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श्रमेव नहीं पूंजीवाद जयते

विचार

 

श्रमेव नहीं पूंजीवाद जयते

रघु ठाकुर


वैसे तो स्व. दीनदयाल उपाध्याय का स्मृति दिवस 25 सितम्बर होता है परन्तु शायद व्यवस्तता की वजह से भारत सरकार ने दिल्ली में 16 अक्टूबर 2014 को उनकी स्मृति में ’’श्रमेव जयते ’’ के नाम से आयोजन किया था. यह आयोजन श्रम मंत्रालय की ओर से था जिसमें श्रममंत्री और प्रधानमंत्री स्वतः शामिल हुये. इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कुछ घोषणायें भी की और जिन्हे इस ढंग से प्रचारित किया गया कि यह घोषणायें मजदूरों के हित में है. सरकार ने एक घोषणा तो यह की कि हर कर्मचारी को न्यूनतम एक हजार रूप्या प्रतिमाह पेंशन मिलेगी.

मोदी


वैसे यह घोषणा कोई नई नही है क्योंकि यू.पी.ए. सरकार ने लोकसभा चुनाव के कुछ समय पूर्व इस आशय का प्रस्ताव तैयार किया था और अखबारों में उसकी चर्चा भी हुई थी. हालांकि उसका क्रियान्वयन वर्तमान सरकार के द्वारा ही हुआ. एक हजार रूप्ये प्रतिमाह की पेंशन किसी व्यक्ति या उसके परिवार के लिये आज की मंहगाई के दौर में तसल्ली तो दे सकती है परन्तु कोई बड़ा आधार नही है. आज की बढ़ी हुई मंहगाई में अगर एक परिवार में 1 किलो दूध का इस्तेमाल हो तो उसके लिये महीने 12000 रूप्या चाहिये.

परन्तु इस योजना में कई ऐंसे प्रावधान है जो मजदूर विरोधी है जैंसे -

1. अभी तक मनरेगा में मजदूरी और सामग्री का हिस्सा क्रमशः 60 - 40 था याने उपकरण, यातायात आदि पर मनरेगा की राशि में से 40 प्रतिशत तक खर्च होता था और शेष 60 प्रतिशत मजदूरों को नगद मजदूरी में खर्च करना है परन्तु अब इसे घटाकर 51 - 49 कर दिया गया है याने अगर मनरेगा की राशि का 49 प्रतिशत उपकरण और यातायात में खर्च हो जाता है और 51 प्रतिशत मजदूरी का इसके दो ही अर्थ होंगे. चूंकि मजदूरी की राशि 9 प्रतिशत कम हो जायेगी अतः या तो मनरेगा में काम की मजदूरी कम करना होगी या फिर मजदूरों की संख्या कम करना होगी. मजदूरी की दर कम करना तो अब सम्भव नही लगता इसीलिये ज्यादा सम्भावना इस बात की है कि मजदूरों की संख्या लगभग 5 प्रतिशत कम हो जायेगी याने देश के पैमाने पर लगभग 20 लाख मजदूर कम हो जायेगे.

2. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि मजदूरों के भविष्य निधि खाते में जो 27 हजार करोड़ रूप्या लंबे समय से पड़ा है और वितरित नही हुआ है, उसे तत्काल बॉंटा जाये. परन्तु उन्होने यह पता लगाने का प्रयास नही किया कि आखिर यह पैसा बॅंटा क्यों नही और इसके लिये कौन जबाबदार है ? उन जबाबदार अधिकारियों के उपर कार्यवाही क्यों नही की जाये जबकि भविष्य निधि कानून न केवल यह दायित्व तय करता है बल्कि भविष्य निधि की राशि के भुगतान को न करना अपराध बनाता है.

