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मोदी सरकार का असली एजेंडा

समाज

 

मोदी सरकार का असली एजेंडा

राम पुनियानी


हालिया चुनाव में भाजपा की भारी जीत के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि मोदी के नेतृत्व वाली सरकार, सबसे पहले जनता से जुड़े उन मुद्दों पर ध्यान देगी जिनके कारण वह सत्ता पर काबिज हो सकी है. परंतु नई सरकार की 100 दिन की हनीमून अवधि पूरी होने के पहले ही यह साफ हो गया है कि आमजनों से जुड़े मुद्दे सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं हैं. बजट और ब्रिक्स शिखर बैठक की बैनर हैडलाईनें और सुशासन व अर्थव्यवस्था में मूलभूत सुधार के नारे सब को दिखाई और सुनाई पड़ रहे हैं. परंतु पर्दे के पीछे से मोदी और उनकी टीम यह स्पष्ट संकेत दे रही है कि उनका असली एजेण्डा भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक स्वरूप को रूपांतरित करना है.

मोदी


लोमोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता में आने के पीछे कई कारक व व्यक्तित्व थे. इनमें शामिल थी धार्मिक धु्रवीकरण की प्रक्रिया, जिसकी शुरूआत सन् 2002 के गुजरात कत्लेआम से हुई और जो सन् 2013 के मुजफनगर (उत्तरप्रदेश) दंगों तक जारी रही. इसके अतिरिक्त, कारपोरेट घरानों ने मोदी का खुलकर समर्थन किया. मोदी ने गुजरात में बड़े औद्योगिक समूहों को मनमानी करने की खुली छूट दे दी थी और सन् 2007 से ही मोदी द्वारा उपकृत औद्योगिक घरानों ने यह अनवरत जाप प्रारंभ कर दिया था कि मोदी को ही देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए.

गुजरात के विकास का मिथक, मीडिया मैनेजमेंट और सत्ताधारी कांग्रेस की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाने में सफलता ने भी मोदी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. परंतु इन सब कारकों के बावजूद भी मोदी यह चुनाव नहीं जीत पाते यदि उन्हें सात लाख से अधिक आरएसएस कार्यकर्ताओं का समर्पित सहयोग न मिला होता. मोदी के नेतृत्व वाली सरकार और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा- दोनों को यह पता है कि आरएसएस के बिना सफलता असंभव होती. और अब, पितृसंगठन आरएसएस, अपने सहयोग की कीमत वसूलने पर आमादा है.

सन् 1999 में जब भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनी थी तब उसके पास लोकसभा में सामान्य बहुमत भी नहीं था. इस कारण भाजपा ने अपने हिंदुत्व एजेण्डे को अस्थायी तौर पर त्याग दिया था. इस एजेण्डे में शामिल हैं समान नागरिक संहिता, बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर का निर्माण और संविधान के अनुच्छेद 370 की समाप्ति. अब भाजपा के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है और कोई कारण नहीं कि वह अपने हिंदुत्व एजेण्डे को लागू न करे.

मोदी की एकाधिकारवादी मानसिकता अभी से सामने आ रही है. विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों से कहा गया है कि वे सीधे उन्हें रिपोर्ट करें और मोदी ने अपनी अनुपस्थिति में केबिनेट की बैठक आयोजित करने की मनाही कर दी है. जाहिर है कि यह प्रधानमंत्री के हाथों में सत्ता के केंद्रीयकरण की प्रक्रिया की शुरूआत है.

आरएसएस-भाजपा-मोदी सरकार का अंतिम उद्देश्य, भारतीय संविधान के प्रजातांत्रिक मूल्यों, जिनके कारण जातिगत व लैंगिक सामाजिक रिश्तों में बदलाव संभव हो सका है, को कुचलकर, देश में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना है.

