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आसान हो कर प्रणाली

विचार

 

आसान हो कर प्रणाली

प्रीतीश नंदी


वित्तमंत्री अरुण जेटली ने करों के आतंकवाद को खत्म करने का वादा किया था. उन्होंने माना था कि पिछले व्यवहार पर लगने वाला टैक्स खराब था. कर देने से बचने वालों को न छोड़ने पर जोर देने के बावजूद उन्होंने टैक्स से बचने के तरीकों के खिलाफ लाए गए नियम ‘गार’ की समीक्षा करने की बात कही थी. .

सी सैट


वित्त मंत्री ने वेतनभोगी मध्यवर्ग को उन रियायतों का आश्वासन दिया था, जिसके वे हकदार हैं, क्योंकि वे कमरतोड़ महंगाई और प्रतिशोध लेने वाली कर व्यवस्था के बीच पिस रहे हैं. उन्होंने दूसरी पीढ़ी के बहुत सारे सुधारों का भी आश्वासन दिया था. फिर ज्यादा सोच-विचार किए बिना यह टिप्पणी की थी कि रसोई गैस सिलिंडर पर सब्सिडी उन लोगों के लिए नहीं है, जो इसकी पूरी कीमत चुकाने में सक्षम हैं.

यहां तीन अंतर्निहित वक्तव्य हैं. एक : सरकार यह स्वीकार करती है कि अब तक करदाता के साथ अनुचित व्यवहार होता रहा है. यह ऐसा तथ्य है, जिसे हम जैसे कई लोग छत पर खड़े होकर चीख-चीखकर कहते रहे हैं. इसमें यह स्वीकारोक्ति भी शामिल है कि सरकार ने हाल के दिनों में कुछ गलत फैसले लिए हैं. कुछ तो बहुत ही गलत निर्णय हैं, जिनमें रेट्रो टैक्स का नाम सहज रूप से लिया जा सकता है. दो : हालांकि , यहां जोर दिया गया है कि कई लोग हैं, जो अब भी कर प्रणाली से बच निकलते हैं, जो सही भी है.

वास्तव में कानून उन्हें ऐसा करने देता है (कृषि से होने वाली आय इसका आदर्श उदाहरण है). किंतु क्या वे ऐसा करने वालों के पीछे पड़ेंगे? तीन : मंत्री महोदय को लगता है कि वेतनभोगी मध्यवर्ग राहत पाने का हकदार है और यह ठीक भी है. हालांकि, इन्हें छोड़कर अन्य लोगों के बारे में उनके मन में सहानुभूति नजर नहीं आती, जो ईमानदारी और नियमित रूप से बरसों से कर चुकाते आ रहे हैं.

शायद उन्हें लगता है (जैसा गैस सिलिंडर के मामले में) कि वे उस सारी राशि का भुगतान करने में सक्षम है, जो टैक्स अधिकारियों को लगता है कि उन्हें चुकानी चाहिए. यहां कानून के अनुसार कर चुकाने की बात नहीं है. जैसा कि हम सब जानते हैं, दोनों में काफी फर्क है. हर साल टैक्स अधिकारी अपने शिकार लोगों के सामने बड़ी-बड़ी मांगें रखते हैं. ऐसी मांगें जो बाद में अपीलों और अदालती मामलों में खारिज हो जाती हैं.

गौरतलब है कि एक ही वर्ष में 70,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम लौटाई गई है! ऐसा हमेशा ही टैक्स अधिकारियों की गलती के कारण नहीं होता. प्रति वर्ष उन पर राजस्व वसूली बढ़ाने के कड़े आदेशों का दबाव होता है. आर्थिक रूप से खराब वर्षों में आमतौर पर वे नागरिकों और कंपनियों, दोनों से अतार्किक टैक्स की मांग करते हैं, जो अवैध वसूली की तरह ही होती है. उन्हें अच्छी तरह मालूम होता है कि उनकी ये मांगें अपील प्राधिकरणों और अदालतों में खारिज हो जाएंगी, लेकिन तब तक अधिकारी अपना लक्ष्य हासिल कर बड़े और बेहतर पद पर पहुंच चुका होता है.

उनके उत्तराधिकारियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताए आंकड़ों का औचित्य सिद्ध करना होता है और राजकोष के भारी खर्च की कीमत पर मामलों को अदालतों में खींचते रहना पड़ता है. वरना उन्हें यह सफाई देनी होगी कि उन्होंने राजस्व प्राप्ति का यह मौका क्यों गंवा दिया. उनके राजनीतिक आकाओं का तो वैसे भी कुछ नहीं जाना है. वे भी आगे बढ़ चुके होंगे, बेहतर, बड़े पदों पर.