अगर संबंधित उद्योगपतियों, अधिकारियों ने समय पर भविष्य निधि की राशि जमा कराई होती और वितरित की होती तो यह पैसा बैंको में नही पड़ा रहता. अब अगर यह पैसा इसलिये पड़ा रहा कि जमाकर्ता मजदूरों की पहचान पता नही है तो फिर ये वितरित कैंसे किया जायेगा ? और इसमें भारी घोटाले की सम्भावनायें पैदा होती है ? अफसर और पूंजीपति मिलकर यह पैसा आपस में बॉंट सकते है. इससे बेहतर तो यह होता कि प्रधानमंत्री इस पैसे के गैर पहचान के योग्य खातों के पैसे को मजदूरों के कल्याण में याने अस्पताल, स्कूल, चिकित्सा शिक्षा, छात्रवृत्ति, भवन आबंटन आदि में लगाने की योजना बनाते.

3. उन्होने यह भी कहा कि मजदूरों को उनके काम के घंटो के हिसाब से भुगतान किया जायेगा. शायद उन्हे देश के अस्थाई और दैनिक वेतन भोगियों की स्थिति का ठीक ठीक ज्ञान नही है या फिर उन्हे उनके प्रशासन तंत्र और नौकरशाहों ने वस्तुस्थितिसे अवगत नही कराया. हमारे देश में बेरोजगारी के चलते मजदूरों की दैनिक आधार पर नीलामी जैसी होती है. शहरों और महानगरों में चौराहों पर आकर सैकड़ों मजदूर बैठ जाते हैं. उन्हे विशेषतः मध्यमवर्गीय परिवार के लोग अपने काम के हिसाब से ले जाते है.

अब अगर किसी के घर में मजदूरी का 2 घंटे का काम है तो 2 घंटे के बाद बकाया समय वह मजदूर खाली रहेगा इसीलिये मजदूर अमूमन पूरे दिन की मजदूरी तय करते है ताकि उन्हे दिन भर का काम मिल जाये. भारत कोई अमरीका नही है जहॉं व्यक्ति को घंटो के हिसाब से रोजगार उपलब्ध हो जाये और इसकी कीमत भी लगभग हजार रूप्या प्रतिघंटा उसे मिल जाये. ऐंसे किसी कानून को बनाकर भी क्रियान्वित करना भारत जैंसे विशाल आबादी वाले गरीब देश में सम्भव नही है.

कम से कम फिलहाल तो नही है और तो छोड़ें रेल्वे स्टेशनों पर काम करने वाले कुली से भी निर्धारित दरों पर रेल्वे का तंत्र काम नही करा पाता. प्रधानमंत्री जी अमरीकी यात्रा में जो अमरीकी पद्धति का चश्मा लगा कर लौटे हैं, वह अभी भी उनकी ऑंखों पर है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कैम्ब्रिज संस्कृति के मानसिक दास थे और श्री नरेन्द्र मोदी अमरीकी पूंजीवाद के. उनकी घंटों के आधार पर मजदूरी की कल्पना उद्योगपतियों और अतिसंपन्न लोगों को अवश्य लाभप्रद होगी क्योंकि कारखाने के मालिकों को इस आधार पर स्थाई मजदूर रखने से मुक्ति मिल जायेगी. कारखानेदारों को मजदूरों के सभी वैधानिक दायित्वों से मुक्ति मिलेगी क्योंकि यह मजदूर अस्थाई तो होंगे ही, दैनिक और माहवारी भी नही होगे, ये तो केवल घंटो वाले होंगे जिन्हे न भविष्य निधि का अधिकार होगा न पेंशन का न छुट्टियों का और न कार्यस्थल की सुविधाओं का. यह एक प्रकार के श्रमिक उत्तरदायित्व मुक्त पूंजीवाद की यह शुरूआत होगी.

4. प्रधानमंत्री बार बार यह भी कह रहे हैं कि पुराने गैरजरूरी कानून समाप्त किये जायेंगे परन्तु वे गैरजरूरी कानून कौन से है ? सरकार ने यह संकेत दिया है कि श्रमिक कानूनों में से केवल 5 कानून रखे जायेंगे शेष 55 कानून समाप्त किये जायेंगे. परन्तु वे 55 कानून कौन से है जिन्हे वे समाप्त करना चाहते है और करने की प्रक्रिया में है इसका कोई खुलासा सरकार ने अभी तक नही किया है ? ऐंसा न हो कि अनुपयोगी कानूनों को हटाने के नाम पर पुराने मजदूरों को अनुपयोगी मान लिया जाये.

