूर ही रहना चाहिए.

बाजार के हवाले विजेता का फैसला हो. फिर चाहे यह ऑनलाइन वाले युवाओं को तरजीह देना चाहता हों, जिनके पास बाजार का बहुत छोटा-सा हिस्सा है या उन बड़ी कंपनियों के साथ रहना चाहता हो, जो परंपरागत रूप से रिटेल को कंट्रोल करती रही हैं? इस संघर्ष में मेरा और आपका फायदा है. बाजार में धीरे-धीरे वास्तविक कीमतें लौट रही हैं. बिचौलिए बाहर हो रहे हैं. किराया नीचे आ रहा है. ऐसा लगता है कि बाजार जल्दी ही अपना वास्तविक स्वरूप हासिल कर लेगा.

21.10.2014, 11.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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