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असफलताएं छुपाती उत्सवधर्मी सरकार

विचार

 

असफलताएं छुपाती उत्सवधर्मी सरकारें

रघु ठाकुर


1 नबंवर म. प्र. की स्थापना का दिवस है तथा 1 नबंवर ही म. प्र. के विभाजन का दिवस है. याने 1 नबंवर 2000 को म. प्र. को विभाजित कर छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना हुई थी. छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद, छत्तीसगढ़ व म. प्र. की स्थितियॉं, विशेषतः आर्थिक स्थितियॉं कैंसी हैं, यह किसी से छिपा नही है.

शिवराज सिंह चौहान


कुपरन्तु आखिर छत्तीसगढ़ के लोगों ने विभाजन को स्वीकृति दी, कम या ज्यादा मुहिम चलाई तो इस अलगाव के कुछ तो कारण रहे ही होंगे. कहीं न कहीं वे म. प्र. सरकार के कामकाज से संतुष्ट नही थे. या उनके मन में क्षेत्रीय विषमता और शोषण को लेकर असंतोष था. हालांकि एक पक्ष यह भी है कि संपन्न - ताकतवर और वाचाल तबका मीडिया के सहारे किसी मुद्दे के पक्ष में वातावरण बना देता है तथा अक्सर लोग उस बहाव में बह जाते हैं.

बहरहाल इस 1 नबंवर 2014 को म. प्र. में राज्य स्थापना का उत्सव जोर शोर से मनाया गया. मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र की टिप्पणी बड़ी सटीक है - मैने उनसे पूछा कि सरकार के बारे में आपकी राय क्या है तो उन्होने उत्तर दिया ’’ यह उत्सवधर्मी ’’ सरकार है जो निरंतर कोई न कोई उत्सव मनाकर लोगों का मन बहलाये रखती है तथा लोगों को गुमराह भी करती है.

भोपाल के लाल परेड मैदान पर भारी रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन हुआ जिसमे फिल्म संगीत निर्देशक विशाल और शेखर की मौजूदगी थी. बेशक ऐसे भव्य आयोजनों पर करोड़ों रूप्ये तो खर्च हुये ही होंगे. एक तरफ मुख्यमंत्री व माननीय मंत्रीगण इस जश्न का लुत्फ उठा रहे थे, वहीं, समाचार पत्रों में राजधानी में फैल रहे डेंगू के समाचार भी छप रहे थे. राजधानी भोपाल में डेंगू से अनेकों ( अपुष्ट समाचारों के अनुसार 13 मौतें ) हो चुकी है तथा सरकार के डेंगू नियंत्रण के सारे दावों को झुठलाते हुये डेंगू भोपाल के बड़े इलाके में पैर फैला चुका है. लगभग 500 स्थानों पर डेंगू मच्छरों का लार्वा मिल चुका है. यहॉं तक कि अस्पताल के चिकित्सक तथा कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भी इसके शिकार हो चुके है.

इस डेंगू के प्रसार और कहर के दो मुख्य कारण नजर आते है, एक, साफ सफाई की कमी और दूसरा, स्वास्थ्य सेवाओं की बदतर स्थिति. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 2 अक्टूबर को महात्मा गॉंधी के जन्म दिवस पर देश में ’’ स्वच्छ भारत ’’ अभियान शुरू किया था. परन्तु वह केवल तथाकथित सेलिब्रटी याने धनपति - बलपति - सत्तापति और नृत्यगानपतियों ( अभिनेताओं ) तक सीमित है.

भा. ज. पा. सरकारें, श्री मोदी के भय से भयभीत होकर झाड़ू लगाकर फोटो तो खिंचवा रही है परन्तु वास्तव में यह स्वच्छ भारत अभियान कोई विशेष प्रेरणा नही दे सका. न जनता और न सरकारें, न जनप्रतिनिधि और न नौकरशाह, कोई भी इसे अपना लक्ष्य मानकर नही चल रहा है. शायद इसीलिये भी कि लोगों को यह सरकारी अभियान राजनीति प्रेरित ज्यादा लगा तथा लक्ष्य के प्रति अप्रतिबद्ध नेताओं ने इसे भी उत्सवधर्मिता में बदल दिया. दूसरे समाज में हर कार्य को सरकार से कराने की अपेक्षा इतनी गहरी हो चुकी है कि उसके मन पर कोई विशेष हलचल श्री मोदी का यह अभियान शुरू नही कर सका.