भारतीय परम्परायें और संस्कृति गौरक्षा की है और गाय जब दूध देना बंद कर देती है तब भी उसे परिवार के सदस्य के समान संरक्षण और भोजन देने की है. अनुपयोगी को फेंकना और उपयोगी होने तक इस्तेमाल करना यह न भारतीय सभ्यता है और न मानवीय सभ्यता यह तो बाजारवाद की सभ्यता है जिसे अंग्रेजी में ’’ यूज एण्ड थ्रो ’’ कहा जाता है. दुनिया के दूसरे देशों में गाय दूध देने वाली मशीन जैसी है और जिस प्रकार मशीन के बिगड़ जाने के बाद उसे फेंक दिया जाता है, उसी प्रकार वहॉं गौवंश को काट दिया जाता है. अब क्या हम ऐंसा देश बनाना चाहेगे जिसमे मानव मात्र को अनुपयोगी कहकर मरने को छोड़ दिया जाये या फिर ऐंसा देश जो इंसान के आखिरी समय तक उसे सहारा देना अपना दायित्व मानेगी. हम केवल मशीनी भारत बनाना चाहते है या मानवीय भारत ? यह दृष्टि का फर्क है और यही महत्वपूर्ण है.

5. ऐंसी सूचनायें हैं कि श्रम कानून अब उन्ही कारखानों पर लागू होंगे जिनमे न्यूनतम 40 मजदूर कार्य करते हों. अभी तक यह सीमा 20 मजदूरों की थी. याने 39 तक की सीमा में काम करने वाले मजदूर श्रम अधिकारों से पूर्णतः वैधानिक रूप से मुक्त हो जायेंगे तथा देश के छोटे छोटे उद्यमों के करोड़ों मजदूरों को उनके श्रमिक अधिकारों से वंचित होना पड़ेगा.

6. ओवर टाईम काम की अवधि को प्रति तिमाही 50 घंटो से बढ़ाकर 100 घंटे कर दिया गया है. लगभग 2 घंटे प्रतिदिन ओवर टाईम. हालांकि ओवर टाईम का पैसा पूर्व के समान निर्धारित मजदूरी से दोगुनी नही मिलेगा. मतलब साफ है कि अब मजदूरों की संख्या नही बढ़ेगी बल्कि क्रमशः कम होगी. मशीनीकरण का मार्ग प्रशस्त करने का यह एक चतुर तरीका है.

देश के लगभग सभी मजदूर संगठनों ने यहॉं तक कि भा.ज.पा. से संबंधित भारतीय मजदूर संघ और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से संबंधित स्वदेशी जागरण मंच ने भी केन्द्र सरकार की इस नीति का विरोध किया है. यह विरोध केवल शाब्दिक है या वास्तविक है इसका निर्णय तो भविष्य में होगा परन्तु सरकार के इस निर्णय का वास्तविक अर्थ यह ’’ श्रमेव जयते ’’ नही वरन ’’ पूंजी जयते ’’ है.

आजकल चतुर सरकारें योजना के काम और नाम में अंतर करती है. जिस कानून के द्वारा स्व. राजीव गॉंधी ने शाहबानों प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा प्रदत्त मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को छीना था उस कानून का नाम मुस्लिम महिला अधिकार विधेयक था. शायद 30 साल के बाद पुनः इतिहास की पुनर्रावृत्ति हो रही है कि नाम ’’श्रमेव जयते ’’ और काम ’’ पूंजीवाद जयते ’’. अगर सरकार को ऐसी ही घोषणायें करना थी तो उसे दीनदयान उपाध्याय की स्मृति के बजाय श्रीमति नीता अंबानी के जन्मदिन पर करनी थी.

05.12.2014, 14.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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