तकलीफें तो सिर्फ करदाता को भुगतनी पड़ती हैं. हर मामला बरसों बरस खिंचता चला जाता है और सरकारी संसाधन बर्बाद होते रहते हैं. ज्यादातर लोगों के लिए ऐसी निर्दयी व्यवस्था से लड़ना संभव नहीं होता है, जो जानती है कि वह गलती कर रही है, लेकिन मानने को तैयार नहीं है. ऐसे जहां राशि ज्यादा नहीं होती, करदाता उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देता और चुका के मुक्त हो जाता है. जहां पर कर-दावा बहुत अधिक होता है, उस राशि को पाने के लिए उन्हें बरसों लड़ते रहने के अलावा कोई चारा नहीं होता, जो कानूनी रूप से उनकी ही है.

दुर्भाग्य से कर-अपवंचकों को सजा देने और काला धन वापस लाने की सारी बातों के बीच हम कर-प्रणाली के ऐसे हजारों शिकार लोगों को भूल जाते हैं. उनके लिए तो कोई राह ही नहीं है. उनके लिए किसी के पास समय नहीं है. फिर चाहे व्यक्ति हों या कंपनियां. उन्हें ऐसी क्रूर, न झुकने वाली व्यवस्था से अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है, जो हर रुपए के लिए लड़ती है, क्योंकि उसे पता है कि दया दिखाने की हर कार्रवाई पर ऑडिट के दौरान त्योंरियां चढ़ाई जाएंगी.

कर व्यवस्था के इसी स्वरूप पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है. कर अपवंचकों यानी कर चोरों का पता लगाना और कर दाता को प्रताड़ित करना, ज्यादा से ज्यादा वसूली के लिए निचोड़ना एक ही बात नहीं है. एक स्पष्ट कर कानून है और जैसा कि दुनिया के ज्यादातर देशों में होता है तथा उनके पालन के लिए करदाता पर भरोसा किया जाना चाहिए.

यदि विश्वास में कहीं कमी है तो उसके दो कारण हो सकते हैं. एक तो करदाता को लगता है कि उस पर जरूरत से ज्यादा कर लगाया गया है. यदि ऐसा है तो सरकार को अपनी टैक्स प्रणाली की समीक्षा करने की जरूरत है. उसे तर्कसंगत बनाने की जरूरत है ( दुनियाभर का अनुभव बताता है कि कर घटाने से राजस्व वसूली बढ़ती है). दूसरा, इसका मतलब यह भी हो सकता है कि कानून बहुत खराब तरीके से बनाए गए हैं. सारांश यह है कि चीजों को सरल बनाइए, जनाब! अरुण जेटली की मुख्य चुनौती यही होगी कि वे नौकरशाही को सिखाएं कि सरल कर कानून कैसे बनाएं, जिनका पालन करना आसान हो. और जैसा कि हम सब जानते हैं वे इसके लिए बिल्कुल योग्य व्यक्ति हैं.

करारोपण ने अपने आस-पास पूरा उद्योग खड़ा कर लिया है. सीए हैं जो कानून को समझते हैं और हम नश्वर मनुष्यों के लिए इसकी व्याख्या कर सकते हैं. ऑडिटर हैं, जो हर चीज को प्रमाणीकृत करते हैं. फॉर्म भरने वाले तक हैं, जो जानते हैं कि तथ्यों को सरकारी दस्तावेजों में कैसे प्रस्तुत किया जाता है. फाइलर्स हैं, जो जानते हैं कि ऑनलाइन सिस्टम के पागलपन से कैसे निपटना है. फिर वकील हैं, जो प्रताड़ना शुरू होने के बाद आपका बचाव करते हैं.

ऐसे वकील हैं, जो ऊंची अदालतों में आपकी पैरवी कर सकते हैं और तेल-पानी देने वाले हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि न्याय के पहिये धीमी गति से ही सही, पर चलते तो रहें. वरना आपकी फाइल लाखों अन्य लोगों की फाइलों के बीच खो जाएगी, जो उसी न्याय के लिए लड़ रहे हैं, जो आप पाना चाहते हैं.

आने वाला बजट वित्त मंत्री के लिए मौका है कि वे ईमानदार करदाता की तरफ हाथ बढ़ाए. हां, आप भरोसा करें या न करें, लेकिन ऐसे करदाता मौजूद हैं और बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं. कर चोरी करने वालों का पीछा करना बिल्कुल अलग खेल है. हर वित्तमंत्री ऐसा करने का दावा करता है.

इस बार बदलाव के लिए ही सही हमें ऐसा वित्तमंत्री देखने को मिले, जो उन सारे लोगों को पुरस्कृत करने का फैसला करता है, जो दशकों से ईमानदारी के साथ अपना टैक्स भरते रहे हैं और बदले में उन्हें कुछ नहीं मिला है. सिवाय धमकियों, गालियों, प्रताड़ना और अदालती मामलों के. यदि जेटली इतना कर दे तो वे देश बदलकर रख देंगे.

15.09.2014, 11.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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