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पौराणिक कथाओं का जादूभरा संसार

विचार

 

पौराणिक कथाओं का जादूभरा संसार

राम पुनियानी


बचपन में जो चीजें मुझे सबसे अच्छी लगती थीं उनमें से एक थी पौराणिक कथाएं सुनना. मैं उस दुनिया में खो जाता था जिसमें भगवान हनुमान अपनी श्रद्धा के पात्र श्रीराम के भाई लक्ष्मण की जान बचाने के लिए हवा में उड़कर जड़ीबूटी लेने जाते हैं भगवान राम पुष्पक विमान में यात्रा करते हैं और जब भगवान गणेश के पिता उनका सिर काट देते हैं तब उनके धड़ पर हाथी का सिर लगाकर उन्हें पुनर्जीवित किया जाता है. इन सब बातों पर मैं कोई प्रश्न नहीं उठाता था.

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मैं आसानी से यह स्वीकार कर लेता था कि कर्ण अपनी माँ के कान से पैदा हुआ था और गांधारी के गर्भ से निकले पिंड को सौ भागों में बांटकर सुरक्षित रख देने से कौरव पैदा हुए थे. ये सभी कल्पनाएं इतनी रंगीन और मन को लुभाने वाली थीं कि उन पर शंका करने का मेरा कभी मन ही नहीं हुआ. मैं जब बड़ा हुआ तो विज्ञान से मेरा साबका पड़ा. और फिर करीब एक दशक तक मैं मेडिकल कॉलेज की कठिन पढ़ाई से गुजरा.

इस नये ज्ञान ने मुझे मेरे पौराणिक नायकों की कथाओं पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया. शनैः शनैः मुझे यह समझ में आया कि तथ्य और फंतासी इतिहास और पुराण अलग.अलग चीजें हैं. उस कल्पना की सुंदरता और उन कथाओं की मनमोहकता अब भी मेरे हृदय के किसी कोने में जीवित है परंतु वह मेरी दुनियावी सोच व समझ की निर्धारक नहीं है.

मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मुझे यह समझ में आया कि मानव शरीर कितना जटिल है. हम रक्त समूहों शरीर की प्रतिरक्षा प्रणालियों ऊतकविकृतिविज्ञान व जैवअनुकूलन आदि के बारे में जानते हैं. अगर हम भगवान गणेश के हाथी के सिर वाली कथा पर तार्किकता से विचार करें तो हम कई प्रश्नों से घिर जाएंगे. अगर किसी का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया जाए तो वह कितने मिनिट जीवित रह सकता है सिर में ही मस्तिष्क होता है जो हमारे शरीर की सारी गतिविधियों जिनमें श्वसन और दिल का धड़कना शामिल है को नियंत्रित करता है.

प्रश्न यह है कि कोई व्यक्ति जिसका सिर काट दिया गया हो कितने वक्त तक अपने कटे हुए अंग के प्रत्यारोपण का इंतजार कर सकता है और वह भी हाथी के सिर का. मनुष्य और हाथी के शरीर की प्रतिरक्षा प्रणालियों में क्या अंतर हैं एक मनुष्य की किडनी के दूसरे मनुष्य में प्रत्यारोपण के पहले सैंकड़ों टेस्ट किए जाते हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि दानदाता की किडनी को प्राप्तकर्ता का शरीर स्वीकार करेगा या नहीं. मोदी के अनुसार प्राचीन भारत में अंग प्रत्यारोपण की ऐसी तकनीक उपलब्ध थी जो आज भी विज्ञान हमें सुलभ नहीं करा सका है.

गर्भ से निकले हुए पिंड को क्या सौ भागों में विभाजित किया जा सकता है निषेचित डिंब ;फर्टिलाईज्ड ओवमद्ध को सौ भागों में विभाजित करने के लिए कितने उच्च दर्जे की माइक्रोसर्जरी की आवश्यकता पड़ेगी क्या गर्भाशय कान के पास हो सकता है मुझे यह पक्का विश्वास है कि ये सारे प्रश्न उन डाक्टरों के दिमाग में आ होंगे जिन्हें उनके अस्पताल के उदघाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री का भाषण सुनने का सौभाग्य मिला. उन्होंने अपने भाषण में कहा हमारे देश ने एक समय चिकित्साशास्त्र में जो उपलब्धियां हासिल की थीं उन पर हम गर्व महसूस कर सकते हैं.

हम सबने महाभारत में कर्ण के बारे में पढ़ा है. अगर हम थोड़ी गहराई से सोचें तो हमें यह समझ में आएगा कि कर्ण अपनी मां के गर्भ से पैदा नहीं हुआ था. इसका अर्थ यह है कि उस समय अनुवांशिकी विज्ञान था. तभी कर्ण अपनी मां के गर्भ के बाहर जन्म ले सका. हम सब भगवान गणेश की पूजा करते हैं. उस समय कोई न कोई प्लास्टिक सर्जन रहा होगा जिसने मानव शरीर पर हाथी का सिर फिट कर दिया और प्लास्टिक सर्जरी की शुरूआत की.

मुझे उम्मीद है कि जिस अस्पताल का उदघाटन प्रधानमंत्री ने किया वहां के डाक्टरों का इस तरह की चमत्कारिक शल्य चिकित्सा करने का इरादा नहीं है और वे मनुष्य के धड़ पर जानवरों के सिर लगाने व निषेचित डिंब को सौ टुकड़ों में बांटने जैसे अभिनव प्रयोग नहीं करेंगे. इस देश में कई ऐसे लोग होंगे जो प्रधानमंत्री द्वारा भारत के अतीत का महिमामंडन करने से बहुत प्रसन्न हुए होंगे. प्रधानमंत्री चाहे जो भी कहें या सोचें सत्य यही है कि प्राचीन भारत पशुपालक समाज रहा होगा या उसमें खेतीबाड़ी की शुरूआत भर हुई होगी. मनुष्य ने आखेट कर अपना पेट भरना बंद किया ही होगा. जाहिर है कि तथ्य प्रधानमंत्री की सोच से मेल नहीं खाते.
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