अच्छे दिन
भाजपा के सफल चुनाव अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था ‘‘अच्छे दिन’’ लाने का वायदा. आमजन, बढ़ती कीमतों से परेशान थे और भाजपा ने उन्हें यह सपना दिखाया कि मोदी के नेतृत्व में उनके अच्छे दिन आयेंगे. परंतु मोदी के सत्ता में आने के बाद भी कीमतों का बढ़ना बदस्तूर जारी है और इस कारण मोदी सरकार से कुछ हद तक लोगों का मोहभंग भी हुआ है. ऐसा लगने लगा है कि निरंतर प्रचार के जरिए जो बड़ी-बड़ी आशाएं लोगों के मन में जगाई गई हैं, वे आशाएं ही रहेंगी-यथार्थ नहीं बनेंगी.

कुछ लोग कहते हैं कि अभी मोदी सरकार की कार्यक्षमता व कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करना बहुत जल्दबाजी होगी. परंतु यह सरकार देश को किस दिशा में ले जाना चाहती है, यह अभी से स्पष्ट हो रहा है. खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा एक झटके में 26 से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दी गई है. यही भाजपा जब विपक्ष में थी, तब वह खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का कड़ा विरोध करती थी. स्पष्टतः यह निर्णय अवसरवादी राजनीति का उदाहरण है.

ऐसी आशंका है कि नई सरकार सार्वजनिक क्षेत्र का बड़े पैमाने पर निजीकरण करने का प्रयास भी करेगी. हाल ही में संशोधित भू-अधिग्रहण अधिनियम में कुछ और संशोधन प्रस्तावित हैं और इन से किसानों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. वर्तमान में यह प्रावधान है कि किसानों के बहुमत की स्वीकृति के बगैर, भू-अधिग्रहण नहीं किया जा सकता. इस प्रावधान को समाप्त करने की कवायद चल रही है.

संप्रदायवादी सोच
कई बार हम कुछ बोलकर अपनी बात दूसरों तक पहुंचाते हैं और कई बार चुप रहकर. पुणे के आईटी उद्योग में कार्यरत मोहसिन शेख की हत्या, जिसके लिए तथाकथित तौर पर हिन्दू जागरण सेना को जिम्मेदार बतलाया जा रहा है, समाज का सांप्रदायिकीकरण करने के योजनाबद्ध प्रयास का हिस्सा है. उत्तरप्रदेश के सहारनपुर, रामपुर और कुछ अन्य हिस्सों में हुई हिंसा और मध्यप्रदेश के कुछ भागों में भड़के दंगे यह बताते हैं कि जिन भी राज्यों में विधानसभा के चुनाव या उपचुनाव होने वाले हैं, वहां समाज का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है. प्रधानमंत्री इन सब मुद्दों पर चुप हैं और इससे जनता में कोई बहुत अच्छा संदेश नहीं जा रहा है.

देश भर में हुई कई घटनाएं, मोदी सरकार के असली एजेण्डे की ओर इशारा कर रही हैं. नई सरकार की कार्यप्रणाली का एक कुटिलतापूर्ण पक्ष यह है कि विशाल संघ परिवार के अलग-अलग सदस्य, अलग-अलग भाषा में अलग-अलग बातें कर रहे हैं. परंतु वे सभी असल में इस सरकार के कट्टर समर्थक हैं. उदाहरणार्थ, जब टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा को नवगठित तेलंगाना राज्य का ब्रांड एम्बेसेडर नियुक्त किया गया तब एक स्थानीय भाजपा नेता ने उन्हें ‘‘पाकिस्तान की बहू’’ बताया जबकि एक केन्द्रीय मंत्री ने उन्हें ‘‘देश के गौरव’’ की संज्ञा दी. यह समझना भूल होगी कि ये परस्पर विरोधी बातें, संघ परिवार में किसी प्रकार की मतविभिन्नता की ओर इशारा करती हैं. सच यह है कि संघ परिवार के सभी सदस्यों का असली उद्देश्य एक ही है.
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