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ना लव ना जेहाद, सिर्फ फसाद

विचार

 

ना लव ना जेहाद, सिर्फ फसाद

रघु ठाकुर


अगस्त माह में देश का मीडिया लगभग ’’लव जेहाद’’ को समर्पित रहा. कभी रॉंची की घटना कभी ग्वालियर की घटना. अचानक कुछ घटनाओं का उद्घाटन हुआ और कुछ इस ढंग से घटनाओं की प्रस्तुति हुई कि देश में सबसे बड़ी समस्या लव जेहाद ही है. 

संसद


भाजपा के कतिपय मंत्रियों और नेताओं ने विशेषतः महंत आदित्यनाथ ने तो इसे अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बना लिया और इस प्रचार के बहाव में केरल के मुख्यमंत्री श्री ओमान चांडी भी चाहे अनचाहे शामिल हो गये. जब उन्होने केरल में भी ऐंसे विवाहों की संख्या बताई जिनमे विवाह के कारण धर्म परिवर्तन हुआ. समूचे देश में लगभग 2 हजार ऐसे विवाहों का जिक्र आया जिसमें 261 विवाह केरल के थे. यहॉं तक कि देश के गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह ने यह बयान देकर कि मेरी समझ में नही आता कि लव जेहाद क्या है, बहस को हल्का करने का प्रयास किया है.

’’लव जेहाद’’ शब्द की खोज लगता है कि किसी योजना के तहत ही की गई वरना इस शब्द का अपने आप में कोई अर्थ नही होता. इस्लाम मजहब के अनुसार जेहाद किसी अनुचित चीज के विरूद्ध विद्रोह करना या संघर्ष करना है और लव अंग्रेजी का शब्द है जिसका अर्थ है प्रेम, कुल मिलाकर यह दो बेमेल शब्दों को शब्द था जो प्रचार तंत्र ने अपनी प्रचार क्षमता के माध्यम से ठीक उसी प्रकार प्रचारित कर दिया जिस प्रकार खाप पंचायतों के द्वारा अंर्तजातीय विवाहों के कारण की गई हत्याओं को ’’आनर किलिंग’’ का नाम दिया गया था.

यह एक तथ्य है कि आमतौर पर मुस्लिम समाज यह मानता है कि उनके मजहब के अनुसार केवल मजहब के मानने वालों में ही शादी हो सकती है और इसीलिये दो युवक - युवतियों के प्रेम जिनमे लड़की - लड़के में से कोई एक मुसलमान होता है, इस्लामिक कानून या परम्परायें अंर्तधर्मीय शादी की अनुमति नही देती. मेरे एक परिचित और शुभचिंतक इमाम साहब है जो मस्जिद में नमाज पढ़ाते हैं और काजी भी है और निकाह भी कराते हैं. उन्होने एक दिन आकर मुझ से कहा कि मेरे पास एक मुस्लिम लड़का और हिन्दु लड़की निकाह पढ़वाने आये थे, मैने लड़की से पूछा कि तुमने कहीं शादी की खातिर या भोग विलास के लिये धर्म परिवर्तन तो नही किया और उस लड़की से कुछ इस्लामिक मजहब के बारे में सवाल पूंछे, लड़की ने ठीक उत्तर दिये और उससे ऐंसा महसूस हुआ कि उसे इस्लाम का ज्ञान है और वह इस्लाम को समझ बूझकर कबूल कर रही है, तब मैने उनका निकाह कराया.

इस पर मैने इमाम साहब से दो प्रश्न पूछे, एक, यह कि उस लड़की ने निकाह के लिये आते समय ही इस्लाम कबूल क्यों किया ? अगर उसे इस्लाम मजहब पसंद था तो वह निकाह पढ़ाने आने के पहले भी इस्लाम कबूल कर सकती थी और दूसरे, शादी दो व्यक्तियों मे होती है न कि धर्मों में, तो फिर शादी के लिये धर्म परिवर्तन जरूरी क्यों है ? उन्होने उत्तर दिया कि यह हमारे इस्लाम का कानून है और उसके अनुसार इस्लाम के मानने वालों को यह जरूरी है कि वे एक ही मजहब को मानने वाले से ही शादी करे.

मैने उनसे पूछा कि अकबर और जोधाबाई, रूपमती और बाज बहादुर की शादी हुई परन्तु इतिहास के किसी भी पन्ने में या दस्तावेज में जोधाबाई या रूपमती के धर्म परिवर्तन या इस्लाम स्वीकार करने की जानकारी नही है बल्कि इतिहास यह बताता है कि अकबर और बाज बहादुर मुसलमान रहे और जोधाबाई और रूपमती हिन्दु रही, उन्होने कोई धर्म परिवर्तन नही कराया तो इमाम साहब ने उत्तर दिया कि यह नवाब लोग थे, उन्हे कोई क्या कहता. मैने उनसे प्रतिप्रश्न किया कि फिर क्या इस्लामिक कानून केवल जनता के लिये है, बादशाहों के लिये नही. इसके बाद मैने उन्हे जस्टिस हिदायतउल्ला जिनकी पत्नि बंगाली ब्राम्हण थी, श्री आमिर खान और श्रीमति किरण राव, श्री शाहरूख खान और श्रीमति गौरी का उदाहरण दिया, जहॉं पति मुस्लिम है और पत्नि हिन्दु और उन्होने विवाह के लिये कोई धर्म परिवर्तन नही किया तथा उन्हे भी मुस्लिम समाज ने अस्वीकार नही किया. इमाम साहब के पास इसका कोई उत्तर नही था.
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