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मुसलमानों की बदलती राजनीतिक लामबंदी

विचार

 

मुसलमानों की बदलती राजनीति लामबंदी
इरफान इंजीनियर

 

मुसलमान

भाग - 1

स्वतंत्रता के बाद से, भारत में, राजनीतिज्ञों ने मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए पारंपरिक रूप से मुख्यतः तीन श्रेणियों के मुद्दों का उपयोग किया है-सुरक्षा, धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान व मुसलमानों को देश की समृद्धि में उनका वाजिब हक दिलवाना. हाल में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में आल इंडिया मजलिस-इत्तिहादुल-मुसलमीन के उम्मीदवारों की विजय ने यह साबित किया है कि एक चौथे मुद्दे का उपयोग भी मुस्लिम मतों को पाने के लिए किया जा सकता है और वह है, हिन्दू राष्ट्रवादियों का मुकाबला करने के लिए धार्मिक आधार पर एक होना. अलग-अलग समय पर इन मुद्दों का उपयोग, बदलती हुई रणनीतियों के तहत किया जाता रहा है. ये हैं 1. चुनावी राजनीति से दूरी बनाना 2. उन राजनैतिक पार्टियों की सदस्यता लेना, जिनमें मुसलमानों का बहुमत नहीं है व 3. मुसलमानों की अपनी राजनैतिक पार्टियां बनाना. 

राजनैतिक रणनीतियां

पाकिस्तान में बसने के लिए भारत छोड़ने से पहले, मौलाना मौदूदी ने कहा था कि यदि भारत के मुसलमान अपने अधिकारों पर जोर देंगे तो उनके प्रति हिन्दुओं का पूर्वाग्रह बढ़ेगा. अतः, उनकी यह सलाह थी कि मुसलमानों को सरकार और प्रशासन से दूर ही रहना चाहिए ताकि हिन्दू राष्ट्रवादी आश्वस्त रहें कि उनके मुकाबिल मुस्लिम राष्ट्रवादी ताकतें लामबंद नहीं हो रही हैं. मौलाना के अनुसार, यही वह एकमात्र रास्ता था जिसके जरिए मुसलमान, इस्लाम के संबंध में बहुसंख्यक समुदाय के पूर्वाग्रहों को दूर करने में सफल हो सकते थे. साम्प्रदायिक राष्ट्रवादियों की दृष्टि में समाज में या तो किसी सम्प्रदाय का वर्चस्व हो सकता है या वह पराधीन हो सकता है. उन्हें बीच का यह रास्ता दिखता ही नहीं है कि दो समुदायों के सदस्य, मिलजुलकर, शांतिपूर्वक रह भी सकते हैं. यही समस्या मौलाना मौदूदी के साथ थी. मौलान मौदूदी के पाकिस्तान जाने के बाद, उनके द्वारा स्थापित जमायते इस्लामी ने चुनावी राजनीति में भाग नहीं लिया. परंतु मौलाना की सलाह उन मुसलमानों के लिए किसी काम की नहीं थी जो कि अपनी रोजाना की जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगे हुए थे.

देवबंदी उलेमाओं के संगठन जमायत उलेमा-ए-हिन्द ने हमेशा पाकिस्तान का विरोध किया. जमात ने कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन का इस उम्मीद में समर्थन किया कि स्वाधीन भारत में मुसलमानों को उनके धर्म का पालन करने की आजादी होगी और उनके पर्सनल लॉ से कोई छेड़छाड़ नहीं की जायेगी. जमायत का यह मानना था कि मुस्लिम सांस्कृतिक पहचान के लिए, गैर-मुस्लिम साथी देशवासी उतना बड़ा खतरा नहीं हैं जितने कि अंग्रेज. कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद में आस्था ने जमायत को यह विश्वास करने का और मजबूत आधार दिया. राजनैतिक व्यवस्था में मुस्लिम समुदाय को उसका वाजिब हिस्सा दिलवाने में जमायत की कोई रूचि नहीं थी. उसकी रूचि केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ को संरक्षित रखने में थी. दूसरी ओर, जिन्ना और अन्य मुस्लिम राष्ट्रवादियों का लक्ष्य मुसलमानों को सत्ता में उनका वाजिब हक दिलवाना था और वे आधुनिक विचारों का स्वागत करते थे. जहां देवबंदी उलेमा मुसलमानों की एक विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान बनाना और उसकी रक्षा के लिए समुदाय को एक रखना चाहते थे, वहीं जिन्ना और मुस्लिम राष्ट्रवादी, मुसलमानों को एक अलग राजनैतिक समुदाय और अलग राष्ट्र मानते थे.

भारत के स्वतंत्र होने के बाद, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आजाद जैसे लोगों के सत्तासीन होने के कारण मुसलमान अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त थे. वैसे भी, विभाजन के दौर में हुए दंगे शांत होने के बाद से, सुरक्षा, मुस्लिम नेताओं के लिए चिंता का कोई बड़ा मुद्दा नहीं थी. उस समय जोर इस बात पर था कि अल्पसंख्यक तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब उन्हें बहुसंख्यकों का सद्भाव हासिल हो. जो मुसलमान भारत में रह गए थे उनमें मुख्यतः कारीगर, मजदूर, भूमिहीन किसान और पिछड़ी जातियां थीं और उनके लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि वे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में अपने वाजिब हिस्से की मांग उठा सकते हैं. जमायत और मुस्लिम राजनैतिक नेताओं ने मुसलमानों को उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे को लेकर कांग्रेस का साथ देने के लिए राजी कर लिया. इस मुद्दे के तीन भाग थे-पहला यह कि भारतीय राज्य, मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप नहीं करेगा, दूसरा, उर्दू भाषा को प्रोत्साहन देने के प्रयास किए जाएंगे और तीसरा, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी. सन 1990 के दशक में इस सूची में एक और मुद्दा जुड़ गया और वह था बाबरी मस्जिद की रक्षा का-जिसे अंततः सन् 1992 में ढ़हा दिया गया.
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