श्री मोदी का सूचना तंत्र कितना कमजोर व छद्म है, वह उनकी 02/11/2014 को विभिन्न संचार माध्यमों से की गई ``मन की बात'' चर्चा से समझा जा सकता है. उन्होने सतना के किसी मित्र के संदेश का उल्लेख किया कि रेल के डिब्बे में यात्रियों ने कचरा एक तरफ डाला. मैं, उनके साथ उस डिब्बे में नही था अतः मैं उनके दावे को चुनौती नही दे सकता परन्तु मैं, महीने में 20 - 25 दिन प्रवास पर रहता हूं तथा मुझे न तो यात्री गाड़ियों में सफाई दिखी न ही कोई कचरा न फेंकने की जन चेतना. परन्तु श्री मोदी एक सूचना के आधार पर अपने लक्ष्य को सफल मान रहे हैं तो यह उनकी खुशफहमी हो सकती है परन्तु तथ्य यह तो नही है.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दिवाली के अगले दिन याने 24 - 25 अक्टूबर को रायपुर से प्रकाशित होने वाले लगभग सभी समाचार पत्रों में कचरों के ढेरों के ढेर सारे फोटो छपे है. स्थानीय निवासियों के रोते फोटो व बयान भी छपे है परन्तु प्रधानमंत्री को न तो यह दिखता है और शायद न ही उन्हे देखने की आवश्यकता है. वे हर विचार को केवल बेंचने में विश्वास करते है. जो फिल्म अभिनेता - उद्योगपति - राजनेता आदि उनके स्वच्छता अभियान से जुड़े है उनके घरों में सफाई कौन कर रहा है ? जरा उसका अध्ययन वे कराये.

श्री अंबानी के घर में सफाई के लिये सैंकड़ों कर्मचारी व मशीनें है परन्तु देर रात्रि में मुबई के किसी साफ चौराहे पर वे जाकर फोटो खिंचवाते है तथा सारा मीडिया उसे प्रचारित करता है. आखिर मीडिया के मालिक भी तो यही लोग है इसलिये मीडिया की लाचारी है. हॉं, इतना अवश्य है कि अपनी सरकार बनने के बाद के 4 - 5 माह में उनसे जो लोगो में निराशा हुई है तथा जिन मुद्दों को उन्होने लोकसभा चुनाव में उठाकर वोट मांगा था, उनके प्रति कुछ भी न हो पाने की अपनी असफलता को वे मोड़ने में तथा जनता को भ्रमित करने में सफल हुये हैं.

जिस प्रकार चतुर जेबकट आदमी का ध्यान कहीं और खींचता है फिर जेब काटता है, लगभग वही कार्य श्री मोदी भी कर रहे है. अगर उनका विश्वास सफाई में है तो उन्होने अपनी ही म. प्र. की सरकार से क्यों नही पूंछा कि इतने लोग डेंगू की बीमारी से क्यों पीड़ित हो रहे है ? यह कैंसी व्यवस्था है ?

भाजपा भारतीय संस्कृति की बहुत दुहाई देती है परन्तु भारतीय संस्कृति क्या है ? हमारे देश में यह परंपरा रही है कि अगर गॉंव में किसी एक व्यक्ति के घर कोई शोक हो जाये तो गॉंव वाले जश्न नही मनाते. जब राजधानी में ही लोग डेंगू से मर रहे हैं और सरकार असहाय तो मुख्यमंत्री को बजाये जश्न मनाने के चिकित्सा व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिये था. हालात यह है कि अस्पतालों, मेडीकल कालेजों में न दवा है न जॉंच की समुचित व्यवस्था.

भोपाल के एक खिलाड़ी नवयुवक श्री धर्मेन्द्र ने मुझे बताया कि वे 22/10/2014 को राजधानी के 1250 अस्पताल में बुखार की दवा लेने गये थे. चिकित्सक की परची पर उन्होने खून जॉंच को दिया. चूॅंकि वे एक सामान्य किसान के बेटे है अतः उन्होने अस्पताल के जॉंचकर्ताओं को ही खून का सेंपल दिया. 22/12/2014 से वे लगातार 9 दिन अस्पताल का चक्कर काटते रहे तथा आने जाने पर लगभग 200 रूपया खर्च किया परन्तु उन्हे उनके खून की जॉंच की रिर्पोट नही मिली.

धर्मेन्द्र से कहा गया कि अस्पताल ने खून की जॉंच का ठेका किसी को दे दिया है, उनके पास जाओ. उनका जो पता दिया गया उस पते वाले स्थान पर कोई मिलता नही है. और लाचार होकर उन्होने 1/11/2014 को पुनः जॉंच कराई. अब क्या कोई डेंगू या मलेरिया का बीमार बगैर जॉंच व दवा के 10 - 10 दिन रह सकता है ? पर भोपाल में यही हो रहा है. ऐसी स्थिति लगभग समूचे प्रदेश की है परन्तु प्रदेश की सरकार स्थापना दिवस का जश्न मना रही है. क्या यह जश्न प्रदेश की जनता की मौतों का जश्न नही है ? क्या प्रदेशों का करोड़ो रूपया फिल्मी कलाकारों के जश्न पर खर्च करना तथा अस्पतालों में मरीजों को बगैर जॉंच व दवा के मरने को छोड़ देना यह भारतीय संस्कृति है.

ऐंसा लगता है कि अब सरकारें केवल प्रचार के झूठ पर टिकी है. जनता को झूठ से गुमराह करना, दलालों की तिजोड़ियों भरना व जनधन को बर्बाद करना ही उनकी फितरत हो गई है. झूठ बिक रहा है - परोसा जा रहा है - चल रहा है - छप रहा है, पर कब तक ? परन्तु जनता चुप, हताश व निराश है. देखें वह कब तक अपनी ही मौत के जश्न पर खुश होती रहेगी.

29.11.2014, 10.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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