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मुसलमानों की बदलती राजनीतिक लामबंदी

विचार

 

मुसलमानों की बदलती राजनीति लामबंदी
इरफान इंजीनियर

 

मुसलमान

भाग - 2

पिछले भाग में हमने देखा कि किस तरह स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने मुसलमानों को धार्मिक.सांस्कृतिक मुद्दों पर लामबंद किया. परंतु चूंकि देश का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर हुआ था इसलिए मुसलमानों द्वारा उनकी विशिष्ठ संस्कृति की बात करते ही हिंदू राष्ट्रवादी इस्लामिक राज्य का हौव्वा खड़ा करने लगते थे.

मुसलमानों की धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के प्रयास को ष्हिन्दू संस्कृति पर हमले और उसके अस्तित्व के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता था. इस सब के चलते सन् 1980 के दशक में देश में सांप्रदायिक हिंसा में जबरदस्त तेजी आई. कांग्रेस बाबरी मस्जिद को नहीं बचा सकी और मुसलमानों को लगा कि वह पार्टी उनके धार्मिक.सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा करने में भी असफल है. अतः वे कांग्रेस से दूर होने लगे.

क्षेत्रीय पार्टियों ने सुरक्षा के मुद्दे पर मुसलमानों को अपने पक्ष में लामबंद किया. परंतु वे समुदाय को एकसार मानते रहे एवं इन पार्टियों ने समुदाय की विविधतापूर्ण संस्कृति और उसके अलग.अलग तबकों के विविध हितों पर ध्यान नहीं दिया. सुरक्षा का मतलब सिर्फ यह था कि भविष्य में सांप्रदायिक दंगे नहीं होंगे. परंतु पूर्व में हुई सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए लोगों को न्याय दिलवाने की बात ये पार्टियां नहीं करती थीं और ना ही यह गारंटी देने को तैयार थीं कि हिंसा दोहराई नहीं जाएगी. मोटे तौर परए देश के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में परिद्रश्य कुछ ऐसा ही था.

सुरक्षा के मुद्दे की वापसी

बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद मुसलमानों की संस्कृति और धर्म के ठेकेदार कांग्रेस से दूर हो गए. समुदाय ने शिक्षा और जीवनयापन से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना शुरू कर दिया. ऐसा लगता था कि आगे बढ़ने का यही एक रास्ता है. परंतु गुजरात के सन 2002 के मुस्लिम कत्लेआम के बाद सुरक्षा की चिंता एक बार फिर महत्वपूर्ण बन गई विशेषकर उत्तर भारत में. मुस्लिम मतदाता धीरे.धीरे कांग्रेस की ओर लौटने लगे. जहां सन् 2002 तक हिंदू राष्ट्रवादियों की नीति बड़े और भयावह दंगे कराकर मुसलमानों को निशाना बनाने की थी वहीं 21वीं सदी के पहले दशक में खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल मुसलमानों को निशाना बनाने और उन्हें राष्ट्रद्रोही आतंकवादी और देश का दुश्मन सिद्ध करने के लिए किया जाने लगा.

राजनैतिक संरक्षण प्राप्त गुजरात पुलिस के अधिकारी कभी भी कुछ मुस्लिम युवकों को मार डालते थे और उन्हें ऐसा आतंकी बताते थे जो हिंदू नायक नरेन्द्र मोदी की हत्या करना चाहते थे. खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यवाहियों में सन् 2004 में इशरत जहां और जावेद शैख मारे गए तो 2005 में सोहराबुद्दीन शैख व कौसर बानो 2006 में सोहराबुद्दीन का मित्र तुलसीराम प्रजापति जमाल सादिक और कई अन्य. इन हत्याओं जिन्हें मुठभेड़ बताया जाता था के बाद मीडिया के जरि मुस्लिम समुदाय के चेहरे पर कालिख पोतने की भरपूर कोशिश की जाती थी.

इस तरह की फर्जी मुठभेड़ें कांग्रेस शासन में भी हुईं जिनमें से एक थी बाटला हाउस मुठभेड़. हर आतंकी हमले के बाद.फिर चाहे उसके शिकार मुसलमान ही क्यों न रहे हों.बड़ी संख्या में निर्दोश मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर लिया जाता था. उत्तर भारत में मुसलमान धीरे.धीरे कांग्रेस की तरफ आने लगे विशेषकर उन राज्यों में जहां की राजनीति द्विधुर्वीय थी और कांग्रेस और भाजपा के अतिरिक्त कोई तीसरी शक्ति अस्तित्व में ही नहीं थी. सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में 9 सीटें जीतीं और सन् 2009 में 15.

हालिया चुनाव में कांग्रेस मुसलमानों के केवल एक हिस्से को ही अपनी ओर आकर्षित कर सकी और वह भी धार्मिक.सांस्कृतिक मसलों को लेकर नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा और बेहतरी के वायदों के बल पर. कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के अध्ययन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जिसे सच्चर समिति के नाम से जाना जाता है. सच्चर समिति ने यह पाया कि मुसलमानों की सामाजिक.आर्थिक स्थिति बहुत खराब है और वे अन्य सभी समुदायों से काफी पीछे हैं. कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए प्रधानमंत्री का 15 सूत्रीय कार्यक्रम भी लागू किया परंतु इसे लागू करने में भारी कोताही बरती गई.
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